तालिबान और चीन की दोस्ती क्या रंग लाएगी | दुनिया | DW | 29.07.2021
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

तालिबान और चीन की दोस्ती क्या रंग लाएगी

अमेरिका ने बुधवार को कहा कि वह अफगानिस्तान में नागरिकों पर बढ़ते हमलों की खबरों से बहुत परेशान है. वॉशिंगटन अपने शेष सैनिकों को देश से वापस बुला रहा है. इस बीच तालिबान का एक दल चीन दौरे पर है.

भारत के दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा है कि अफगानिस्तान में शांति का एकमात्र रास्ता बातचीत के जरिए निकल सकता है, जिसे सभी दलों को गंभीरता से लेना चाहिए.

तालिबान के लड़ाकों ने अफगानिस्तान में बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है और उसने हाल ही में महत्वपूर्ण सीमा नियंत्रण पोस्ट पर भी अपना कब्जा जमा लिया है. यह सब अमेरिकी सैनिकों की वापसी के साथ तेजी से बढ़ा है.

पेंटागन का अब अनुमान है कि तालिबान अब देश के आधे से अधिक जिला केंद्रों का नियंत्रण कर रहे हैं. इस उछाल ने इस संभावना को बढ़ा दिया है कि आतंकवादी सत्ता में वापस आ सकते हैं. 1996-2001 के बीच तालिबान के शासन के दौरान लाखों लोग देश से भाग गए थे.

तालिबान का खौफ सताने लगा

तालिबान ने अपने दुश्मनों को खुलेआम फांसी पर लटकाया, इस्लामी कानून को नहीं मानने वालों को कोड़े मारे और महिलाओं और लड़कियों को पढ़ाई और काम से रोका. तालिबान ने ही ओसामा बिन लादेन के अल कायदा नेटवर्क की मेजबानी की. हालांकि अब तालिबान का कहना है कि अगर वह सत्ता में वापसी करेगा तो वह नागरिकों के साथ अच्छा व्यवहार करेगा और देश को अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं होने देगा.

नागरिकों पर हमलों की रिपोर्ट को "गंभीर परेशानी" वाला बताते हुए ब्लिकेंन ने कहा, "अफगानिस्तान जो अपने ही लोगों के खिलाफ अत्याचार करता है वह एक अछूत देश बन जाएगा." उन्होंने कहा, "संघर्ष को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने के लिए एक ही रास्ता है और वह है बातचीत की मेज."

संयुक्त राष्ट्र ने इस सप्ताह बताया कि नागरिकों के हताहत होने की संख्या हाल के सप्ताहों में बढ़ी है. जुलाई के महीने में अफगान सुरक्षाबलों और तालिबान के बीच लड़ाई तेज हुई है.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने वादा किया है कि सितंबर से पहले सारी अमेरिकी फौजों को स्वदेश बुला लिया जाएगा. विदेशी फौजों की वापसी के साथ तालिबान के हौसले बढे़ हैं और वे और वे तेजी से विभिन्न इलाकों पर कब्जा करते जा रहे हैं.

11 सितंबर 2001 के हमले के लिए अमेरिका ने अल कायदा को जिम्मेदार माना था और उसे खत्म करने के लिए अफगानिस्तान पर हमला किया. तब तालिबान को सरकार से बाहर कर दिया गया. तब से तालिबान देश पर कब्जा पाने के लिए लड़ रहे हैं.

चीन और अफगानिस्तान की नजदीकी

तालिबान के प्रतिनिधिमंडल हाल के दिनों में पड़ोसी देशों का दौरा कर रहे हैं. तालिबान पिछले दो दशकों में आतंकवादी संगठन वाली पहचान से आगे बढ़ना चाहता है और वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने लिए नई जमीन तैयार करने में जुटा है. एक समय में तालिबान के साथ बहिष्कृत रूप में व्यवहार किया जाता था और अधिकांश देशों ने उसे आतंकवादी संगठन के रूप में प्रतिबंधित किया था.

इस बीच तालिबान नेता मुल्ला बरादर अखुंद ने एक प्रतिनिधिमंडल के साथ चीन के विदेश मंत्री वांग यी से 27 जुलाई को मुलाकात की. बरादर के साथ नौ तालिबानी चीन के उत्तरी शहर तियाजिन के दो दिवसीय दौरे पर गए. चीन के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में वांग ने कहा, "तालिबान से अफगानिस्तान में शांतिपूर्ण सुलह की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने और अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण की उम्मीद की जा रही है."

हाल के सप्ताहों में तालिबान का प्रतिनिधिमंडल ईरान और रूस का भी दौरा कर चुका है. तालिबान का एक कार्यालय कतर में है.

तालिबान के प्रवक्ता मोहम्मद नईम ने चीन यात्रा के बारे में ट्वीट किया, "राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से संबंधित दोनों देशों के मुद्दे और अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति पर बैठक में चर्चा हुई."

नईम ने कहा, "प्रतिनिधिमंडल ने चीन को आश्वासन दिया कि वह इसकी अनुमति नहीं देगा कि कोई भी चीन के खिलाफ अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल करे."

नईम ने कहा कि चीन ने भी अफगानों की मदद को जारी रखने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है. बकौल नईम चीन ने कहा, "वह अफगानिस्तान के मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा लेकिन अफगानिस्तान की समस्याओं को सुलझाने में और देश में शांति बहाली में मदद करेगा."

एए/वीके (रॉयटर्स, एपी)

DW.COM

संबंधित सामग्री