तुर्क सरकार ने डॉयचे वेले का इंटरव्यू जब्त किया | दुनिया | DW | 07.09.2016
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दुनिया

तुर्क सरकार ने डॉयचे वेले का इंटरव्यू जब्त किया

जर्मनी के विदेश प्रसारक डॉयचे वेले ने तुर्की के एक मंत्री के साथ किए गए इंटरव्यू को जब्त किए जाने की निंदा की है और इसे प्रेस स्वतंत्रता का खुला उल्लंघन बताया है.

डॉयचे वेले के महानिदेशक पेटर लिम्बुर्ग ने संस्था की वेबसाइट पर लिखा है, "हम जो अनुभव कर रहे हैं वह तुर्की की सरकार की दादागिरी है. वह कानून के शासन का पालन नहीं कर रही है और इसका लोकतंत्र से कुछ लेना देना नहीं."

तुर्की के युवा और खेल मंत्री आकिफ कागाताय किलिच के साथ पिछले सोमवार को रिकॉर्ड किये गये इंटरव्यू में 15 जुलाई के विफल सैनिक सत्तापहरण, उसके बाद हुई कार्रवाई, प्रेस की आजादी और महिलाओं के अधिकार पर "ऐसे सवाल शामिल थे जो मंत्रालय को पहले बता दिये गये थे."

डॉयचे वेले के अनुसार मंत्री ने अंकारा में अपने दफ्तर में हुए इंटरव्यू के तुंरत बाद अपना विचार बदल लिया. मंत्री के प्रवक्ता ने दो पत्रकारों को बताया कि उन्हें इंटरव्यू का प्रसारण करने की अनुमति नहीं है. इस बीच मंत्रालय के कर्मचारियों ने रिकॉर्डिंग जब्त कर ली. डॉयचे वेले के अनुसार, "टीवी क्रू को साफ कर दिया गया कि वे वीडिया फुटेज के साथ मंत्रालय से बाहर नहीं निकल सकते."

उसके बाद डॉयचे वेले ने वीडियो फुटेज वापस पाने के लिए कई अपीलें की हैं, लेकिन खेल मंत्री ने मना कर दिया. जर्मनी का विदेश प्रसारक अब कानूनी कार्रवाई करने पर विचार कर रहा है. अपनी वेबसाइट पर एक बयान में तुर्की के युवा और खेल मंत्रालय ने इस बात की पुष्टि की है कि यह घटना घटी, लेकिन कोई गलत काम करने से इंकार किया है और दोष जर्मन ब्रॉडकास्टर पर मढ़ दिया है. बयान में कहा गया है कि डॉयचे वेले के इंटरव्यू करने वाले ने अपनी अभिव्यक्तियों और अपने आरोपों से सीमा पार की जिसके परिणामस्वरूप मंत्रालय ने उससे इंटरव्यू का प्रसारण न करने को कहा.

इस फैसले को उचित ठहराते हुए मंत्रालय ने कहा कि यह कदम इंटरव्यू को ऑथोराइज करने की नीति के तहत था जो जर्मनी में भी है. यह घटना जर्मन संसद द्वारा अर्मेनिया प्रस्ताव पास किए जाने के बाद अंकारा और बर्लिन के बीच बढ़ते तनाव के बीच हुई है. इस प्रस्ताव में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ऑटोमन साम्राज्य के सैनिकों द्वारा अर्मेनियाईयों के कत्लेआम को नरसंहार कहा गया था. जर्मन सरकार ने आलोचक पत्रकारों के खिलाफ सख्त कदमों और जुलाई के सैनिक विद्रोह के बाद व्यापक गिरफ्तारियों की भी निंदा की.

जानिये: तुर्की में तख्तापलट नाकाम क्यों हुआ?

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