साल भर में 48 हजार करोड़ रिश्वत में देते हैं ट्रक ड्राइवर | ब्लॉग | DW | 25.03.2020
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ब्लॉग

साल भर में 48 हजार करोड़ रिश्वत में देते हैं ट्रक ड्राइवर

भारत की सड़कों पर दिन रात ट्रक चलाते ड्राइवर हर साल करीब 48 हजार करोड़ रुपया बतौर रिश्वत दे डालते हैं. अत्यंत खराब हालात में काम करते ड्राइवरों से जुड़े एक नए अध्ययन में उनकी जिंदगी के अनछुए पहलू उजागर हुए हैं.

कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए देश भर के शहरों में एक के बाद एक लॉकडाउन होने और राज्यों की सीमाएं सील होने से पहले सड़कों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर ट्रकों की आवाजाही बदस्तूर थी. ट्रकों से माल ढुलाई देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में पहुंच रही थी. कोरोना का खतरा टलते ही यह आवाजाही फिर सामान्य हो जाएगी.

पिछले दिनों स्वयंसेवी संस्था सेवलाइफ फाउंडेशन का एक देशव्यापी सर्वे जारी हुआ जिसमें बताया गया कि ट्रक ड्राइवरों को न सिर्फ दयनीय हालात में काम करना पड़ता है बल्कि रात दिन सड़क पर रहने से उनकी शारीरिक और मानसिक समस्याएं भी बढ़ जाती हैं. भारत में ट्रक वालों की जीवन स्थितियों पर संभवतः अपनी तरह का यह पहला अध्ययन होगा. अर्थव्यवस्था की इतनी अहम धुरी होने के बावजूद ड्राइवर बेहद बुरे हालात से गुजरने को विवश हैं. उनके प्रत्यक्ष और परोक्ष शोषण पर भी चिंता जताई गई है और यह भी बताया गया है कि उनके अधिकारों के लिए समवेत स्वरों का अभाव है.

"भारत में ट्रक ड्राइवरों की स्थिति" नामक इस सर्वे में देश भर के 1300 से ज्यादा ट्रक ड्राइवरों से बात की गई. हर दस में से नौ ड्राइवरों का कहना था कि उन्हें न सिर्फ कम पगार मिलती है बल्कि समय पर भी नहीं मिल पाती और उन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा भी हासिल नहीं हैं. एक ड्राइवर को औसतन महीने में दस से बीस हजार रुपये तनख्वाह मिल पाती है. कई राज्यों में यह न्यूनतम वेतन से भी कम है. 84 फीसदी ड्राइवरों का कहना है कि वे अपने किसी परिजन को इस काम में उतरने के लिए नहीं कहेंगे. 53 फीसदी ड्राइवर अपने काम से संतुष्ट नहीं पाए गए.

विभिन्न किस्म की दुर्दशाओं के बीच ट्रक ड्राइवरों के लिए एक जानलेवा समस्या बन गई है रिश्वत. सर्वे में पाया गया कि ट्रक डाइवरों को हर साल करीब 48 हजार करोड़ रुपये बतौर घूस देने पड़ते हैं. मार्केटिंग एंड डेवलेपमेंट रिसर्च एसोसिएट्स, एमडीआरए ने सेवलाइफ फाउंडेशन के लिए यह ताजा अध्ययन किया है. ट्रांसपेरंसी इंटरनेशनल के लिए वे 2007 में ट्रकों के कारोबार से जुड़े भ्रष्टाचार पर अध्ययन कर चुका है. वैसे अमेरिका से लेकर यूरोप तक दुनिया के अलग अलग हिस्सों में ट्रक ड्राइवरों की आर्थिक, सामाजिक और मानसिक दशाओं पर अध्ययन और शोध होते आ रहे हैं.

राजस्थान में कोटा से जयपुर माल ढुलाई कराने वाले एक ट्रक मालिक ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि बिना रिश्वत यह कारोबार ही ठप हो जाएगा, एक भी ट्रक नहीं चल पाएगा. उनका कहना है, "हम लोगों का काम तभी चल पाता है जब हर नाके हर पोस्ट हर चौराहे या हर किसी ऐसी जगह पर जो वसूली के लिए तय कर दी जाती है, जब तक उन तमाम जगहों पर तैनात आरटीओ वाले हों या टैक्स वाले कर्मचारी हों या पुलिसवालों को उनका हिस्सा नहीं मिलता, ट्रक आगे नहीं बढ़ सकता. और यह पूरी की पूरी एक चेन बनी हुई है."

उनकी बातों में खिन्नता से ज्यादा इस बात की राहत नजर आई कि इतने भर से ही मामला निपट जाता है और धंधा चलता रहता है तो यह क्या कम है. जब उन्हें बताया गया कि इस बारे में एक सर्वे आया है और पता चला है कि इतना अरबों रुपया रिश्वत में निकल जाता है तो उन्होंने बिना हैरान हुए टका सा जवाब दिया, "इतना कहां, और ज्यादा होगा. कैलकुलेशन नहीं हुई होगी ठीक से. और वैसे भी सर्वे से क्या होगा?"

उन्होंने उल्टा सवाल कर डाला कि रिश्वत किस चीज के लिए दी जाती है. सबसे ज्यादा ओवरलोडिंग के लिए, इसके बाद एक राज्य से दूसरे राज्य की सीमा में आवाजाही पर और तीसरा ड्राइविंग की किसी लापरवाही या गलती से. जिस ट्रक मालिक से मैंने बात की उनका अपना ट्रक है और पत्थर टाइल का व्यापार है. उनका कहना था, "जगह जगह की रिश्वत की भरपाई तो ओवरलोडिंग से ही पूरी हो सकती है. परमिशन अगर चार टन माल लादने की है तो 20-30 टन माल लाद दिया जाता है. नियम से लाने पर भी पुलिस वाले और अन्य स्टाफ रोकेगा और नियम तोड़कर भी लाए तो देना तो है ही." यह भ्रष्टाचार का एक दुष्चक्र इस तरह से बना हुआ है जिसके बने रहने में ही सब अपनी खैरियत समझते हैं.

"ट्रक द इंडियाः अ हिचहाइकर्स गाइड टू हिंदुस्तान" नामक ट्र्क ट्रैवेलॉग के लेखक रजत उभयकर का कहना है, "ट्रक के ड्राइवरों को देश में हर जगह बड़े पैमाने पर अपमान झेलना पड़ता है. उन्हें भयानक रूप से परेशान किया जाता है. क्योंकि हाइवे पेट्रोल हो या चेकपोस्टों पर तैनात पुलिस या आरटीओ के कर्मचारी अधिकारी, हर कोई उन्हें वसूली का जरिया मानता है."

राजस्थान के जयपुर से होते हुए नेशनल या स्टेट हाइवे हों या उत्तराखंड के हरिद्वार और देहरादून के रास्ते. पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण की आवाजाही और दिन रात ट्रकों को चलाते ड्राइवरों को देखकर उनकी हालत का एक मोटा सा अंदाजा तो लग ही जाता है. थकान और पसीने से पस्त और धूलधूसरित चेहरे, सूखे मुंह, सूजी हुई सी आंखे, तनावग्रस्त और माथे पर गहरी शिकन. उनका जीवन एक अकल्पनीय बदहवासी की चपेट में रहता है.

एक ट्रक ड्राइवर मुकेश ने बताया कि वह पूरे देश में ट्रक लेकर चलता है लेकिन ज्यादातर राउंड राजस्थान और यूपी-उत्तराखंड के बीच ही लगते हैं जहां कभी लकड़ी, कभी मार्बल तो कभी टाइल या कभी अन्य सामान की ढुलाई करता है. अपनी जिंदगी से जुड़े ऐसे सर्वे के बारे में वह नहीं जानता था लेकिन सर्वे से जुड़े कुछ बिंदुओं से मिलतेजुलते सवाल उससे पूछे तो उसका कहना था, "हां समझ लो कुछ ऐसी ही है हमारी लाइफ." उसका कहना है, "हमें इज्जत नहीं मिलती. मालिक अलग बेइज्जती करता है, पुलिस वाले अलग, आम लोग भी हमें ऐसे देखते हैं जैसे हमें कोई बीमारी हो. यह बात बहुत चुभती है."  

सर्वे में भी यह बात सामने आई है कि 40 फीसदी ट्रक ड्राइवरों को अपमान, दुर्व्यवहार, गालीगलौच का डर सताता रहता है. कई बार तो मारपीट की नौबत आ जाती है. हड़ताल हो या जुलूस समारोह आदि, कुछ जरा भी गड़बड़ हो जाए तो भीड़ मरने मारने पर उतारू हो जाती है. लेकिन ट्रक ड्राइवरों की बदहाली के जिम्मेदार उन्हें काम पर रखने वाली कंपनियां और ठेकेदार आदि भी हैं.

सर्वे में करीब 90 प्रतिशत ड्राइवों ने माना कि ड्राइविंग लाइसेंस लेने से पहले उनकी उचित ट्रेनिंग नहीं हुई थी. आधे से ज्यादा ड्राइवर ऐसे हैं जो बारह बारह घंटे ड्राइव करते हैं. 53 फीसदी ड्राइवरों ने माना कि उन्हें अनिद्रा, मोटापे, पीठ दर्द, जोड़ों में दर्द और गर्दन दर्द की शिकायत रहती है या उन्हें ठीक से नहीं दिखता है.

अगर एक सुव्यवस्थित और वैध व्यवस्था निर्मित हो तो ट्रक ड्राइवरों को भी उसका हिस्सा बनाया जा सकता है. गाड़ी की मरम्मत, फिटनेट सर्टिफिकेट, पंजीकरण, परमिट नवीनीकरण, ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़ी कमियों और दुश्वारियों को दूर किया जान चाहिए. कंपनियों और संस्थानों को भी अपने कर्मचारियों के लिए वित्तीय और स्वास्थ्य सुरक्षा और कल्याण के उपाय सुनिश्चित करने चाहिए.

इसे लेकर सरकार की ओर से कोई निर्देश भी दिए जा सकते हैं या कोई नीति बनाई जा सकती है. ट्रक ड्राइवरों को उनके हाल पर छोड़ देना उनके मानवाधिकारों का हनन ही नहीं नागरिक के रूप में उनके अधिकारों की अनदेखी करना भी है. 2018-19 के आर्थिक सर्वे में बताया गया है कि देश में सड़को से करीब 70 प्रतिशत माल ढुलाई ट्रकों के जरिए होती है. एक तरह से ट्रक और उनके ड्राइवर देश की इकोनमी की लाइफलाइन हैं.

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