सोशल मीडिया पर ‘चमकने’ के लिए प्रकृति से छेड़छाड़ | पर्यावरण | DW | 27.08.2021
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पर्यावरण

सोशल मीडिया पर ‘चमकने’ के लिए प्रकृति से छेड़छाड़

लंबी दूरी तक पैदल चलना, कैंप करना या समुद्र तट पर टहलना प्रकृति को करीब से जानने और उसका आनंद लेने का सही तरीका लग सकता है. हालांकि, कभी-कभी ऐसा करने के गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं.

कोरोना वायरस महामारी की वजह से बहुत सारे लोग घर के आस-पास ही छुट्टियां मना रहे हैं. इससे आने-जाने में पैदा होने वाले कार्बन में कमी आई है. यहां तक कि लंबी दूरी की यात्रा करने वाले लोग भी पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करने की कोशिश कर रहे हैं. वे हवाई जहाज की जगह ट्रेन से यात्रा कर रहे हैं.

हालांकि, कभी-कभी पर्यावरण की सुरक्षा के हिसाब से जो विकल्प दिखता है, वह उतना कम हानिकारक नहीं होता जितना देखने में लगता है. यहां विशेषज्ञों की कुछ सलाह दी गई है कि दुनिया की खूबसूरत जगहों को किस तरह देखा जाए जिससे उनका कम से कम से नुकसान हो.

कैंप करने के दौरान सावधानी बरतें

यूरोप के अधिकांश हिस्सों में जंगलों में कैंप करने की मनाही है. यहां तक कि स्कैंडिनेविया और बाल्टिक जैसे स्थानों में जहां इसकी अनुमति है, वहां प्रकृति भंडार या राष्ट्रीय उद्यानों में रात भर ठहरने की अनुमति नहीं है. जर्मनी के नेशनल पार्क सैशिषे श्वाइत्स के हांसपीटर मायर कहते हैं कि ऐसा अच्छे कारणों के लिए किया गया है.  

वह कहते हैं, "यहां तक कि अगर जंगल में कैंप करने वाले कैंप फायर नहीं करते हैं और अपना सारा कचरा अपने साथ ले जाते हैं, तब भी यह हानिकारक हो सकता है. जानवर हमारी कल्पना से कहीं अधिक आसानी से लोगों को देख, सूंघ, और सुन सकते हैं. इसिलए, मनुष्यों की उपस्थिति मात्र से कुछ जानवर इन जंगलों से दूसरी जगह जा सकते हैं."

कैंप करने वाले लोग अपने ‘मनोरंजक वाहन' के साथ नदी किनारे या किसी खूबसूरत एकांत जगह पर ठहरना पसंद करते हैं. इसके बारे में उन्हें डिजिटल प्लैटफॉर्म के जरिए जानकारी मिलती है. मायर कहते हैं, "प्रकृति पर पड़ने वाला प्रभाव जल्द ही दिखने लगता है. उदाहरण के लिए, कैंप करने वाले लोग जब छोटी नदियों में स्नान करते हैं, तो वे जिस साबुन को छोड़कर जाते हैं उससे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है."

वीडियो देखें 04:17

सुंदर लोकेशन से ऑफिस का काम

मायर के मुताबिक, बाहर में कैंप के दौरान टॉयलेट करने से भी समस्या होती है. वह कहते हैं, "जब बहुत से लोग एक ही स्थान पर बार-बार पेशाब करते हैं, तो इससे भी पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचता है. यह समस्या टॉयलेट से भी जुड़ी है. स्थानीय लोगों को भी इससे काफी समस्या होती है. गंध की वजह से जानवर भी इन इलाकों में जाने से बचना चाहते हैं. ऐसे में उनके पास ‘इंसानी बस्तियों' में जाने का ही विकल्प बचता है."

जर्मनी में कैरावैन से यात्रा का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है. जर्मन कैरावैनिंग इंडस्ट्री एसोसिएशन का कहना है कि 2021 की पहली छमाही में लगभग 63,000 नए मोटरहोम और कैरावैन पंजीकृत किए गए थे. हालांकि, उनके लिए पर्याप्त आधिकारिक साइट नहीं हैं. मार्केट रिसर्च इंस्टीट्यूट पल्स के एक अध्ययन के अनुसार, 2019 में जर्मनी में उनके लिए पार्किंग पिच के तौर पर पंजीकृत मनोरंजक वाहनों की संख्या पहले से ही लगभग पांच गुना थी.

भीड़भाड़ वाले कैंप साइटों के विकल्प हैं जो जंगली आवासों का अतिक्रमण नहीं करते हैं. अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हैं जहां किसान और उद्यान वाले लोग शौचालय और कूड़ेदान जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ, तंबू लगाने के लिए जगह की पेशकश कर सकते हैं.

बेहतर विकल्प हो सकता है पैकेज होलिडे

अकेले घूमने निकलना प्रकृति के करीब जाने का एक अच्छा तरीका लग सकता है. सस्टेनेबल टूर ऑपरेटर्स के एक इंडस्ट्री ग्रुप फोरम एंडर्स रीसेन की पेट्रा थॉमस का कहना है कि अकेले घूमने जाने में पैकेज टूर की तुलना में ज्यादा पर्यावरणीय पदचिन्ह होते हैं. थॉमस कहती हैं, "सही तरीके से प्रबंधित किए जाने पर, पर्यटन का कम से कम नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. लेकिन जब कोई व्यक्ति अकेले घूमने निकलता है, तो यह संभव नहीं है."

वह कहती हैं, "एक साथ यात्रा करने पर पर्यटक परिवहन के साधन को एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं. इससे कार्बन का उत्सर्जन कम होता है. जबकि, अकेले घूमने जाने वाले लोग जो उपाय साझा करते हैं, वह वास्तविक समस्याओं का कारण बन सकते हैं. उन खूबसूरत जगहों पर लोगों की भीड़ बढ़ जाती है, जहां नहीं जाना चाहिए.

तस्वीरेंः जर्मनी की सबसे सुंदर कैंपसाइट

एक ही समय में, एक ही जगह पर छुट्टियां मनाने वाले बहुत से लोग काफी ज्यादा ऊर्जा और संसाधनों की खपत करते हैं. कुछ मामलों में, स्थानीय जल आपूर्ति भी बंद हो सकती है.

इन सब के बावजूद, जो लोग अकेले ही घूमना चाहते हैं उन्हें ट्रेन से वहां पहुंचना चाहिए और स्थानीय परिवहन का इस्तेमाल करना चाहिए. इन्हें किराए पर कार नहीं लेनी चाहिए. साथ ही, लंबे समय में, दूरदराज के इलाकों में रहने से कम से कम लोकप्रिय तटीय क्षेत्रों में और मेगाहोटल की मांग को बढ़ाने से बचा जा सकता है.

पक्षियों को परेशान न करें

महामारी के दौरान एक और प्रवृति बढ़ी है. वह है डे ट्रिपिंग. यह विशेष रूप से उन खूबसूरत इलाकों में होती है जो समुद्री तटों के किनारे स्थित होते हैं. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के वाडन जे कार्यालय में कार्यरत आन्या श्तेत्स्की का कहना है कि उत्तरी सागर में पर्यटकों की बढ़ती संख्या स्थानीय वन्यजीवों के लिए सही नहीं है.

वह कहती हैं, "उत्तरी सागर में और भी बहुत से मेहमान आ रहे हैं जो वहां के नियमों को नहीं जानते. ये लोग अपने कुत्ते को यूं ही छोड़ देते हैं. ये कुत्ते पक्षियों को परेशान करते हैं."

वॉटर स्पोर्ट्स को पसंद करने वाले लोग जीवों के प्रजनन करने वाली जगहों के पास सर्फिंग करते हैं और समस्याएं पैदा करते हैं. श्तेत्स्की कहती हैं, "बार-बार चौंकने की वजह से पक्षियों की उर्जा खर्च होती है. इससे मौसमी प्रवास के दौरान उन्हें बहुत ज्यादा थकान हो सकती है."

कचरे को अपने साथ ले जाएं

जंगल में पैदल घूमना बिना किसी नुकसान के प्रकृति से जुड़ने का तरीका लग सकता है, लेकिन हाइकर्स अनजाने में प्रकृति का नुकसान भी करते हैं. जर्मन हाइकिंग एसोसिएशन के एक सर्वे में पाया गया कि आधे से अधिक हाइकर्स ने पिछले साल हाइकिंग के रास्तों पर काफी ज्यादा कचरा देखा. उन्होंने यह भी देखा कि इन रास्तों पर काफी ज्यादा भीड़ बढ़ गई है.

वीडियो देखें 02:30

एक पार्क में समाया पूरा यूरोप

इंस्टाग्राम और दूसरे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर डालने के लिए खींचे गए फोटो शांतिपूर्ण वातावरण में लोगों की भीड़ बढ़ सकते हैं. हाइकर्स ऐप्लिकेशन और ऑनलाइन प्लैटफॉर्म पर जिन रास्तों को शेयर करते हैं, उससे प्रकृति पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ पर्यटन विशेषज्ञ मार्टिना वॉन मुंन्षहाउसेन कहती हैं, "उन रास्तों के बारे में जानकारी साझा करने से समस्या होती है जो प्राकृतिक रूप से संवेदनशील हैं और जहां नहीं जाना चाहिए, जैसे कि प्रजनन वाले इलाके." वह चाहती हैं कि ऐसे प्लेटफॉर्म अपने-आप संवेदनशील इलाकों के रास्तों को फिल्टर कर दें. हालांकि, ऐसा करना आसान नहीं है.

नेशनल नेचुरल लैंडस्केप्स एसोसिएशन की नील लारोंडेल बताती हैं कि सिर्फ जर्मनी में, करीब 2 लाख 50 हजार संरक्षित इलाके हैं. इन इलाकों के अपने-अपने नियम और कानून हैं. नेशनल नेचुरल लैंडस्केप्स एसोसिएशन जर्मनी के राष्ट्रीय उद्यानों, बायोस्फीयर रिजर्व, प्रमाणित जंगलों का संगठन है, जो संरक्षित इलाकों का प्रबंधन करता है.

राष्ट्रीय उद्यानों में आमतौर पर संकेत होते हैं कि किस क्षेत्र में जाने की मनाही है और कहां जाने की इजाजत है. हालांकि, लारोंडेल का कहना है कि इन इलाकों के बारे में ऑनलाइन प्लैटफॉर्म पर भी जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए ताकि लोगों को अपनी योजना बनाने में मदद मिल सके.

तस्वीरेंः मोबाइल की आंधी में उड़ गई चीजें

यही कारण है कि उनका संगठन प्रकृति के संरक्षण से जुड़े दूसरे समूहों, मैदान में खेले जाने वाले खेलों और छुट्टियां मनाने की जगहों से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ मिलकर काम कर रहा है, ताकि प्रकृतिक इलाके से जुड़े नियमों को डिजिटाइज किया जा सके.

वह कहती हैं, "हम स्टैंडर्ड यूजर इंटरफेस बनाना चाहते हैं, ताकि हर एक पार्क में वहां के नियमों का पालन हो सके. यह डेटा दूसरे प्लैटफॉर्म और ऐप्लिकेशन पर भी उपलब्ध रहेगा."

लारोंडेल का मानना है कि प्रकृतिक इलाकों में जाने वाले ज्यादातर लोग प्रकृति की सुरक्षा करना भी चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि ऐसा करना कैसे हैं. वह कहती हैं, "हमारा काम उन्हें जागरूक करना है."

रिपोर्टः जीनेट स्वीएंक

 

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