इतिहास में आज: 17 सितंबर | ताना बाना | DW | 12.09.2018
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ताना बाना

इतिहास में आज: 17 सितंबर

क्रमिक विकास का सिद्धांत देने वाले चार्ल्स डार्विन 1835 में आज ही के दिन गालापागोस नाम के द्वीप पर पहुंचे. यहीं से उन्होंने वो जानकारी जमा की जिसने बाद में "थियरी ऑफ एवोल्यूशन" की शक्ल ली.

चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड में हुआ. 1827 में उन्होंने कैम्ब्रिज के क्राइस्ट कॉलेज में पढ़ाई शुरू की. वनस्पति विज्ञान के उनके प्रोफेसर जॉन स्टीवंस हेन्सलो ने पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं में उनकी रुचि को देखा. उन्होंने ही युवा चार्ल्स को एचएमएस बीगल नाम के जहाज पर जाने के लिए कहा.

यह जहाज दूर दराज जगहों पर जा कर वहां की पारिस्थितिकी पर शोध करने जा रहा था. चार्ल्स डार्विन की उम्र उस वक्त 22 साल थी और उनके पिता इस यात्रा के सख्त खिलाफ थे. इसके बावजूद उन्होंने जहाज पर जाने का फैसला किया और 1831 से 1836 तक पांच सालों के लिए यात्रा पर रहे.

15 सितंबर 1835 को प्रशांत महासागर में गालापागोस द्वीप दिखाई दिए. ये द्वीपों का एक ऐसा समूह है जो ज्वालामुखी के कारण बने हैं. 17 सितंबर को जहाज इस समूह के चैथम नाम के द्वीप पर पहुंचा. यहां उतरते ही डार्विन ने वहां मौजूद पौधों पर ध्यान दिया. अधिकतर उन्हें कैक्टस ही दिखाई दिए.

यहां कछुए करते हैं इंसानों का स्वागत

शुरू में कोई जानवर भी नहीं दिखे लेकिन धीरे धीरे समझ आया कि द्वीप पर कुछ रास्ते बने हुए हैं, जो पानी की ओर जाते हैं. ये रास्ते कछुओं ने बनाए थे, जो यहां बड़ी संख्या में थे. आज भी गालापागोस में विशाल कछुए मिलते हैं, जिनका वजन 100 किलो तक होता है. इन कछुओं ने डार्विन के शोध में बड़ी भूमिका निभाई.

अगले कुछ हफ्तों में डार्विन अपनी टीम के साथ गालापागोस के बाकी द्वीपों पर भी पहुंचे. हर द्वीप से उन्होंने पौधों, पक्षियों और जानवरों के सैंपल लिए. उन्होंने देखा कि भले ही द्वीप एक दूसरे के बहुत करीब थे, फिर भी हर द्वीप पर अलग किस्म के जानवर और पक्षी रह रहे थे.

मिसाल के तौर पर एक द्वीप पर विशाल छिपकलियां थीं जो और किसी भी द्वीप पर नहीं दिखीं. साथ ही यहां मिलने वाले जीवों का आकर सामान्य से काफी बड़ा था. 20 अक्टूबर 1835 को आखिरकार नमूने लेकर जहाज गालापागोस से रवाना हो गया.

बाद में यहीं से जमा की गई जानकारी के आधार पर चार्ल्स डार्विन ने क्रमिक विकास का सिद्धांत रचा. 1859 में उन्होंने इसके बारे में अपनी किताब "ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज" में लिखा, जिसे विज्ञान जगत में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है.

ऐसा है गालापागोस द्वीप

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