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तस्वीर: Sibylle Licht/DW
शिक्षाअफगानिस्तान

तालिबान के लड़ाकों ने उठाईं किताबें, लौटे स्कूल

११ अगस्त २०२२

तालिबान के लिए लड़ने वाले सैकड़ों युवा अब स्कूल-कॉलेजों की ओर लौट रहे हैं. वे कंप्यूटर और अंग्रेजी जैसी पढ़ाई कर रहे हैं और देश सेवा करना चाहते हैं.

https://www.dw.com/hi/taliban-fighters-swap-arms-for-books-as-hundreds-return-to-school/a-62776255

गुल आगा जलाली की रातें जगह-जगह बम लगाने में गुजरती थीं. उनका एक ही मकसद था कि किसी तरह किसी अफगान सैनिक या किसी विदेशी सैनिक को निशाना बनाया जाए. सालों तक तालिबान के लिए लड़ने वाले 23 साल के जलाली ने अब नई राह पकड़ ली है. वह अंग्रेजी और कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रहे हैं. राजधानी काबुल में उन्होंने एक कोर्स में दाखिला ले लिया है.

अफगानिस्तान के परिवहन और नागर विमानन मंत्रालय में काम करने वाले जलाल बताते हैं, "जब हमारे देश पर काफिरों का कब्जा था, तब हमें बम, तोप और बंदूकों की जरूरत थी. अब शिक्षा की ज्यादा जरूरत है.”

पिछले साल अगस्त में तालिबान ने अफगानिस्तान की सरकार को बेदखल कर देश की सत्ता कब्जा ली थी. तब से सैकड़ों तालिबान लड़ाके स्कूल लौट चुके हैं. कई मामलों में तो उनके कमांडरों ने उन्हें पढ़ने को भेजा है.

मदरसों से हुई शुरुआत

अरबी में तालिब शब्द का अर्थ ही होता है छात्र. तालिबानी आंदोलन को यह नाम इसलिए मिला क्योंकि 1990 के दशक में दक्षिण अफगानिस्तान के मदरसों से इसकी शुरुआत हुई थी जब देश पर सोवियत संघ की सेनाएं काबिज थीं.

ज्यादातर तालिबान इन मदरसों में ही पढ़े थे, जहां कुरान और अन्य इस्लामिक अध्ययन कराए जाते हैं. देश के रूढ़िवादी तबके और खासतौर पर तालिबान में आधुनिक शिक्षा को लेकर कई तरह के संदेह हैं. हां, उन विषयों को लेकर दिक्कत कम है जिनका प्रायोगिक इस्तेमाल हो सकता है जैसे कि इंजीनियरिंग या मेडिसन आदि.

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पांच साल तक तालिबान के लिए बम प्लांट करने वाले जलाली कहते हैं, "दुनिया आगे बढ़ रही है. हमें विकास और तकनीक की जरूरत है.” वह उन एक दर्जन तालिबानों में शामिल हैं जो परिवहन मंत्रालय में कंप्यूटर कोर्स कर रहे हैं.

तालिबान सरकार के प्रवक्त बिलाल करीमी कहते हैं कि जलाली जैसे लोगों की स्कूल जाने की इच्छा दिखाती है कि अफगान शिक्षा के लिए कितना उत्सुक हैं. वह बताते हैं, "बहुत से ऐसे मुजाहिदीन स्कूलों में पहुंच रहे हैं और अपने पसंदीदा कोर्स पढ़ रहे हैं, जो तब अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए थे.”

शिक्षा पर विवाद

इस तमाम पहल के बावजूद अफगानिस्तान में शिक्षा एक विवाद विषय है. तालिबान के सत्ता में आने के बाद से सेकेंड्री स्कूलों में लड़कियों के पढ़ने पर पाबंदी लगा दी गई और उनके दोबारा स्कूलों में लौटने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है. ऐसा तब है जबकि तालिबान सरकार ने लड़कियों पर पाबंदियां ना लगाने के वादे किए थे.

स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव भी किए जा रहे हैं. स्कूलों और विश्वविद्यालयों में संगीत और मूर्तिकला की पढ़ाई बंद कर दी गई है. अफगानिस्तान के शिक्षक देश छोड़ रहे हैं और स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाने वालों की भारी किल्लत है.

इन हालात के बावजूद जलाली जैसे छात्रों की योजनाएं बड़ी हैं. काबुल के मुस्लिम इंस्टिट्यूट में तीन हजार से ज्यादा छात्र हैं जिनमें से करीब आधी महिलाएं हैं. इनमें लगभग 300 तालिबानी लड़ाके हैं. इनमें से ज्यादातर को अपनी बड़ी दाढ़ी और पगड़ियों से पहचाना जा सकता है.

हाल ही में जब एक पत्रकार ने संस्थान का दौरा किया तो उसने एक लड़ाके को क्लास के बाद अपनी अलमारी से पिस्तौल निकालतते देखा. संस्थान के एक कर्मचारी ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया, "जब वे आते हैं तो अपने हथियार जमा करा देते हैं. वे किसी तरह की जोर-जबर्दस्ती नहीं करते और अपनी ताकत का कोई फायदा नहीं उठाते.”

देश के लिए पढ़ना है

इन्हीं छात्रों में हैं अमानुल्ला मुबारिज. मुबारिज ने 18 साल की उम्र में तालिबान के लिए बंदूक उठाई थी. लेकिन पढ़ने की इच्छा उन्होंने कभी नहीं छोड़ी थी. वह बताते हैं, "मैंने भारत में एक यूनिवर्सिटी में अप्लाई किया था लेकिन अंग्रेजी के टेस्ट में फेल हो गया.”

मुबारिज अब 25 साल के हैं और तालिबान के लिए ही काम करते हैं. हालांकि वह यह नहीं बताते कि क्या काम कर रहे हैं. वह कहते हैं, "अब मैंने यहां (मुस्लिम इंस्टिट्यूट) दाखिला लिया है.”

एक अन्य छात्र मोहम्मद साबिर को यह बताने में कोई परहेज नहीं कि वह तालिबानी जासूसी एजेंसी के लिए काम करते हैं. साथ ही वह एक निजी संस्थान दावत यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे हैं. वह बताते हैं, "इस्लामिक अमीरात की जीत के बाद इसी साल मैंने पढ़ाई दोबारा शुरू की.” जलाली की तरह उन्होंने भी तालिबान के लिए लड़ने के वास्ते पढ़ाई छोड़ दी थी.

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जितने भी छात्रों ने इस पत्रकार से बात की, सभी ने कहा कि वे अपनी पढ़ाई का प्रयोग देश के विकास के लिए करना चाहते हैं. और वे लड़कियों की पढ़ाई पर पाबंदी को लेकर क्या सोचते हैं? मुबारिज कहते हैं, "निजी तौर पर, एक युवा, एक छात्र और अमीरात का एक सदस्य होने के तौर पर मैं सोचता हूं कि उन्हें शिक्षा का हक है. वे भी हमारी तरह देश की सेवा कर सकती हैं.”

जलाली कहते हैं, "इस देश को उनकी भी उतनी ही जरूरत है जितनी हमारी है.”

वीके/सीके (एएफपी)

 

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