मर्द को दर्द नहीं होता और हीरो को कभी डिप्रेशन नहीं होता | ब्लॉग | DW | 07.09.2020

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ब्लॉग

मर्द को दर्द नहीं होता और हीरो को कभी डिप्रेशन नहीं होता

अगर आपसे कह दिया जाए कि आपका हीरो शायद मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर है, शायद उसे कुछ चीजों से डर भी लगता है, शायद उसे डिप्रेशन है, तो आप यह बात कैसे मान लेंगे?

कोरोना काल देशों की अर्थव्यवस्था को भले ही बिगाड़ रहा हो लेकिन मीडिया को इससे खूब फायदा हुआ है. न्यूज चैनल हों या डिजिटल प्लैटफॉर्म, सबकी व्यूअरशिप बढ़ी है. अब लोग फिल्में देखने मूवी हॉल में तो जा नहीं सकते और ना ही बाहर घूमना फिरना इस दौरान मुमकिन है. तो जाहिर है कि टीवी और इंटरनेट ही मनोरंजन का एकमात्र जरिया है. न्यूज चैनल खास कर इस मनोरंजन में बड़ा योगदान दे रहे हैं.

डिजिटल के आने के बाद से फिल्मी कहानियों में कुछ बदलाव आए हैं वरना अब तक फिल्में एक सिंपल फॉर्मूले पर ही चल रही थी - एक हीरो, एक हीरोइन (जिसका काम सिर्फ खूबसूरत दिखना और नाचना था) और एक विलन. पूरी फिल्म हीरो बनाम विलन पर चलती थी. न्यूज चैनल भी इन दिनों यही कहानी चला रहे हैं. इस कहानी में सुशांत हीरो हैं और रिया विलन. लोगों को यह कहानी देखने में मजा भी खूब आ रहा है. लेकिन फिल्म थोड़ी लंबी खिंच गई है. अब लोगों से क्लाइमैक्स का और इंतजार नहीं हो रहा. बस अब विलन को मारो, हीरो की जय जयकार करो और घर जाओ.

इन सीधी सादी फिल्मी कहानियों में हीरो के पास सभी खूबियां होती हैं: अच्छी हाइट, कमाल के लुक्स, सॉलिड बॉडी, बेहतरीन डांसर और एक्शन में जबरदस्त. कुल मिला कर एक ऐसा परफेक्ट इंसान, जो आपको असली जिंदगी में कभी नहीं मिलेगा. लेकिन असली हीरो तो वही है, जिसके पास ये सब है.

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ईशा भाटिया सानन

अब अगर आपसे कह दिया जाए कि आपका हीरो शायद मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर है, शायद उसे कुछ चीजों से डर भी लगता है, शायद उसे डिप्रेशन है, तो आप यह बात कैसे मान लेंगे? अरे भई, वो हीरो है हीरो! जैसे "मर्द को दर्द नहीं होता" वैसे ही हीरो को कभी डिप्रेशन नहीं होता. हीरो सुपरमैन जैसा होता है, वो कोई आम इंसान नहीं होता. डर तो उसे छू भी नहीं सकता. हां, वो बेचारा भोला भाला जरूर हो सकता है. इतना भोला कि किसी "चुड़ैल" के जाल में फंस जाए. भोली सूरत बना कर वो उस पर काला जादू कर दे. अब इसमें हीरो की क्या गलती है?

टीवी चैनलों, व्हाट्सऐप ग्रुपों और सोशल मीडिया पर चल रही बहस से मुझे यही समझ आता है कि बतौर समाज हम यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि हमारे हीरो को कभी डिप्रेशन भी हो सकता है. और इस यकीन की वजह भी फिल्में ही हैं. क्योंकि "सीधी सादी" फिल्मों में डिप्रेशन या किसी भी तरह के मानसिक रोग का मतलब होता है एक पागल शख्स.

पहले गांव में बिखरे हुए बाल और फटे हुए कपड़े पहने किसी लड़की को "पगली" बना कर दिखाया जाता था और अब खूब शराब और ड्रग्स लेने वाली हायफाय चीखने चिल्लाने वाली को. जरा सोचिए, हिन्दी फिल्मों के 100 साल के इतिहास में कितनी बार डिप्रेशन जैसे गंभीर मुद्दे को संवेदनशीलता के साथ पेश किया गया है?

आंकड़ों के अनुसार भारत की करीब 6.5 फीसदी आबादी डिप्रेशन जैसे मानसिक रोगों की शिकार है. क्योंकि आम तौर पर भारत में डिप्रेशन पर बात ही नहीं होती है, तो इस आंकड़े पर बहुत भरोसा भी नहीं किया जा सकता. "सेक्स" और "डिप्रेशन" - ये दो ऐसे शब्द हैं जिनका इस्तेमाल भारतीय परिवारों में किया ही नहीं जाता. आप ऐसे कितने परिवारों को जानते हैं जहां किसी ने घर आकर अपने मां बाप से कहा हो कि मुझे डिप्रेशन है या फिर ऐसा कितनी बार हुआ कि खांसी, जुखाम, बुखार या डायबिटीज की तरह घरों में डिप्रेशन और उसके इलाज पर चर्चा चल रही हो?

ऐसे में कोई हैरत की बात तो नहीं अगर सुशांत के पिता को उसके डिप्रेशन के बारे में ना पता हो. हंसते मुस्कुराते सुशांत की वीडियो पोस्ट कर यह सवाल करना कि "इतना खुश इंसान डिप्रेस्ड कैसे हो सकता है", यही लोगों की समझ (या नासमझी) को दिखाता है. वैसे, दिल के मरीज को भी दिन रात दिल में दर्द नहीं होता. लेकिन जब होता है, तो वो उसकी जान ले सकता है. डिप्रेशन भी एक बीमारी है. बस, शारीरिक ना हो कर मानसिक है. लेकिन काम वो भी ऐसे ही करती है. पर खैर, हीरो को तो कभी डिप्रेशन होता ही नहीं. तो आगे बढ़ते हैं.

आगे वो लोग हैं, जो मेंटल हेल्थ को समझने के नाम पर अपनी कहानियां सुनाने में लगे हैं और दूसरों पर जहर उगल रहे हैं. अगर आपको सच में मेंटल हेल्थ की समझ होती, तो आप दूसरों को तनाव देने की जगह उसे कम करने पर काम करते. लेकिन, जनता को ऐसे लोग बहुत पसंद आ रहे हैं. जानते हैं क्यों? क्योंकि इंटरवल से पहले हमारा जो हीरो मर गया था, उसका इंसाफ करने के लिए इन्हीं की तो जरूरत है. विलन से अब यही तो लड़ रहे हैं. फिल्म को क्लाइमैक्स तक यही तो ले जाएंगे.

खुद को पत्रकार और इन्फ्लुएंसर कहने वाले इन लोगों के पास मौका था देश की जनता को डिप्रेशन और मेंटल हेल्थ के बारे में जागरूक करने का. लेकिन ऐसी रूखी सूखी कहानी में ना तो किसी को मजा आता और ना ही कमाई होती. तो फिर उसी पुरानी कहानी को ही चलने देते हैं और इंतजार करते हैं कि एक दिन डिप्रेशन वाली कहानियां भी बिकेंगी. एक दिन "हीरो" की परिभाषा बदलेगी. वो परफेक्ट ना हो कर, आम इंसान होगा जिसकी अपनी कुछ समस्याएं भी होंगी. और ना तो वो हमें उन दिक्कतों के बारे में बताते हुए शरमाएगा और ना ही हम उसकी परेशानियों को सुनते हुए उसे जज करेंगे. पर ऐसे वक्त के लिए अभी शायद बहुत लंबा इंतजार करना होगा.

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