जापान में ″बात करने से″ कम हुई खुदकुशी दर | दुनिया | DW | 08.04.2019
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दुनिया

जापान में "बात करने से" कम हुई खुदकुशी दर

कभी सूखे के कारण किसानों की खुदकुशी, कभी परीक्षा के नतीजों के बाद छात्रों की खुदकुशी, तो कभी दहेज की मांग से परेशान हो कर महिला की खुदकुशी. भारत आत्महत्या के मुद्दे से अनजान नहीं है. कुछ ऐसा ही हाल जापान का भी है.

रात आठ बजे हॉटलाइन खुलती है और खुलते ही सभी फोन व्यस्त हो जाते हैं. माचीको नाकायामा वॉलंटियर हैं. फोन करने वाले से पूछ रही हैं, "काम पर दिक्कत है? या फिर घर में कुछ हुआ? तुम मरना चाहते हो? क्यों?" टोक्यो से करीब 450 किलोमीटर दूर अकीता प्रांत में ये हॉटलाइन पिछले 15 सालों से चल रही है. आंकड़े दिखाते हैं कि जापान को इसका फायदा मिला है. यहां आत्महत्या के मामलों में 40 फीसदी कमी आई है.

जापान में खुदकुशी का लंबा इतिहास रहा है. जहां बदनामी का डर हुआ, वहीं अपनी जान लेने का फैसला कर लिया. 2003 में देश में खुदकुशी के 34,427 मामले दर्ज किए गए. यह रिकॉर्ड संख्या थी. इसलिए इस पर सिर्फ देश के अंदर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा शुरू हो गई. और फिर सरकार को कदम उठाने पड़े. अकीता हॉटलाइन में काम करने वाले हीरोकि कोसेकी बताते हैं, "लंबे वक्त तक यह सोचा जाता था कि आत्महत्या एक निजी समस्या है और सरकार का इससे कोई लेना देना नहीं है."

अकीता प्रांत जापान ही वो जगह है जहां सबसे ज्यादा खुदकुशी के मामले दर्ज किए जाते हैं, जबकि यहां की जनसंख्या दस लाख से भी कम है. जानकार इसके कई कारण बताते हैं. जैसे कि यहां विकास का अभाव, नौकरियों की कमी, लंबी सर्दियां, लोगों पर चढ़ा कर्ज और अकेले रहने वाले वृद्ध लोगों की बड़ी संख्या. 1999 में पहली बार अकीता के राज्यपाल ने खुदकुशियों पर रोक के लिए बजट का आवंटन किया. ना केवल मीडिया में इस पर सुर्खियां बनीं, बल्कि नागरिकों ने भी इसकी तारीफ की और सैकड़ों की संख्या में लोग वॉलंटियर के तौर पर मदद करने के लिए आगे आए.

अकीता सूएई लेखक हैं और सुसाइड एक्टिविस्ट भी. 1955 में उनकी मां ने अपनी जान ले ली थी. तब वे बच्चे थे. इसके बाद उन्होंने खुद भी लंबा वक्त डिप्रेशन में गुजारा, "क्योंकि मैं किसी से भी अपनी भावनाओं के बारे में बात नहीं कर पा रहा था, इसलिए मैं घुटने लगा था. लेकिन फिर जब मैंने बात करना शुरू किया, अचानक ही मेरा मन हल्का होने लगा." हॉटलाइन का अधिकतर लोगों पर इसी तरह का असर देखा गया है. वॉलंटियरों का काम है कि लोगों से बात करें और उन्हें बताएं कि वे अकेले नहीं हैं. कुछ मामलों में वॉलंटियर लोगों से मिलने भी जाते हैं. आंकड़े दिखाते हैं कि महज लोगों से बात करने से उन्हें अपनी जान लेने से रोका जा सकता है.

डिप्रेशन का ज्यादा खतरा किसे

बीफ्रेंडर्स वर्ल्डवाइड टोक्यो नाम की हॉटलाइन रात आठ बजे से सुबह साढ़े पांच बजे तक खुली रहती है. रात में डिप्रेशन लोगों का ज्यादा परेशान करता है. यहां काम करने वाले नाकायामा बताते हैं कि रात भर फोन की घंटी बजती रहती है, "अगर कुछ मिनटों के लिए भी घंटी बजनी बंद हो जाए, तो हमें चिंता होने लगती है कि कहीं लाइन तो खराब नहीं हो गई."

ये जापान में चलने वाली एकमात्र हॉटलाइन नहीं है. ऐसी और भी कई सेवाएं हैं. अकसर मेट्रो स्टेशनों पर इनके बोर्ड देखने को मिलते हैं जिन पर लिखा होता है, "क्या आप परेशान हैं? हम आपका मूड ठीक कर सकते हैं." मेट्रो स्टेशन पर बोर्ड लगाने की एक बड़ी वजह ये भी है कि कई बार लोग यहां खुदकुशी करने आते हैं.

क्योंकि जापान का नाम हमेशा आधुनिक तकनीक के साथ जुड़ा रहता है, इसलिए अकसर ऐसा समझा जाता है कि जापान का समाज भी काफी आधुनिक है. लेकिन सच्चाई इससे अलग है. काफी हद तक भारत की ही तरह जापान में भी पुरुषों और महिलाओं की सामाजिक जिम्मेदारियां बंटी हुई दिखती हैं. पुरुष खुल कर अपनी भावनाएं नहीं दिखाते और कर्ज और कारोबार में नुकसान जैसे मामलों में बदनामी के डर से अपनी जान ले लेते हैं.

इस सब के मद्देनजर 2007 में देश में एक सुसाइड प्रिवेंशन प्लैन लाया गया. सरकारी एजेंसियों ने समझने की कोशिश की कि किन परिस्थितियों के चलते लोग अपनी जान लेने पर विवश हो जाते हैं. फिर 2016 से प्रांतों को सुविधा दी गई की स्थानीय जरूरतों के हिसाब से बदलाव लाए जाएं. मिसाल के तौर पर जो लोग दफ्तर में बहुत ज्यादा काम के कारण तनाव में हैं, उनके लिए छुट्टी लेना आसान बनाया गया है. साथ ही उन्हें मानसिक रूप से समर्थन भी दिया जाता है. इसके अलावा 50 कर्मचारियों से ज्यादा वाली कंपनियों में सालाना स्ट्रेस टेस्ट कराना अनिवार्य हो गया है. नतीजतन जापान में खुदकुशी दर एक लाख में 27 से घट कर 16.3 हो गया है. अब सरकार 2027 तक इसे 13 तक पहुंचाना चाहती है.

आईबी/एके (रॉयटर्स)

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