बीजेपी और शिवसेना की टक्कर का फायदा किसको हुआ? | दुनिया | DW | 24.02.2017
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दुनिया

बीजेपी और शिवसेना की टक्कर का फायदा किसको हुआ?

बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी चुनावों में अकेले उतरकर शिवसेना ने जो दांव खेला था उसका फायदा उसे हुआ है. भाजपा के प्रदर्शन में भी जबरदस्त सुधार आया है लेकिन शिवसेना के साथ अहंकार की लड़ाई में उसे कड़ी टक्कर मिली है.

पिछले दो दशकों से बीएमसी में काबिज शिवसेना और भाजपा ने इस बार अलग-अलग चुनाव लड़ा और दोनों ही पार्टियों को इसका फायदा मिला है. शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो उभरी है लेकिन वह अकेले बहुमत पाने की स्थिति में नहीं है. चुनाव में मिली सफलता शिवसेना के लिए आत्मसम्मान की वापसी की तरह है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्हीं के आक्रामक अंदाज में चुनौती देने वाले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की साख भी इस जीत के साथ बढ़ेगी.

झटपटाहट से मुक्ति

राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार के बाद से ही महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन दरकने लगा था लेकिन मजबूरी के चलते इन दोनों दलों का साथ केंद्र और राज्य की सरकार में बना हुआ है. मोदी के लगातार बढ़ते कद के कारण गठबंधन में शिवसेना की धमक कमजोर होती जा रही थी. शिवसेना की झटपटाहट और बेचैनी को कई बार महसूस किया गया है. कुछ मौकों पर शिवसेना ने अपने इस दर्द को सार्वजानिक भी किया. अब जबकि बीएमसी चुनावों में शिवसेना ने अपनी ताकत का अहसास करा दिया है, भाजपा, राज्य या केंद्र में शिवसेना की अधिक उपेक्षा नहीं कर सकती.

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गुजरात और गोवा पर भी नज़र

क्षेत्रीय पार्टी होने के बावजूद शिवसेना स्वयं को भाजपा से ज्यादा हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी मानती है. केंद्र सरकार में साथ होने के बावजूद मोदी सरकार के कई बड़े फैसलों पर सवाल उठाने वाली शिवसेना ने अपनी स्वतंत्रता और आक्रामकता को बनाये रखा है. राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर खुलकर बोलने वाली शिवसेना अब गुजरात और गोवा में भाजपा को आँखे दिखा सकती है. गोवा विधानसभा चुनाव में वह भाजपा विरोधी खेमे में थी और अब उसकी नज़र गुजरात पर है. इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल को अपना चेहरा बनाकर वहां भाजपा की मुश्किलें बढ़ा सकती है.

‘मोदी आभामंडल' को खतरा

मुंबई और दिल्ली देश के दो ऐसे शहर हैं जो किसी ना किसी कारण से राष्ट्रीय मीडिया में रहते हैं. यहाँ होने वाली हर छोटी बड़ी घटनाओं का राजनीति पर असर पड़ता है. राजनीतिक नेताओं के प्रति धारणा बनाने और खंडित करने का काम भी इन दो शहरों से होता है. देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धुर विरोधी अरविन्द केजरीवाल की सरकार है. वह और उनकी पार्टी ‘मोदी आभामंडल' को नुकसान पहुँचाने का कोई मौका नहीं गंवाती. अब देश की आर्थिक राजधानी में भी ‘मोदी आभामंडल' को चुनौती देने वाले उद्धव ठाकरे की बादशाहत कायम होने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में लोगों की धारणा पर असर पड़ सकता है.

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व्यावहारिक होगी साझेदारी

बीएमसी चुनावों के नतीजे भाजपा और शिवसेना के रिश्तों के लिए ‘शक्ति संतुलन' का काम करेगा. इन चुनावों में सफलता के बावजूद शिवसेना को पता है कि राज्य के विदर्भ और मराठवाड़ा में उसकी ज़मीन खिसक रही है. शिवसेना के लिए केंद्र और राज्य की सत्ता को छोड़ना आसान नहीं है. इसलिए इन दोनों सरकारों की आलोचना करते समय उसे उदारता दिखानी पड़ेगी. वहीँ भाजपा को शिवसेना जैसी जनाधार वाली पार्टियों की जरूरत अभी भी है. शिवसेना से दुश्मनी भाजपा के ‘मोदी आभामंडल' को नुकसान पहुंचा सकती है. कम से कम भाजपा इस जोखिम को उठाना नहीं चाहेगी.

दोनों ही दल वैचारिक रूप से करीब हैं, और बरसों साथ रहने का उन्हें अनुभव भी है. बीएमसी चुनाव के दौरान कटुता को भूलकर दोनों दल फिर साथ आ सकते हैं. हो सकता है कि चुनाव परिणाम से सबक लेते हुए दोनों ही पार्टी एक दूसरे के प्रति अधिक ज़िम्मेदार, उदार और व्यावहारिक बन जायें.

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