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सऊदी अरब के अंतरराष्ट्रीय निवेश से डर
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि सऊदी अरब अपना पैसा आलोचकों को दबाने में खर्च करता हैतस्वीर: John Macdougall/AFP/Getty Images

सऊदी अरब के अंतरराष्ट्रीय निवेश से डर कैसा?

कैथरीन शेअर
४ अक्टूबर २०२२

सऊदी अरब अपनी तेल संपदा का इस्तेमाल दूसरे देशों में भारी निवेश के लिये कर रहा है और अर्थव्यवस्था को बदलने की कोशिश में है. हालांकि आलोचकों को चिंता है कि ये आर्थिक ताकत राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल की जा सकती है.

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सऊदी अरब का बायकॉट करने की नियमित रूप से मांग होती रहती है और इसका कारण है मानवाधिकारों को लेकर देश का खराब रिकॉर्ड. हालांकि वास्तव में अगर कोई ऐसा करना चाहे तो उसके लिये मुश्किल होती है क्योंकि तब उन्हें देश के अंतरराष्ट्रीय निवेशों से भी दूर जाना होगा.

पिछले छह सालों में अंतरराष्ट्रीय निवेश नाटकीय रूप से बढ़ गया है. सऊदी अरब का सरकारी फंड यानी निवेश फंड अब एमेजॉन, गूगल, वीजा, माइक्रोसॉफ्ट, डिज्नी, निंटेंडो, ऊबर, पेपाल और जूम जैसी कई कंपनियों में हिस्सेदार बन गया है.

यह निवेश फंड हॉलीडे कंपनी कार्निवाल, ब्रिटिश फुटबॉल टीम न्यूकासल यूनाइटेड, एक विवादित प्रोफेशनल गोल्फ टूर्नामेंट और दुनिया के सबसे बड़े एसेट मैनेजर ब्लैकरॉक के साथ रिश्तों को मजबूत कर चुका है. वास्तव में जब भी आप स्टारबक्स का कैरामेल मोका लाते खरीदते हैं या फिर ऑनलाइन गेम वर्ल्ड ऑफ वारक्राफ्ट खेलते हैं तो आप सऊदी निवेश को भी मदद दे रहे होते हैं.

सऊदी अरब के अंतरराष्ट्रीय निवेश से डर
ब्रिटेन के फुटबॉल क्लब में सऊदी अरब ने 80 फीसदी हिस्सेदारी खरीद ली हैतस्वीर: Owen Humphreys/PA Wire/empics/picture alliance

बड़े बदलाव

इन जानी मानी कंपनियों में सऊदी अरब की हिस्सेदारी के पीछे कारण है पब्लिक इनवेस्टमेंट फंड यानी पीआईएफ. ज्यादातर देशों के पास सरकारी निवेश कोष है और सऊदी अरब भी कोई अपवाद नहीं है. पीआईएफ को 1971 में शुरू किया गया था लेकिन हाल के वर्षों तक सऊदी अरब सिर्फ छोटे स्तर के घरेलू निवेश में ही पैसा डालता था और वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निवेश का बड़ा खिलाड़ी नहीं था.

2015 में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी एमबीएसने अपने नाम पर राजशाही की संपत्ति को संगठित करना शुरू कर दिया. एमबीएस ने देश को आधुनिक बनाने की अपनी योजना के केंद्र में पीआईएफ को रखा और अर्थव्यवस्था को तेल से दूर ले जाने की शुरूआत कर दी.

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी की सीनियर रिसर्चर कारेन यंग ने 2019 में मध्यपूर्व के राजनीति शास्त्र के एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट में लिखा था, "सऊदी अरब की राजनीतिक अर्थव्यस्था में इसकी (पीआईएफ) की भूमिका अभूतपूर्व है. एमबीएस के नये सऊदी अरब में यह विकास का मुख्य इंजिन है. सरकार के संसाधन पीआईएफ को दिये जा रहे हैं और सरकारी संपत्तियों को बेच कर पीआईएफ के लिये धन जुटाया जा रहा है."

यंग की दलील है कि एमबीएस को तेज बदलाव और तेजी से पैसा बनाने का मौका देने के अलावा पीआईएफ प्रिंस को अंदरूनी विरोध और निजी कंपनियों में उचित भूमिका के वैकल्पिक विचारों के खिलाफ एक मजबूती दे रहा है"

सऊदी अरब के अंतरराष्ट्रीय निवेश से डर
सॉफ्ट बैंक विजन फंड में सऊदी अरब के पीआईएफ ने 45 अरब डॉलर का निवेश कियातस्वीर: Tsuyoshi Oishi/Jiji Press/picture alliance/dpa

बड़ी महत्वाकांछाएं

पीआईएफ के लिए सऊदी अरब का अंतिम लक्ष्य है 2030 तक 2,000 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ उसे दुनिया का सबसे बड़ा और "सबसे प्रभावशाली" सरकारी निवेश फंड बनाना. फिलहाल इसकी कीमत करीब 620 अरब अमेरिकी डॉलर है. 2015 की तुलना में यह रकम करीब चार गुनी ज्यादा है.

नॉर्वे का सरकारी निवेश फंड करीब 1,400 अरब अमेरिकी डॉलर की संपत्ति संभालता है और दुनिया में सबसे बड़ा है. सऊदी अरब का पीआईएफ फिलहाल इस मामले में छठे नंबर पर है.

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हालांकि पीआईएफ के ऊपर जाने की संभावनाएं अच्छी दिख रही हैं. यूक्रेन पर रूसी हमले के कारण वैश्विक ऊर्जा संकट में तेल की कीमतें काफी ज्यादा बढ़ गई हैं. दुनिया में तेल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश सऊदी अरब इसके नतीजे में बजट सरप्लस की उम्मीद कर रहा है जो बीते 10 सालों में पहली बार होगा. इसके साथ ही यह भी उम्मीद है कि वह पीआईएफ में और ज्यादा धन डालेगा.

पीआईएफ और उसके पीछे खड़े निरंकुश नेता के और ज्यादा मजबूत होने से कुछ पर्यवेक्षक चिंता में हैं. क्या यह सारा अंतरराष्ट्रीय निवेश राजनीतिक ताकत के समान है? क्या सऊदी अरब पीआईएफ का इस्तेमाल अपने विदेश नीति के लक्ष्यों को हासिल करने में करेगा?

गंदा पैसा

पिछले साल एमनेस्टी इंटरनेशनल सऊदी अरब के न्यूकासल यूनाइटेड का अधिग्रहण करने पर चिंता जताई और इसे मानवाधिकार उल्लंघनों के "स्पोर्ट्सवाशिंग" का एक तरीका कहा. आलोचक यही बात एलआईवी गोल्फ टूर्नामेंट और सऊदी अरब में फॉर्मूला वन रेस के बारे में भी कह चुके हैं.

सवाल को ट्वीटर में पीआईएफ के एक बड़े मकर अप्रत्यक्ष निवेश को लेकर भी पूछे जा रहे हैं. क्या इस सोशल मीडिया कंपनी पर 2015 में सऊदी जासूसी विवाद के वक्त सऊदी सरकार के प्रभाव में काम किया था. ट्वीटर ने इससे इनकार करते हुए कहा था कि निवेशकों की रोजमर्रा के काम में कोई भूमिका नहीं होता.

सऊदी अरब ने पीआईएफ और जापान के सॉफ्ट बैंक जैसे दूसरे फंड के जरिये जापान अमेरिकी तकनीक जगत में भी अरबों डॉलर का निवेश किया है. इस बारे में जानकारी रखने वाले अमेरिकी विशेषज्ञ कारा स्विशर की दलील है, "अगर आप ग्लोबल नेटवर्क से सऊदी को हटा दें तो सब कुछ ढह जायेगा."

2019 में पीआईएफ यूरोप या जर्मनी में सीधे निवेश करने नहीं आया. जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स या एसडब्ल्यूपी के रिसर्च रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई.

हालांकि अब यह बदल सकता है. कोलंबिया यूनिवर्सिटी के यंग ने डीडब्ल्यू को बताया कि हाल ही में खाड़ी देश के सरकारी निवेश फंडों ने ग्रीस में निवेश पर निगाहें दौड़ाई है इसके साथ ही वो जर्मन के साथ ही ऊर्जा को लेकर करार करना चाहते हैं.

 सऊदी अरब के अंतरराष्ट्रीय निवेश से डर
जर्मन चांसलर हाल ही में सऊदी अरब गये थे ऊर्जा में निवेश पर बात करनेतस्वीर: Balkis Press/abaca/picture alliance

राजनीतिक असर का आकलन

एसडब्ल्यूपी ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी थी, "पीआईएफ को यूरोप में निवेश गतिविधियां बढ़ाने देना चाहिये या नहीं इसके लिये फंड और सऊदी सरकार के रिश्ते देखते हुए इसके राजनीतिक असर का आकलन अवश्य होना चाहिए. इस बात का आकलन किया जाना चाहिये कि पीआईएफ सिर्फ मुनाफा चाहने वाले निवेशक के रूप में निवेश करना चाहती है या फिर यह विदेश नीति का कोई एजेंडा आगे बढ़ाना चाहती है."

फिलहाल पीआईएफ एक मुनाफा चाहने वाले निवेशक के तौर पर ही काम कर रही है. यंग का कहना है, "यह स्थानीय निवेश और सऊदी अर्थव्यवस्था में बदलाव के लिए सचमुच एक घरेलू फंड ही है, यह संभव है." पीआईएफ के राजनीतिक हथियार बनने की आशंकाओं के बारे में यंग का कहना है, "फिलहाल तो प्राथमिकता घरेलू विकास, रोजगार और सऊदी अरब में स्थिरता पर है."

हालांकि जब क्षेत्रीय निवेश की बात आती है तो कहानी दूसरी होती है. सऊदी अरब समेत खाड़ी के देश लंबे समय से मिस्र जैसे देशों में आर्थिक प्रभाव के लिए एक दूसरे से होड़ लगा रहे हैं. नगदी के संकट से जूझ रहे मिस्र और आर्थिक और कर्ज संकट में घिरे तुर्की के लिए यह मुकबला और तेज हो गया है. खाड़ी के देशों में उनके अमीर पड़ोसियों को निवेश के सौदों की खरीदारी के लिये ले जाया जा रहा है. ब्रिटेन के फानेंशियल टाइम्स ने इसे "खरीदारी का मेला" कहा है.

एसडब्ल्यूपी में मध्यपूर्व और अफ्रीका डिवीजन के प्रमुख स्टेफान रॉल का कहना है, "रियाद मिस्र पर परिवार की चांदी बेचने के लिए दबाव बना रहा है." वह सरकारी कंपनियों और मुनाफा कमाने वाली निजी कंपनियों में सरकार के शेयरों की बात कह रहे थे. रॉल ने बताया, "हाल के हफ्तों में ये खबरें आई हैं कि एसईआईसी ने मिस्र की कंपनियों को खरीदा या उनमें निवेश किया है. हालांकि यह पूरी तरह पारदर्शी नहीं है. मिस्र का नागरिक समाज में इसे लेकर चिंता है और पूछा रहा है कि क्या उनका देश बेचा जा रहा है." एसईआईसी एक नई निवेश कंपनी है जिसका स्वामित्व पीआईएफ के पास है.

हालांकि वो भी यह मानते हैं कि कम से कम फइलहाल सऊदी राजनीतिक प्रभाव को लेकर कम चिंतित हैं उन्हें मुनाफे के सौदों में ज्यादा दिलचस्पी है.

हैम्बर्ग की गीगा इंस्टीट्यूट ऑफ मिडिल ईस्ट स्टडीज की रिसर्चर सारा बजूबंदी का कहना है, "तेल बाजारों में उछाल के बाद खरीदारी के ये मेले हैरानी नहीं जगाते. इस पर ध्यान देना जरूरी है कि इस तरह के फंडों के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य अभी भी मुनाफे को बढ़ाना है."

हालांकि इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा, "हर निवेश के पीछे निवेशक की कुछ खास दिलचस्पियां भी हैं और अगर निवेशक सरकार है तो बहुत संभव है कि उसके पीछे कुछ 'गैर वित्तीय' दिलचस्पियां भी शामिल हों."

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