मलेशिया में सुधारों के इंतजार में मायूस हैं शरणार्थी | दुनिया | DW | 11.10.2019
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

मलेशिया में सुधारों के इंतजार में मायूस हैं शरणार्थी

मलेशिया में 1,75,000 शरणार्थी हैं. बेहतर जिंदगी की उम्मीद लेकर मलेशिया पहुंचे ये शरणार्थी अपने हालात सुधरने का इंतजार कर रहे हैं और इंतजार में उनकी निराशा बढ़ती जा रही है.

अस्पताल में अपनी बेटी के बिस्तर के पास खड़े लुत्फुल्लाह अहमद हुसैन की आंखें डबडबा आईं. वह उसे बचा लेने की अपील कर रहे हैं. अफगानिस्तान से आए 38 साल के हुसैन मलेशिया में रहने वाले उन हजारों शरणार्थियों में से एक हैं जिनकी निराशा बढ़ती ही जा रही है. मलेशिया में हुसैन जैसे 1,75,000 शरणार्थी हैं, जिन्हें अवैध प्रवासी समझा जाता है. एक साल पहले सत्ता में आई नई सरकार ने वादा किया था कि वो शरणार्थियों के संरक्षण के लिए कई सुधार लाएगी और उन्हें काम करने की इजाजत देगी. 

लेकिन इन वादों पर अमल बहुत धीरे धीरे हो रहा है. इस धीमी गति से हुसैन जैसे शरणार्थी एक बेहतर जिंदगी की उम्मीद खोते जा रहे हैं  क्योंकि इनके पास अपनी आजीविका चलाने के लिए कोई संसाधन भी नहीं हैं. हुसैन के तीन बच्चे हैं और काबुल में हो रही हिंसा से बचने के लिए वो 2017 में अपने परिवार के साथ यहां आ गए. वो कहते हैं, "मेरे पास कोई नौकरी तो नहीं ही है, मेरे पास कोई देश भी नहीं है. कुछ भी नहीं. मेरी पत्नी रोती रहती है." उनकी 2 साल की बेटी माहद्या को ल्यूकीमिया है और उसे स्टेम सेल प्रतिरोपण की आवश्यकता है. लेकिन नौकरी के अभाव में वो इसके लिए 2,50,000 मलेशियाई रिंगगिट जुटा पाएंगे इसकी उम्मीद बहुत ही कम है.

डॉक्टरों का मानना है कि माहद्या को ऑस्ट्रेलिया में बेहतर चिकित्सा सेवा मिल पाएगी, लेकिन हुसैन का परिवार ये नहीं जानता कि वो वहां कब जा पाएंगे. मलेशिया की राजधानी कुआला लम्पुर के एक अस्पताल में हुसैन ने थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन को बताया, "मैं बहुत परेशान हूं और बहुत थक भी गया हूं. मैं क्या  कर सकता हूं? मुझे नहीं मालूम." बात करते करते बीच बीच में हुसैन का गला भर आता है. माहद्या अपने बिस्तर पर लेटी हुई मासूमियत से ऊपर की तरफ देखती, सुइयों से जख्मी अपनी नन्ही उंगलियों से अपनी सबसे प्यारी गुड़िया के बाल संवार रही है. 

हुसैन जैसी कहानियां मलेशिया के शरणार्थियों के बीच आम हैं. सालों से मूल अधिकारों के अभाव में प्रतीक्षा करते इन लोगों के बीच मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी सामने आ रही हैं. इनमें से कई मजबूर हो कर अवैध कामों को भी चुन रहे हैं, और वहां इनके शोषण का खतरा भी होता है. लेकिन सरकार पर दबाव बढ़ रहा है कि वह चुनाव में किए अपने वादों को पूरा करे. काम के अधिकार के पक्ष में कई मंत्रियों ने बयान भी दिए हैं पर मानवाधिकार समूहों का कहना है कि धरातल पर कुछ ठोस न होने की वजह से शरणार्थियों का और शोषण हो रहा है.

रोहिंग्या शरणार्थी

मलेशिया के शरणार्थियों में आधे से ज्यादा आबादी म्यांमार के अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों की है, जो बौद्ध बहुल म्यांमार में उत्पीड़न का शिकार हैं. बाकी शरणार्थी पाकिस्तान, यमन और सीरिया जैसे देशों से हैं. वैसे तो संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी संस्था मलेशिया में मौजूद है और वहां शरणार्थी आवेदनों को आगे बढ़ाती है. मलेशिया ने 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. इसकी वजह से शरणार्थियों को पराये देश में बसने का इंतजार कर रहे अवैध प्रवासी समझा जाता है और इस वजह से ये शिक्षा और रोजगार से वंचित रहते हैं.

कई लोग तो सफाई, होटलों में काम और निर्माण मजदूरी जैसे छोटे मोटे काम शुरू कर देते हैं. मानवाधिकार  समूहों का कहना है कि ऐसे लोग आसानी से मानव तस्करों का शिकार बन जाते हैं. कुछ ने सत्तारूढ़ गठबंधन, अलायन्स ऑफ होप, के चुनावी घोषणापत्र से उम्मीद लगा रखी है, जिसने शरणार्थियों के दर्जे को आधिकारिक मान्यता दिलाने वाली संयुक्त राष्ट्र की संधि को मंजूर करने का वादा किया था. बैंकाक स्थित प्रांतीय कैंपेन समूह एशिया पैसिफिक रिफ्यूजी राइट्स नेटवर्क के एवन जोंस कहते हैं, "हमने अभी तक कोई ठोस बदलाव नहीं देखे हैं." 

पिछले कुछ महीनों में, कई मंत्रियों और मालिकों के समूहों ने सार्वजनिक रूप से ये कहा है कि शरणार्थियों को काम करने की इजाजत मिलनी चाहिए, लेकिन  देश के श्रम मंत्री ने कहा कि सरकार ने अभी कोई फैसला नहीं लिया है. एक तस्करी-विरोधी सम्मेलन में बोलते हुए मंत्री एम. कुलसीगरन ने कहा, "मुझे लगता है उन्हें यहां काम करने की इजाजत दे देनी चाहिए, कम से कम तब तक जब तक वो तीसरे किसी देश में बस नहीं जाते. मुझे उम्मीद है ये जल्द होगा." मलेशिया की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने कहा है कि शरणार्थियों को काम करने देना सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से एक पेचीदा मुद्दा है. 

लेकिन ये भय कि शरणार्थियों को और अधिकार देने से और शरणार्थी आ जाएंगे गलत है, ऐसा कहना है वकील एरिक पॉलसेन का, जो दक्षिण-पूर्वी एशिया में मलेशिया का प्रतिनिधित्व करने वाले सरकार द्वारा नियुक्त राजदूत हैं. उन्होंने थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन को बताया, "ज्यादातर शरणार्थी मलेशिया नजदीकी की वजह से आते हैं. उन्होंने काम करने की इजाजत देने भर से उनका आना नहीं बढ़ेगा." मुस्लिम-बहुल मलेशिया की एशिया में रोहिंग्याओं को समर्थन देने में अग्रणी भूमिका रही है. पॉलसेन का कहना है कि अगर मलेशिया अपने शरणार्थियों की रक्षा न करे तो इन कोशिशों का असर कम होगा.

सामाजिक उपक्रम

शरणार्थियों की कमाई में मदद करने के लिए पिछले कुछ सालों में कई सामाजिक उपक्रम खड़े हुए हैं, जिनमें खानपान से लेकर हाथ से साबुन बनाने तक के उद्योग शामिल हैं. ऐसा ही एक उपक्रम है लेडी अयाज सिलाई केंद्र जो 2016 में शुरू हुआ था और अब एक फलता फूलता सामाजिक उद्योग है. यहां करीब एक दर्जन पाकिस्तानी शरणार्थी महिलाएं बड़ी कंपनियों के लिए बैग और पाउच सिलकर पैसे कमाती हैं. इनके बैग जापानी ब्रांड यूनिक्लो जैसी कंपनियों में भी जाते हैं. इस केंद्र की सह-संस्थापक हैं अंसा शकील जो खुद भी एक पाकिस्तानी शरणार्थी हैं. उनका कहना है, "उनके समुदाय में कई औरतों को दो वक्त की रोटी जुटाने और अपने बच्चों को स्कूल भेजने में भी संघर्ष करना पड़ता है, क्योंकि उनके पास बिलकुल भी पैसे नहीं हैं.

अपने पति और बेटे के साथ 2014 में भागकर मलेशिया आई शकील कहती हैं, "इन औरतों के साथ कई बार धोखा-धड़ी की जाती है, इन्हें मारा पीटा जाता है और काम के पैसे भी नहीं दिए जाते. इन्हें आप्रवासी विभाग के अधिकारियों द्वारा हिरासत में लिए जाने का हमेशा भय रहता है, इसलिए ये शिकायत भी नहीं करतीं." इस केंद्र में 10 सिलाई की मशीनें हैं और इनकी मदद से शरणार्थी महिलाएं हर महीने औसत 500 मलेशियाई रिंगगिट कमा सकती हैं. ये सुनने में एक छोटी आय लगती है पर उनका घर चलाते रहने में ये अत्यंत सहायक है. शकील कहती हैं, "ये मुश्किल है, पर हम कोशिश ही तो कर सकते हैं."

सीके/एमजे (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

__________________________

हमसे जुड़ें: WhatsApp | Facebook | Twitter | YouTube | GooglePlay | AppStore

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन