मिल गया है पाइरेटेड फिल्में देखने वालों से कमाने का रास्ता | दुनिया | DW | 16.09.2016
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दुनिया

मिल गया है पाइरेटेड फिल्में देखने वालों से कमाने का रास्ता

अगर आप पाइरेटेड फिल्में देखते हैं तो जान लीजिए, कंपनियों ने आपसे भी पैसे कमाने का रास्ता खोज लिया है. यह अभी शुरुआती दौर में है लेकिन मामला गहरा है.

टोरंट या दूसरे तरीकों से डाउनलोड करके या फिर स्ट्रीमिंग के जरिए फिल्म या टीवी शो देखने वाले या फिर म्यूजिक डाउनलोड करने वालों को उद्योग जगत अबतक दुश्मन की निगाह से ही देखता रहा है. इन्हें आमतौर पर चोर ही माना जाता है. लेकिन अमेरिका में कुछ नई कंपनियों ने इन लोगों के जरिए भी पैसा कमाने का रास्ता खोज लिया है. इन नई कंपनियों ने सोचा है कि चोरी से फिल्म देखने वाले ये लोग विज्ञापनों के अच्छे उपभोक्ता हो सकते हैं लिहाजा इन्हें एड्स परोसे जा रहे हैं.

हालांकि अभी यह उद्योग शुरुआती दौर में ही है और इसके सामने कई बड़े सवाल खड़े हैं मसलन बड़ी बड़ी कंपनियां ऐसे लोगों को अपने विज्ञापन दिखाने के लिए पैसा खर्च करना चाहेंगी या नहीं. इस क्षेत्र में शुरुआती काम करने वालों में सबसे बड़ी कंपनी है ट्रू ऑप्टिक. ट्रू ऑप्टिक ने इसी साल की शुरुआत में न्यूयॉर्क की मीडिया एजेंसी माइंडशेयर से करार किया था. माइंडशेयर अंतरराष्ट्रीय विज्ञापन एजेंसी डब्ल्यूपीपी की ही कंपनी है. ट्रू ऑप्टिक सिर्फ तीन साल पुरानी कंपनी है. उसने टोरंट आदि के जरिए अवैध तरीके से फिल्म या टीवी देखने वाले 50 करोड़ लोगों का डाटाबेस बना रखा है. इस डाटाबेस में ऐसे आंकड़े भी हैं कि ये लोग कौन कौन सी अन्य वेबसाइट्स देखते हैं. क्या खरीदते हैं. कहां रहते हैं और किस तरह की चीजें पसंद करते हैं.

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इस डाटा के आधार पर माइंडशेयर टीवी और फिल्म इंडस्ट्री को बताता है कि कौन आदमी कैसी फिल्म या टीवी शो देखना चाहता है. फिर उसे वैसी ही फिल्म का विज्ञापन दिखाया जाता है. माइंडशेयर के लिए कस्टमर डाटा की रणनीति बनाने वाले समीर मोढा बताते हैं कि हम विज्ञापनदाताओं को बताते हैं कि किसे कौन सा विज्ञापन दिखाया जाए. मसलन हाल ही में माइंडशेयर ने अपने पास उपलब्ध आंकड़ों के अध्ययन से पाया कि ऐसी वेस्टर्न और साइंस फिक्शन देखने वाले लोगों की तादाद बहुत बड़ी है जिनमें मुख्य किरदार किसी अनजान जगह पर अकेला छूट जाता है. उपभोक्ताओं की इस भावना को पकड़कर माइंडशेयर उनके सामने ऐसे ही कंटेंट के लिए विज्ञापन परोसेगा. हालांकि मोढा का कहना है कि हम चोरी से कंटेंट देखने वालों के सामने सीधे विज्ञापन नहीं देते और उनका व्यवहार समझने का मतलब यह नहीं है कि हम उनके व्यवहार का समर्थन भी करते हैं.

वह सवाल करते हैं, "अगर मैं ऐसे लोगों का इंटरव्यू करूं, जो कार चुराते हैं तो क्या इसका मतलब यह हुआ कि मैं कार चोरी का समर्थन करता हूं? या मैं बस उस चलन को समझने की कोशिश कर रहा हूं?"

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समस्या यह है कि चोरी से फिल्म देखने वालों को ग्राहक बनाने की कोशिश में जुटी इन नई कंपनियों के इर्दगिर्द भी नैतिकता की बहस शुरू हो गई है. ऐसे सवाल उठ रहे हैं कि ये कंपनियां कहीं पाइरेसी को बढ़ावा तो नहीं दे रही हैं. नेशनल असोसिएशन ऑफ ब्रॉडकास्टर्स जैसी संस्थाएं तो इन नई कंपनियों को घृणा की नजर से देखती हैं. हालांकि फिलहाल कोई कानूनी कदम नहीं उठाया गया है. एनएबी के प्रवक्ता डेनिस वार्टन कहते हैं, "हमारे सदस्य तो ऐसी कंपनियों के साथ व्यापारिक संबंध नहीं बनाएंगे जो पाइरेसी को बढ़ावा दे रही हैं."

ट्रू ऑप्टिक के सीईओ आंद्रे स्वान्स्टन कहते हैं कि वह पाइरेसी का ना तो समर्थन करते हैं, ना उसे बढ़ावा दे रहे हैं. वह कहते हैं कि ऐसी वेबसाइटों पर विज्ञापन नहीं दिए जाते जहां पाइरेटेड कंटेंट दिखाया जाता है. स्वान्स्टन कहते हैं, "मुझे नहीं लगता हमारा काम ऐसे लोगों को किसी तरह की वैधता देता है. वे लोग पहले ही वैध उपभोक्ता हैं. मीडिया कंपनियों को ऑडियंस डाटा देकर हम बस इन दर्शकों तक पहुंचने का बेहतर जरिया बता रहे हैं. ट्रू ऑप्टिक तो मानती है कि हम अपने क्लाइंट्स को उनके कंटेंट को वैध तरीके से सही दर्शकों तक पहुंचाने में मदद करके पाइरेसी से लड़ने का रास्ता दिखा रहे हैं."

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ट्रू ऑप्टिक का ग्राहक है यिप टीवी. उसने ट्रू ऑप्टिक के डाटा को पढ़ने पर पाया कि बार्सिलोना और रियाल मैड्रिड के बीच फुटबॉल मैच को अवैध प्लैटफॉर्म पर देखने वाले लोगों में 25 फीसदी ऐसी महिलाएं थीं जो छोटे उपन्यासों जैसी फिल्में पसंद करती हैं. तब फ्लोरिडा की इस कंपनी ने खेलों के दौरान अपनी फिल्मों का विज्ञापन शुरू किया. और अब उसे नए ग्राहकों तक पहुंचने का रास्ता मिल गया है.

वीके/एमजे (रॉयटर्स)

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