लॉकडाउन और अनलॉक के बीच ऐसे रहे हमारे तजुर्बे | ब्लॉग | DW | 20.07.2020
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ब्लॉग

लॉकडाउन और अनलॉक के बीच ऐसे रहे हमारे तजुर्बे

कोरोना काल ने सबको अपने और अपने आसपास के माहौल के बारे में सोचने का मौका दिया. ये अनुभव सबके लिए अलग अलग रहे. इसलिए इस श्रृंखला में हम कोरोना, लॉकडाउन और उसके बाद हुए अनलॉक पर कुछ अनुभवों को साझा कर रहे हैं.

कोरोना जब आया, तो वह हमसे बहुत दूर था, किसी दूसरे देश की खबर था, कौतुहल की वजह था. और फिर जब वह पास आया, तो इस ताकत के साथ आया कि सब अपने अपने घरों में दुबकने को विवश हो गए. कोरोना काल का अनुभव लोगों के लिए ऐसा अप्रत्याशित था, जो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा. हमारी पीढ़ियों ने ऐसी कोई महामारी देखी भी नहीं कि उससे निबटने का कोई अनुभव हो.

ऐसे में सरकारों ने फैसले लिए. पहली बार सरकारों के फैसले राजनीतिक स्तर पर नहीं, बल्कि विशेषज्ञों से पूछकर लिए गए. और इन फैसलों में लोकतांत्रिक परंपराओं से ज्यादा अहम यह बात रही है कि लोगों की जान किस तरह बचाई जाए, जिन लोगों के रोजगार पर असर पड़ा, उनकी आजीविका का बंदोबस्त कैसे किया जाए और जो लोग घर पर रहने को मजबूर हैं, उनके अकेलेपन को कम करने के लिए क्या किया जाए.

पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में बहुत से लोगों ने कभी अदालत के माध्यम से, तो कभी प्रदर्शन कर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों पर जोर दिया. सरकारों पर दबाव बनाया गया, उनके फैसलों पर बहस कर, उनकी खामियों को सामने लाकर. सरकारों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जरूरी बदलाव किए ताकि लॉकडाउन के बावजूद चुनाव होते रहें, और लोगों को जहां तक संभव हो, घर की सुरक्षा में काम करने का मौका मिलता रहे.

पढ़िए हमारे साथियों के तजुर्बे:

लॉकडाउन में फुर्सत तो थी लेकिन कामकाजी मांओं के लिए नहीं

ठहाकों की दुनिया कोरोना की शुक्रगुजार रहेगी

लॉकडाउन के बाद फिर से सामान्य होने लगी है जिंदगी

तालाबंदी के पहले दौर का सबक

हम जिस समाज में रह रहे हैं, वह आर्थिक विकास पर आधारित समाज है. काम रहेगा तो नौकरी रहेगी, नौकरी रहेगी तो आमदनी रहेगी और आमदनी रहेगी, तो जिंदगी अपने ढर्रे पर चलती रहेगी. कोरोना की वजह से हुए लॉकडाउन ने इस संरचना को अस्तव्यस्त कर दिया. फिलहाल फिर उसी संरचना को वापस लाने की कोशिश हो रही है, लेकिन लॉकडाउन के अनुभवों ने हमें यह भी दिखाया है कि जिंदगी दूसरे तरीके से भी चल सकती है. पर्यावरण सम्मत तरीके से, प्रकृति के दोहन के बदले, उसे बचाते हुए समाज का विकास हो सकता है.

लॉकडाउन में हर किसी की अपनी अपनी मुश्किलें रही हैं, अपना अपना अनुभव रहा है. यहां हम अपनी टीम के कुछ अनुभवों को समेटने की कोशिश कर रहे हैं. आपसे इस बात की चर्चा करना चाहते हैं कि आपके क्या अनुभव रहे. आपने अपने और अपने समाज के बारे में क्या सोचा? कोरोना की चुनौती ने पहली बार सारी दुनिया को एक धागे में पिरो दिया है. इससे पहले इतना साफ कभी नहीं था कि हमारी जिंदगी की डोर एक दूसरे के साथ जुड़ी है. समस्या का समाधान हमारे साथ आने में हैं, हमारे साझा प्रयासों में है.

भारत में या यहां यूरोप में, महामारी भले ही एक रही हो, चुनौतियां और अनुभव अलग अलग रहे हैं. हिंदी टीम के सदस्यों के कुछ अनुभवों के साथ आपको इस बातचीत में शामिल होने का निमंत्रण दे रहे हैं. आइए हमारे साथ फेसबुक पर इन अनुभवों पर चर्चा कीजिए और अपने अनुभव हमारे साथ साझा कीजिए.

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