वरना नोत्रे दाम से निकली आग पूरे यूरोप को जला देगी | दुनिया | DW | 22.04.2019
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दुनिया

वरना नोत्रे दाम से निकली आग पूरे यूरोप को जला देगी

यूरोप के अनगिनत विश्वप्रसिद्ध स्मारक खतरे में हैं. नजरअंदाजी के शिकार हो रहे इन स्मारकों का हश्र भी फ्रांस के रत्न नोत्रे दाम जैसा हो सकता है.

नोत्रे दाम जैसे हजारों कैथीड्रल, महलों और मीनारों ने ही फ्रांस, इटली, ब्रिटेन और स्पेन जैसे देशों को पश्चिमी सभ्यता की खुली प्रदर्शनी जैसी पहचान दी है. लेकिन सदियों पुराने नोत्रे दाम को आग की लपटों में धू धू कर जलते देखना एक साफ चेतावनी थी कि ऐसी अहम और मशहूर इमारत भी नजरअंदाजी की शिकार है. अगर ऐसी प्रतिष्ठित इमारत की मरम्मत के लिए फंड नहीं है तो बाकियों की देखभाल क्या ही होगी.

हर साल होने वाला कई अरब का पर्यटन कारोबार काफी हद तक इन्हीं इमारतों पर निर्भर है. पूरा यूरोप इस कमाई पर निर्भर है फिर भी इनके रखरखाव के प्रति उदासीनता है. यूरोपीय संघ के सर्वोच्च सांस्कृतिक अधिकारी तिबोर नवरासिस कहते हैं, "हमें यूरोप में अपनी जबरदस्त सांस्कृतिक धरोहरों की इतनी आदत पड़ी हुई है कि हम उन पर ध्यान देना और उसकी नियमित देखभाल करना भूल ही जाते हैं."

यूरोप ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए नोत्रे दाम की घटना ने एक खतरे की घंटी बजाई है. यूरोपा नॉस्त्रा हेरिटेड फाउंडेशन की प्रमुख स्नेस्का क्वेडलीग-मिहेलोविस कहती हैं, "ऐसा लगा जैसे नोत्रे दाम ने खुद को आग लगा कर चेतावनी की घंटी बजाने की सोची हो. जैसे कि इस ओर ध्यान दिलाने के लिए वो खुद का बलिदान कर रहा हो."

नोत्रे दाम की आग से बहुत पहले प्राचीन काल में भी मिस्र के सिकंदरिया की मशहूर लाइब्रेरी में लगी आग ने मानवता से ज्ञान और कला का बहुत बड़ा खजाना छीन लिया था. बीते सितंबर में भी ब्राजील स्थित एक संग्रहालय जल गया था, जो पूरे दक्षिण अमेरिका का सबसे अहम सांस्कृतिक संस्थान माना जाता था.

विशेषज्ञ जब यूरोप के ऐसे ऐतिहासिक स्थलों की सूची बनाते हैं जहां आग लगी तो हैरान भी होते हैं कि अधिकारी इनकी देखभाल के लिए समय रहते कुछ क्यों नहीं करते. कई मामलों में आग किसी दुर्घटना के कारण लगी तो कई में आगजनी की गई. फ्रांस के ट्रिब्यून दे आर्ट के डिडिये रिकनर बताते हैं, "इसके सही सही आंकड़े नहीं हैं लेकिन फ्रांस में ही हर साल ऐतिहासिक इमारतों में कई कई बार आग लग जाती है."

सन 2015 में जर्मन कंपनी सीमेंस के एक अध्ययन से पता चला कि अकेला स्कॉटलैंड हर साल लगभग दस बड़ी आग झेलता है जबकि इंग्लैंड ने एक साल में दर्जन भर ऐसी ऐतिहासिक महत्व की इमारतों को आग के कारण खोया. सन 2000 से अब तक जर्मनी में भी ऐसी 70 इमारतें नष्ट हो चुकी हैं. कभी आग, तो कभी आसमान से गिरी बिजली या कुछ और किसी ऐसी इमारत की छत या मीनारों को नष्ट कर देती है. इन इमारतों में जब कभी बड़ी मरम्मत का काम लगता है, उस दौरान ऐसी दुर्घटनाएं काफी होती हैं.

Frankreich, Paris: Luftaufnahme nach dem Brand in Notre Dame (picture-alliance/dpa/Gigarama.Ru)

पेरिस के नोत्रे दाम में भी चल रहा था बड़ा रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट.

विशेषज्ञ कहते हैं कि इन पर हमेशा ध्यान दिए जाने की जरूरत है और इनकी नियमित रूप से मरम्मत करते रहना चाहिए, ताकि बड़े रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट्स की नौबत ना आए. इसके लिए नियमित तौर पर धन की जरूरत होगी जो 2008 के आर्थिक संकट, उसके बाद सालों साल चले कर्ज संकट और यूरोपीय देशों में जारी बचत पर आधारित बजट नीति के कारण मुहैया नहीं कराई जा रही है. केवल ऐसी इमारतों के लिए धन उपलब्ध कराया जाता है जो मरम्मत के अभाव में नष्ट होने के हाल में पहुंच गई हों. इसे बदल कर इमारतों के संरक्षण पर खर्च करने की जरूरत है.

नोत्रे दाम की आग बुझाने के बाद उसके पुनर्निर्माण के लिए फ्रांस के दो अरबपतियों ने एक अरब यूरो से भी अधिक सहयोग राशि देने की घोषणा की. यह राशि फ्रांस के तीन साल के राष्ट्रीय रिस्टोरेशन बजट के बराबर है. इसे देखकर यह तो पता चलता है कि पैसों की कोई कमी नहीं है लेकिन जब तक कोई बड़ी दुर्घटना न हो जाए, तब तक मदद का यह जज्बा सामने नहीं आता.

यूरोप के तमाम देशों ने जितना भी बजट रखा है उसके ऊपर ईयू ने 2014 से 2020 के लिए करीब 4.7 अरब यूरो की राशि रिस्टोरेशन ने नाम पर अलग कर रखी है. लेकिन होता ये है कि पैसों की कमी झेल रही सरकारें मशहूर इमारतों की मरम्मत के लिए निजी दानकर्ताओं की ओर देख रही हैं. उदाहरण के लिए लक्जरी शू ब्रांड टोड ने रोम के कोलोसियम की मरम्मत के लिए राशि दी, तो एक और लक्जरी ब्रांड फेंडी फैशन हाउस ने रोम के ट्रेवी फाउंटेन के लिए. वहीं वेनिस के मशहूर रिआल्टो ब्रिज की मरम्मत मशहूर ब्रांड डीजल ने करवाई. ब्रिटेन और फ्रांस को पर्यटन से होने वाली उनकी राष्ट्रीय आय, जीडीपी का करीब सात फीसदी - यानि सालाना करीब 150 अरब यूरो और 170 अरब यूरो है. अगर इन पर समय रहते ध्यान दिया जाए तो तमाम देश उससे होने वाली आय से सालों साल फायदा उठा सकेंगे और इतिहास की धरोहरें भी बनी रहेंगी.

आरपी/एके (एपी)

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