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नेपाल में समलैंगिक शादी को मान्यता, बना दक्षिण एशिया का अगुआ

लेखनाथ पांडे
८ दिसम्बर २०२३

नेपाल में एक सिसजेंडर पुरुष और एक ट्रांसजेंडर महिला के विवाह को कानूनी मान्यता मिली है. यह दक्षिण एशिया में ऐसा पहला जोड़ा बन गया है, जिनके समलैंगिक विवाह को कानूनी रूप से मान्यता मिली है.

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सुरेंद्र पांडेय और माया गुरुंग.
सुरेंद्र पांडेय और माया गुरुंग को अपनी शादी को कानूनी पहचान दिलाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा. तस्वीर: Subash Shrestha

नवंबर के अंत में, सुरेंद्र पांडेय और माया गुरुंग नेपाल के पहले समलैंगिक जोड़े बन गए. इन दोनों ने कई साल की कानूनी लड़ाई के बाद अपनी शादी को आधिकारिक तौर पर मान्यता दिलाने में सफलता पाई. 

इन दोनों का कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त समलैंगिक विवाह, किसी दक्षिण एशियाई देश में अपनी तरह का पहला विवाह है. यह एलजीबीटीक्यू अधिकारों के लिए एक मील का पत्थर है. 

डीडब्ल्यू से बातचीत में सुरेंद्र कहते हैं, "हमने कानूनी मान्यता हासिल कर ली है, जो न केवल हमारे लिए, बल्कि पूरे एलजीबीटीक्यू समुदाय के लिए एक बड़ी जीत है. इसके लिए हम स्थानीय अधिकारियों और समुदायों के समर्थन के लिए आभारी हैं. हमें न्याय मिला. अब हम एक साथ पूर्ण हैं.”

एक लंबी कानूनी प्रक्रिया

हालांकि, सुरेंद्र पांडेय और माया गुरुंग की यात्रा आसान नहीं थी. लंबी कानूनी प्रक्रिया और तमाम बाधाओं के अलावा इस लड़ाई में उन्हें सामाजिक निर्णयों और पारिवारिक दबाव का भी सामना करना पड़ा.

साल 2007 में, नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को समलैंगिक विवाह की अनुमति देने के लिए मौजूदा कानूनी प्रावधानों को बदलने का आदेश दिया था. लेकिन सरकारें ऐसे आवश्यक कानून पारित करने में विफल रहीं, जो निचली अदालतों को समलैंगिक विवाह को कानूनी रूप से मान्यता देने के लिए बाध्य करतीं.

साल 2017 में, सुरेंद्र और माया की शादी हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी. जून 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने नगरपालिका अधिकारियों को आदेश दिया कि जब तक मौजूदा विवाह कानून में संशोधन नहीं हो जाता, तब तक समलैंगिक विवाह के लिए ‘अंतरिम पंजीकरण' की व्यवस्था की जाए. इस आदेश के बाद इन लोगों ने काठमांडू जिला न्यायालय में एक याचिका दायर कर अपनी शादी को कानूनी मान्यता देने की मांग की.

इस जोड़े को उम्मीद थी कि पंजीकरण प्रक्रिया सुचारू रूप से चलेगी. लेकिन काठमांडू जिला न्यायालय और एक अन्य उच्च न्यायालय, दोनों ने ही उनके विवाह को पंजीकृत करने से यह कहकर इनकार कर दिया कि संघीय कानून सिर्फ स्त्री-पुरुष के जोड़ों के विवाह को पंजीकृत करने की अनुमति देता है. इन अदालतों का ये फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद था.

माया और सुरेंद्र को उम्मीद है कि उनकी शादी को मिली कानूनी मान्यता, एलजीबीटीक्यू अधिकारों के लिए नई राह खोलेगी.
शादी का प्रमाणपत्र दिखाते माया गुरुंग और सुरेंद्र पांडेय तस्वीर: Subash Shrestha

27 वर्षीय सुरेंद्र की पहचान एक सिसजेंडर पुरुष के रूप में है. सिसजेंडर, यानी शरीर की संरचना के मुताबिक जो जेंडर है वही महसूस करना. वहीं 38 वर्षीया माया एक ट्रांसजेंडर महिला हैं, जिन्हें नेपाल में कानूनी तौर पर पुरुष माना जाता है.

दरअसल, निचली अदालतों का फैसला नेपाल की नागरिक संहिता पर आधारित था, जो कि विवाह को एक पुरुष और महिला के बीच परिभाषित करता है. जबकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने कानून में बदलाव होने तक अंतरिम पंजीकरण की व्यवस्था बनाकर इससे निजात पाने का प्रयास किया था. लेकिन सुरेंद्र और माया की शादी को मान्यता देने से पहले दावा किया गया कि इसके लिए राष्ट्रीय कानून बदलना होगा.

हालांकि, नेपाल के गृह मंत्रालय ने नवंबर के आखिरी सप्ताह में कहा कि सभी स्थानीय प्राशासनिक कार्यालयों को समलैंगिक विवाहों को पंजीकृत करने की अनुमति है. और फिर 29 नवंबर को, सुरेंद्र और माया को पश्चिमी नेपाल के लामजंग जिले में डोरडी ग्रामीण नगर पालिका से अपना विवाह प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ. माया गुरुंग यहीं रहती हैं.

सुरेंद्र कहते हैं, "इस पंजीकरण ने हमारे लिए बहुत सी चीजें खोल दी हैं, जिसमें संयुक्त बैंक खाता संचालित करना, संपत्ति रखना और भविष्य में बच्चों को गोद लेना भी शामिल है.”

नेपाल के एलजीबीटीक्यू समुदाय में जश्न का माहौल

लैमजंग जिले में एक महिला समूह समेत स्थानीय समुदाय ने नृत्य और संगीत जैसे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ इस जोड़े की शादी की मान्यता का जश्न मनाया.

3 दिसंबर को काठमांडू के बाहरी इलाके कीर्तिपुर के प्राचीन शहर में LGBTQ समुदाय की ओर से भी इस जोड़े की शादी की मान्यता का जश्न मनाया गया. सुरेंद्र कहते हैं, "अपनी शादी पंजीकृत करने वाले शुरुआती लोगों के तौर पर, हम समुदाय के भीतर दूसरों के मुद्दों और अधिकारों की वकालत करते रहेंगे.

चार महीने पहले, इस जोड़े ने ‘मायाको पहिचान' यानी प्यार की पहचान नाम का एक संगठन बनाया था, जिसका उद्देश्य एलजीबीटीक्यू समुदाय के अधिकारों की वकालत करना और यौन अल्पसंख्यकों के बीच जबरन विवाह के मामलों को उठाना था.

खुले तौर पर खुद को समलैंगिक बताने वाले पूर्व विधायक सुनील बाबू पंत भी इस समारोह में शामिल हुए और उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन नेपाली समाज में प्रगतिशील बदलाव का हिस्सा हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में सुनील बाबू पंत कहते हैं, "नेपाली समाज इस संबंध में बहुत उदार और सकारात्मक हो गया है.”

उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक उपलब्धि से पूरे नेपाल में यौन अल्पसंख्यकों के अधिकारों की मान्यता और सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त करने में मदद मिलेगी. साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि संभावित रूप से पड़ोसी देशों को समलैंगिक शादियों पर अपने रुख पर पुनर्विचार करने के लिए भी हमें प्रभावित करना चाहिए.

हालांकि अक्टूबर में, पड़ोसी देश भारत के सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को वैध बनाने से इनकार कर इसके बिल्कुल विपरीत दिशा में एक कदम उठाया है.

नेपाल में, समलैंगिक और ट्रांसजेंडर जोड़ों पर कोई आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है, जो आगे आकर अपनी शादी का पंजीकरण कराना चाहते हैं. सुनील बाबू पंत कहते हैं कि 200 से ज्यादा विवाहित लोग समलैंगिक और ट्रांसजेंडर जोड़े हैं, जो अपनी शादी पंजीकृत कराने के लिए आगे आ सकते हैं.

सुनील बाबू पंत, ब्लू डायमंड सोसाइटी के संस्थापक हैं और यौन अल्पसंख्यकों के हितों की वकालत करते हैं. उन्होंने समलैंगिक विवाह के विभिन्न पक्षों को नियंत्रित करने वाले कानून बनाने के लिए तत्काल संसदीय कार्रवाई की अपील की है. इनमें संयुक्त संपत्ति का स्वामित्व, विरासत, बच्चे गोद लेना, तलाक और अलगाव के मामलों में संरक्षण भी शामिल है.

नेपाल ने इस संदर्भ में कुछ प्रगतिशील कदम पहले भी उठाए हैं, जिनमें साल 2015 से पासपोर्ट में लिंग श्रेणी के रूप में ‘अन्य' की अनुमति देना और साल 2021 की जनगणना में ‘अन्य' लिंग श्रेणी की शुरुआत करना शामिल है. इसके बाद, करीब तीन करोड़ लोगों के बीच 2,928 व्यक्तियों ने खुद की पहचान ‘अन्य' कॉलम के तहत दर्ज कराई है.

हालांकि, सुनील बाबू पंत कहते हैं कि आधिकारिक रिकॉर्ड में यौन अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व कम है और उनकी मांग है कि जनगणना के आंकड़े जुटाने के तरीकों में सुधार किया जाए.

समलैंगिक विवाह का विरोध अभी भी जारी है

समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की दिशा में नेपाल की यात्रा विरोध से परे नहीं रही है. रूढ़िवादी नेपाली समाज का एक वर्ग अभी भी समलैंगिक विवाह को वैध बनाने के विचार के खिलाफ है. हालांकि विरोधियों की संख्या धीरे-धीरे कम जरूर हो रही है.

माया को काफी हद तक उनके परिवार का समर्थन प्राप्त है. जबकि छह साल की उम्र में ही अनाथ हुए सुरेंद्र का पालन-पोषण उनके मामा ने किया. सुरेंद्र ने जब माया के साथ सगाई की, तो शुरुआत में उन्हें अपनी बहन के विरोध का सामना करना पड़ा.

नेपाल की रूढ़िवादी राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी नेपाल (RPPN) के अध्यक्ष और पूर्व उप-प्रधानमंत्री कमल थापा ने डीडब्ल्यू को बताया कि समलैंगिक संबंधों को वैध बनाने से हिंदू-बहुसंख्यक नेपाली समाज में ‘विवाह और पारिवारिक मूल्यों की पवित्रता' खत्म हो जाएगी.

वह कहते हैं, "मैं व्यक्तियों के अपने प्रियजनों के साथ प्यार करने और उनके साथ रहने के अधिकारों का समर्थन करता हूं. हालांकि, जब बात समलैंगिक विवाह की आती है, तो यह 'विवाह संस्था' की हमारी मौलिक अवधारणा का खंडन करती है, जो पारंपरिक रूप से एक पुरुष और महिला के बीच एक पवित्र मिलन का प्रतीक है.”