सबको साथ लेकर चलने की कोशिश है: प्रचंड | दुनिया | DW | 16.09.2016
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दुनिया

सबको साथ लेकर चलने की कोशिश है: प्रचंड

नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड ने कहा है कि वो सभी लोगों को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहे हैं. ये बात उन्होंने नेपाल के नए संविधान के बारे में कही है, जिसे लेकर भारत की आपत्तियां रही हैं.

भारत से लगने वाले नेपाल के तराई क्षेत्र में रहने वाले मधेसी लोगों का कहना है कि संविधान में उनके हितों का पूरा ध्यान नहीं रखा गया है. इसे लेकर महीनों तक विरोध प्रदर्शन हुए और भारत पर नेपाल की नाकेबंदी करने के आरोप भी लगे. इसके कारण भारत और नेपाल के रिश्ते खासे तनावपूर्ण हो गए.

लेकिन प्रचंड ने प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद भारत को अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए चुना है. इससे पता चलता है कि वो भारत से संबंध सुधारने को लेकर गंभीर हैं. वो गुरुवार को चार दिन के भारत दौरे पर दिल्ली पहुंचे. प्रचंड दूसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने हैं. इससे पहले नए संविधान को लेकर मधेसियों के विरोधी प्रदर्शनों के बीच जुलाई में केपी शर्मा ओली ने प्रधानमंत्री पद छोड़ दिया.

शुक्रवार को नई दिल्ली में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत के बाद प्रचंड ने कहा, "हम नेपाली समाज के सभी वर्गों के हितों में नए संविधान को लागू के चरण में दाखिल हो चुके हैं और आप जानते है कि मेरी सरकार ने सभी को साथ लेकर चलने के लिए गंभीर प्रयास किए हैं. "वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि नेपाल को "विविधता वाले समाज के सभी वर्गों की उम्मीदों का ध्यान रखते हुए व्यापाक संवाद के जरिए सफलतापूर्वक संविधान को लागू किया जाना चाहिए."

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प्रधानमंत्री प्रचंड ने कहा कि नेपाल और भारत का भाग्य आपस में एक दूसरे से जुड़ा हुआ है. उन्होंने कहा कि भारत ने नेपाल का हर कदम पर साथ दिया है. प्रचंड ने भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को जल्द नेपाल आने का न्यौता भी दिया है. इस मौके पर मोदी ने पिछले साल आए भूकंप के बाद नेपाल को पुनर्निर्माण के लिए 15 करोड़ डॉलर की मदद का ऐलान किया है.

नेपाल ने 2006 में गृहयुद्ध खत्म होने के बाद देश का नया संविधान बनाने पर काम शुरू किया था, लंबे गतिरोध के बाद इस पर पिछले साल जाकर सांसदों की अंतिम सहमति बनी. लेकिन मधेसी लोगों का कहना है कि उन्हें संविधान में उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है और ये मुद्दा अब भी अनसुलझा है. नेपाल की संसद ने जनवरी में संविधान में संशोधन किए, ताकि सरकारी संस्थाओं में मधेसियों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सके लेकिन उनका कहना है कि संविधान संशोधनों में उनकी मुख्य मांगों की तरफ ध्यान नहीं दिया गया है.

एके/वीके (एएफपी, पीटीआई)

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