कोरोना: क्या दो अलग-अलग वैक्सीन की खुराक ज्यादा असरदार होंगी? | दुनिया | DW | 06.08.2021
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दुनिया

कोरोना: क्या दो अलग-अलग वैक्सीन की खुराक ज्यादा असरदार होंगी?

एक ही वैक्सीन की दो खुराक लेने के बजाय दो अलग-अलग वैक्सीन की खुराक लेने से ज्यादा एंटीबॉडी विकसित हो सकती हैं. ब्रिटेन में हुए एक हालिया अध्ययन की रिपोर्ट में पुष्टि की गई है

यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी से मंजूरी मिलने के बाद, जनवरी में जर्मनी में सभी वयस्कों को कोविड-19 से बचाव के लिए एस्ट्राजेनेका वैक्सीन दी गई थी. हालांकि, टीका लगने के बाद विशेष रूप से कुछ युवतियों के मस्तिष्क में खून का थक्का बनने का खतरा बढ़ गया था.

इस वजह से अप्रैल महीने में जर्मनी में टीकाकरण की स्टैंडिंग कमेटी (स्टिको) ने इस वैक्सीन का इस्तेमाल 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए सीमित करने की सिफारिश की थी.

हालांकि, तब तक काफी संख्या में लोग एस्ट्राजेनेका की पहली खुराक ले चुके थे. इन लोगों को दूसरी खुराक के तौर पर बायोनटेक-फाइजर या मॉर्डना की वैक्सीन लगवानी पड़ी थी. आज जर्मनी में किसी भी उम्र के लोग एस्ट्राजेनेका वैक्सीन लगवा सकते हैं, लेकिन इसके लिए वैक्सीन लगाने से पहले व्यक्ति और डॉक्टर को सहमत होना होगा.

ब्रिटिश अध्ययन

नए अध्ययन से पता चलता है कि दो अलग-अलग वैक्सीन लगाना ज्यादा कारगर साबित हो सकता है. ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया है कि जिन रोगियों को पहली खुराक एस्ट्राजेनेका की लगी और चार सप्ताह बाद दूसरी खुराक बायोनटेक-फाइजर वैक्सीन की लगी, उनमें एस्ट्राजेनेका की दो खुराक लगाने वालों की तुलना में ज्यादा एंटीबॉडी विकसित हुईं.

कॉम-सीओवी परीक्षण के तौर पर, ऑक्सफर्ड के शोधकर्ताओं ने 50 वर्ष से ज्यादा उम्र के 830 वॉलंटियर को दो अलग-अलग वैक्सीन लगाए. इससे मिले नतीजों के मुताबिक, सबसे ज्यादा एंटीबॉडी उन लोगों में विकसित हुईं जिन्होंने बायोनटेक की दो खुराक ली थीं.

इसके बाद, वे लोग थे जिन्होंने एक खुराक एस्ट्राजेनका की ली थी और दूसरी बायोनटेक की. फिर वे लोग थे जिन्होंने एस्ट्राजेनेका की दो खुराक ली थीं.

बाल रोग और वैक्सीनोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर और इस शोध का नेतृत्व करने वाले मैथ्यू स्नेप ने बीबीसी को बताया कि कॉम-सीओवी के नतीजे कोरोना वायरस महामारी से लड़ने में एस्ट्राजेनेका की दो खुराक की अहमियत को कमतर नहीं आंक रहे हैं.

वह कहते हैं, "दोनों वैक्सीन कोरोना के खिलाफ काफी कारगर हैं. ये डेल्टा वेरिएंट के प्रभाव को भी कम करते हैं. इसे लगवाने के बाद अस्पताल में भर्ती होने और गंभीर रूप से बीमार होने से बचा जा सकता है.”

यूनाइटेड किंगडम में वैक्सीन की दो खुराक लगाने के बीच का अंतर आमतौर पर 8 से 12 हफ्ते का होता है. हालांकि, कॉम-सीओवी के अध्ययन के दौरान यह अंतर चार सप्ताह का रखा गया. स्नेप ने बीबीसी को बताया कि 12 सप्ताह के अंतराल पर अलग-अलग वैक्सीन की खुराक लगाने के नतीजे जुलाई में उपलब्ध होंगे.

देखेंः कोविड के खिलाफ कुछ कामयाबियां 

जर्मन अध्ययन

पश्चिमी जर्मनी में स्थित जारलैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया है कि जिन लोगों को पहली खुराक एस्ट्राजेनेका की लगी थी और दूसरी बायोनटेक-फाइजर की, उनमें उन लोगों के मुकाबले ज्यादा प्रतिरोधक क्षमता देखी गई जिन्हें एक ही वैक्सीन की दो खुराक लगी थीं, चाहे वह एस्ट्राजेनेका की हो या बायोनटेक की. 

तो, इन नतीजों से क्या समझा जाए? क्या दुनिया भर के देशों को टीकाकरण को लेकर अपना नजरिया बदलने की जरूरत है. क्या एक ही वैक्सीन की दो खुराकों की जगह दो अलग-अलग वैक्सीन की खुराक लगाने का समय आ गया है?

वैज्ञानिकों का जवाब हैः अभी नहीं.

देखिए, कहां कहां पहुंची वैक्सीन

परीक्षणों के नतीजे

कॉम-सीओवी अध्ययन के नतीजे प्री-प्रिंट के तौर पर प्रकाशित किए गए हैं. इसका अर्थ है कि वे अभी तक साथ मिलकर की गई समीक्षा की प्रक्रिया से नहीं गुजरे हैं, जहां स्वतंत्र वैज्ञानिक उनका मूल्यांकन करते हैं. वहीं, जारलैंड विश्वविद्यालय के अध्ययन के नतीजों की समीक्षा की गई और जुलाई के अंत में नेचर पत्रिका में प्रकाशित किया गया. 

हैम्बर्ग स्थित जारलैंड विश्वविद्यालय के अस्पताल में पिछले कुछ महीनों में 200 से ज्यादा लोगों ने इस परीक्षण में हिस्सा लिया. उनमें से कुछ को एस्ट्राजेनेका की दो खुराक लगाई गईं और कुछ को बायोनटेक-फाइजर की दो खुराक लगीं. तीसरे समूह को पहले एस्ट्रजेनेका की खुराक लगाई गई और फिर बायोनटेक-फाइजर की.

10 गुना ज्यादा एंटीबॉडी

शोधकर्ताओं ने वैक्सीन की दूसरी खुराक लगाने के दो सप्ताह बाद सभी की जांच की. सभी की एंटीबॉडी की तुलना की गई. जारलैंड विश्वविद्यालय में ट्रांसप्लांटेशन और इंफेक्शन इम्यूनोलॉजी की प्रोफेसर मार्टिना सेस्टेर ने बताया, "हमने परीक्षण में शामिल होने वाले लोगों में न सिर्फ कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ने वाली एंटीबॉडी की संख्या देखी, बल्कि यह भी देखा कि कथित न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडी कितने प्रभावी थे. इसी से पता चलता है कि ये एंटीबॉडी कोरोना वायरस संक्रमण से हमारे शरीर बचाने में कितनी कारगर हैं.”

एंटीबॉडी विकसित होने के मामले में, बायोनटेक की दो खुराक के साथ-साथ एस्ट्राजेनेका-बायोनटेक की एक-एक खुराक, एस्ट्राजेनेका की दो खुराक से बेहतर थीं. जिन लोगों ने दो अलग-अलग वैक्सीन की खुराक ली थीं, उनमें एस्ट्राजेनेके की दो खुराक लेने वालों की तुलना में 10 गुना ज्यादा एंटीबॉडी विकसित हुई.

सेस्टेर ने बताया कि न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडी को देखते हुए, दो अलग-अलग वैक्सीन की खुराक लेने वालों की स्थिति बायोनटेक की दो खुराक लेने वालों से ‘थोड़ी बेहतर' थी. हालांकि, स्वास्थ्य अधिकारियों का आमतौर पर यह कहना है कि जिन वैक्सीन की दो खुराक लेनी होती है, उनमें दूसरी खुराक भी उसी वैक्सीन की लेनी चाहिए जिसकी पहली खुराक ली थी. 

वीडियो देखें 03:24

लोगों तक कैसे पहुंचेगा कोरोना का टीका

एंटीबॉडी 'उल्लेखनीय' वृद्धि

स्पेन के कार्लोस- III हेल्थ इन्स्टीट्यूट में कॉम्बिवैक्स का परीक्षण किया गया. इसमें कुल 663 लोग शामिल हुए. इस परीक्षण के नतीजे भी कुछ इसी तरह के हैं. इस परीक्षण की शुरुआती रिपोर्ट नेचर पत्रिका में छपी है.

हालांकि, जारलैंड विश्वविद्यालय के नतीजों की तरह इसकी रिपोर्ट भी अभी फाइनल नहीं हुई है. नेचर पत्रिका में जो रिपोर्ट छपी है, उसमें अब तक तक के नतीजों की जानकारी दी गई है. अभी तक स्वतंत्र वैज्ञानिकों ने इस रिपोर्ट की जांच नहीं की है. 

इस परीक्षण में शामिल दो तिहाई लोगों को पहली खुराक एस्ट्राजेनेका की लगाई गई और दूसरी बायोनटेक-फाइजर की. हालांकि, शुरुआती जांच के नतीजे आने तक एक-तिहाई लोगों को वैक्सीन की दूसरी खुराक नहीं लगी थी.

बार्सिलोना में वालडेहेब्रॉन यूनिवर्सिटी अस्पताल में कॉम्बिवैक्स स्टडी की जांचकर्ता मैगडेलीना कहती हैं, "जिन लोगों ने पहली खुराक के बाद अलग वैक्सीन की दूसरी खुराक लगवाई उनके शरीर में तेजी से एंटीबॉडी विकसित हुईं. परीक्षण के दौरान देखा गया कि ये एंटीबॉडी सार्स-कोविड-2 के प्रभाव को निष्क्रिय करने में सक्षम थीं.”

नेचर पत्रिका में छपी रिपोर्ट में कनाडा के हैमिल्टन विश्वविद्यालय में इम्यूनोलॉजिस्ट चाऊ जिंग कहती हैं, "ऐसा लगता है कि बायोनटेक-फाइजर वैक्सीन की एक खुराक लेने के बाद, एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की एक खुराक लेने पर ज्यादा एंटीबॉडी विकसित होती हैं.”

जिंग इस अध्ययन में शामिल नहीं थीं. वह कहती हैं, "एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की दूसरी खुराक लेने वाले लोगों की तुलना में यह वृद्धि और भी अधिक स्पष्ट दिखाई दी.”

हालांकि, ये नतीजे अंतिम नहीं हैं. एक समस्या यह है कि स्पेन के इस परीक्षण में उन लोगों को शामिल नहीं किया गया है कि जिन्होंने एक ही वैक्सीन की दोनों खुराक ली हैं. इसलिए, दोनों समूहों के बीच तुलना नहीं की जा सकती. 

हमेशा मान्यता नहीं

शुरुआती नतीजे भले ही एक नई संभावना पैदा कर रहे हैं, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) अभी भी दो अलग-अलग वैक्सीन लगाने की सलाह नहीं देता है. डब्ल्यूएचओ की प्रवक्ता मार्गरेट हैरिस कहती हैं कि अभी तक पर्याप्त डेटा नहीं मिला है जिससे यह पुष्टि की जा सके कि यह एक सुरक्षित तरीका है या नहीं.

अभी जर्मनी में जब तक कोई व्यक्ति एक वैक्सीन या दो अलग-अलग वैक्सीन की दो खुराक नहीं ले लेता, तब तक यह माना जाता है कि उसका टीकाकरण पूरा नहीं हुआ है. जर्मन सरकार पॉल एर्लिच इंस्टीट्यूट (पीईआई) के दिशा-निर्देशों का पालन करती है.

हालांकि, सभी देशों में ऐसा नहीं है. उदाहरण के लिए, कनाडा में दो अलग-अलग वैक्सीन की दो खुराक लेने की मंजूरी दे दी गई है. अमेरिका में अभी भी इस पर अध्ययन ही हो रहा है.

तस्वीरों मेंः वैक्सीन पर दावत

गंभीरता से हो विचार

अगर शुरुआती नतीजों को देखें तो एस्ट्राजेनेका और बायोनटेक-फाइजर, दोनों वैक्सीन की एक-एक खुराक लेने से पर ज्यादा एंटीबॉडी विकसित हो सकती हैं. यह कोरोना वायरस के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का भरोसेमंद तरीका हो सकता है. सिर्फ इसलिए नहीं कि दोनों वैक्सीन एक जैसी हैं, बल्कि वे बाजार में उपलब्ध दो अलग-अलग कोविड-रोधी वैक्सीन हैं. 

एस्ट्राजेनेका एक पारंपरिक वेक्टर टीका है. मानव कोशिकाओं को, कोरोनावायस के खिलाफ एंटीबॉडी विकसित करने का निर्देश भेजने के लिए इन वैक्सीन में अलग अलग वायरसों के वर्शन होते हैं जो शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.

वहीं, बायोनटेक-फाइजर एक एमआरएनए वैक्सीन है. यह प्रतिरक्षा का नया तरीका है. एमआरनए वैक्सीन कोशिकाओं को प्रोटीन बनाना सिखाती हैं जिनसे प्रतिरक्षा विकसित होती है और एंटीबॉडीज बनती हैं.

शोधकर्ताओं के पास इस बारे में अभी पूरी जानकारी नहीं है कि आखिर क्यों इन दोनों वैक्सीन को मिला कर देने से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली बढ़ जाती है. जारलैंड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सेस्टेर चाहती हैं कि अलग-अलग वैक्सीनों को मिलाने और उनके इंटरैक्शन के बारे मे जानने के लिए और शोध होना चाहिए.

वह कहती हैं, "अगर शोध कर रही दूसरी टीमों को हमारे जैसे ही नतीजे मिलते हैं तो फिर वेक्टर और एमआरएनए वैक्सीन के एक साथ इस्तेमाल करने के तरीके पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.”

वीडियो देखें 03:20

वैक्सीन बनाने में कितना वक्त लगता है?

 

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