मीथेन को लेकर हंगामा है क्यों बरपा? | पर्यावरण | DW | 17.09.2021
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पर्यावरण

मीथेन को लेकर हंगामा है क्यों बरपा?

जलवायु की अधिकांश बहसें कार्बन डाइऑक्साइड में कटौती के इर्दगिर्द ही घूमती रही हैं, लेकिन उससे ज्यादा शक्तिशाली, उससे कम आमफहम और कभीकभार उससे ज्यादा गंध वाली ग्रीनहाउस गैस है- मीथेन, जिस पर चर्चा कम ही होती है.

वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को देखें तो को लेकर सबसे ज्यादा हौआ उसी गैस का क्यों है ये समझा जा सकता है. लेकिन बात सीओटू पर आकर रुक नहीं जाती. हमने तो उसके विषैले मिश्रण में मीथेन भी उड़ेल दी है. सीएच4 के रासायनिक नाम से ज्ञात इस गैस को अक्सर मवेशियों के पेट फूलने से जोड़ा जाता है. बात कुछ और भी है. लेकिन ये पाद निकालने या डकार छोड़ने की बात जैसी भी नहीं.  

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 1750 से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में मीथेन का हिस्सा सिर्फ तीन प्रतिशत का है, फिर भी तापमान में 23 फीसदी की ऐतिहासिक वृद्धि की जिम्मेदार तो यही गैस है. दूसरे शब्दों में ये ज्यादा ताकतवर है. वाकई ताकतवर. एक सदी के दौरान, एक टन मीथेन में 28 टन सीओटू के बराबर तापमान बढ़ाने की ताकत है. पिछले दो दशक में ही हमारा उत्सर्जन 10 फीसदी बढ़ गया है.

तो फिर ये क्यों न करें

काश कि ये इतना ही आसान होता! मीथेन न सिर्फ वो प्राकृतिक गैस है जो ऊर्जा ठिकानों को सप्लाई की जाती है और घरों को गरम रखती है, ये गैस वो बला भी है जो कचरे के ठिकानों से, चावल-धान से, मरे हुए जानवरों से, दलदल से और कुछ मामलों में हरित कहे जाने वाले जलबिजली जलाशयों से भी उठती है. 

कहने का मतलब ये कि दुनिया हर साल 57 करोड़ टन मीथेन गैस का उत्सर्जन करती है. हम इंसान इसमें से 69 प्रतिशत के जिम्मेदार हैं. सबसे पहला नंबर आता है खेती का. आंशिक रूप से, गैस भरे मवेशियों के चलते ही नहीं, कृषि सेक्टर से वैश्विक तापमान उतना ही बढ़ता है जितना कि करीब 79 करोड़ कारों से. जो दुनिया के करीब डेढ़ अरब की संख्या वाले बेड़े का आधे से अधिक है.

इस मामले में दूसरा नंबर आता है फॉसिल ईंधन से चलने वाले उद्योगों का. तीसरे नंबर पर है कचरा सेक्टर.

फॉसिल ईंधन का बुनियादी ढांचा मीथेन का प्रमुख और टालने योग्य स्रोत है. जर्जर और खराब देखरेख वाले गैस पाइपों के छेदों और दूसरी प्रक्रियाओं से गैस रिसने लगती है और आमतौर पर इन्हें कहा जाता है "भगौड़ा उत्सर्जन.” अगर इनका रखरखाव बेहतर होता, तो 1.83 अरब टन सीओटू के बराबर की बचत हो जाती. और भी बहुत कुछ हो सकता है. रिसाव की मरम्मत कर प्राकृतिक गैस बचाई जा सके तो अपग्रेड में आने वाला खर्च तक निकाला जा सकता है.

मीथेन से बल्ले बल्ले

जी हां. बुनियादी ढांचे में सुधारों से रिसाव कम किए जा सकते हैं और उनका पता चलना भी आसान हो जाता है. सैटेलाइट इमेज उनकी शिनाख्त कर लेती हैं. इस तरह फॉसिल ईंधन वाली कंपनियों के लिए अपने सिस्टम की कमियों को छिपाना या नकारना मुश्किल हो जाता है.

वीडियो देखें 04:28

गायों की गैस का पर्यावरण पर असर

और इसी ढंग से जलने वाली मीथेन को कचरे से निकालकर वित्तीय लिहाज से कारगर बनाया जा सकता है. दुनिया भर में कचरा ठिकानों के गैस प्रोजेक्ट जलाने के लिए मीथेन को जमा कर रहे हैं. अमेरिका में 70 प्रतिशत लैंडफिल गैसों से बिजली उत्पादन के लिए गैस बनाई जाती है. और हम ही कम से कम जलाने में मीथेन का इस्तेमाल कर सकते हैं.

लेकिन ये आदर्श स्थिति नहीं है क्योंकि इससे कार्बन डाइऑक्साइड बनती है जो हम पहले ही बता चुके हैं कि जलवायु संकट का प्रतीक बन चुकी है.

मामला इतना पेचीदा क्यों है?

पूरा माजरा समझ लीजिए. क्योंकि हम खराब पाइपों को बदल सकते हैं इसका मतलब ये नहीं कि हम अपने अहातों के दोस्तों यानी मवेशियों को भी ठोकपीट कर दुरुस्त कर सकते हैं जिससे कि वे मीथेन छोड़ना कम कर दें.

उन्हें जो खाना दिया जाता है उसमें बदलाव कर, समस्या को हम कुछ हद तक कम कर सकते हैं. जैसे फ्यूचरफीड जैसी चीज ठीक यही करती हैः ये मवेशियों का चारा है जिसमें तीन प्रतिशत ऑस्ट्रेलियाई सीवीड यानी समुद्री खरपतवार मिली हुई है. ये उत्सर्जन को 80 प्रतिशत तक कम करने का माद्दा रखती है. थोड़ा पथ्य परहेज हो जाए तो गाय की डकारों में कमी आ जाती है. कुछ शुरुआत तो हो.

और इससे आसान विकल्प ये होगा कि अपना खाना बदल दें. कम मांस और डेयरी उत्पाद का मतलब कम जानवर मतलब वायुमंडल में जाने वाली कम गैसें.

मांस में कटौती हर सवाल का जवाब नहीं

हरेक का तो नहीं लेकिन कुछ मामलों में तो है. लेकिन अभी उस पर बात नहीं करते हैं. अभी इसलिए नहीं क्योंकि हम बात कर रहे हैं पर्माफ्रोस्ट की.

परमा..बोले तो?!

परमाफ्रोस्ट होता ये है कि आर्कटिक के गरम होने के साथ कई सहस्त्राब्दियों से धरती के बर्फ से जम चुके इलाके अब पिघलने लगे हैं. और जब ये होता है, तो उनके नीचे न सिर्फ एक मौलिक लेकिन मृत अवस्था दिखने लगती हैं- जैसे कि बहुत साल पहले विलुप्त हुई शेर, बाघ और तेंदुआ प्रजातियां- बल्कि हजारों वर्षो से बंद मीथेन और सीओटू भी निकलने लगती है.

वीडियो देखें 03:47

भूरी बर्फ पिघलने से धरती पर संकट

इस पूर्व आइसस्केप का कुछ हिस्सा नयी दलदलों में परिवर्तित हो जाता है, जो वायुमंडल में मीथेन छोड़ती हैं और तापमान को बढ़ाती हैं. गलती हुई परमाफ्रोस्ट यानी हिमाच्छादित सतहें, गैर इंसानी मीथेन उत्सर्जन को 80 प्रतिशत तक बढ़ा देती हैं. और ये गैस दुनिया भर में सूखा, आग, बाढ़ और दूसरी मौसमी अतियों की आशंकाओं को और तीव्र कर देती है.  

हमें क्या करना चाहिए?

जरूरत किस चीज की है और वाकई किया क्या जा रहा है- दोनों में अंतर है. सबसे ताजा आईपीसीसी रिपोर्ट में साफ साफ लिखा है कि इससे पहले कि चीजें हाथ से निकल जाएं, हमें वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में जितना जल्दी हो सके, कटौतियां तेज करनी होंगी.  

मानव निर्मित मीथेन उत्सर्जन को पूरी तरह से हटा देना तो मुमकिन न हो लेकिन उन्हें थोड़ा भी कम कर सकें तो हरित प्रौद्योगिकियों को विकसित होने का समय मिल जाएगा जैसे निम्न-कार्बन विमान और जहाज.

जमीनी स्तर पर उत्सर्जित होने वाली मीथेन, ओजोन बनाती है जो श्वसन संबंधी सेहत का नुकसान कर सकती है. यूएनईपी के मुताबिक, मीथेन के उत्सर्जन को 45 प्रतिशत तक कम करने से हर साल दो लाख 55 हजार आकस्मिक मौतें टाली जा सकती हैं.

बहुत से जलवायु और पर्यावरणीय मुद्दों की तरह, नीति निर्माताओं के पास अर्थपूर्ण और दीर्घकालीन बदलाव लाने की ताकत है. लेकिन हम लोग भी अपने अपने स्तर पर योगदान दे सकते हैं (भले हम चाहें या ना चाहें.) बर्गर खाना कम करें, पाम ऑयल का इस्तेमाल कम करें और विमानों से सफर में कटौती करें. इन उद्योगों को अपना पैसा देने का मतलब है- जैसा चल रहा है वैसा ही चलने देना यानी उनके काम पर अपनी मंजूरी की मुहर लगा देना. लेकिन ये भी हमने देख लिया है कि इस धरती को वो सब गवारा नहीं होगा.  

रिपोर्टः जोए ग्रोस्टर्न

 

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