सिर्फ 10 फीसदी युवा जानते हैं तिरंगे के रंग | दुनिया | DW | 15.08.2016
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दुनिया

सिर्फ 10 फीसदी युवा जानते हैं तिरंगे के रंग

अगर देश के बारे में बुनियादी जानकारी होने को राष्ट्रभक्ति का आधार माना जाए, तो देश के अधिकांश लोगों की राष्ट्रभक्ति संदेह के घेरे में आ जाएगी.

अखबारों और टीवी चैनलों पर आजादी और राष्ट्रवाद पर चर्चा सुनकर लगता है कि पूरा देश ही राष्ट्रभक्ति में डूबा हुआ है. अक्सर बहसों के दौरान जो कुछ लोग राष्ट्रीय प्रतीकों के बारे में नहीं जानते उन्हें गद्दार तक कह दिया जाता है. इस धारणा को झुठलाता एक सर्वे सामने आया है. जिसमे मुंबई में सिर्फ 10 फीसदी युवाओं को देश के झंडे का रंग पता है.

दरअसल, युवाओं को देश के बारे में कितनी जानकारी है, यह जानने के लिए मुंबई के पोद्दार इंस्टिट्यूट ऑफ एजुकेशन ने मंबई, बेंगलुरु और चेन्नई में 18 से 23 साल के युवाओं के बीच सर्वे कराया. इस सर्वे से पता चला कि युवाओं के एक बड़े समूह को देश के बारे में बुनियादी जानकारी भी नहीं है. सर्वे के मुताबिक मुंबई में 10 फीसदी, तो बेंगलुरु में 12 और चेन्नई में महज 8 फीसदी लोगों को राष्ट्रीय ध्वज के रंगों की जानकारी है.

हालांकि जब रंगों के बारे में कुछ विकल्प सुझाए गए तब कुछ ज्यादा लोगों ने सही जवाब दिए. विकल्प मिलने के बाद तिरंगे के रंग के बारे में सही जवाब देने वाले युवाओं में बेंगलुरु सबसे आगे रहा. वहां के 35 प्रतिशत युवाओं ने तिरंगे के प्रयुक्त रंगों की सही पहचान की, जबकि मुंबई में केवल 22 फीसदी और चेन्नई के 20 फीसदी युवाओं ने सही रंगों की पहचान की.

सही ढंग से नहीं गा पाते राष्ट्रगान

इस सर्वे के अनुसार इन शहरों में 40 फीसदी से भी कम लोग सही ढंग से राष्ट्रगान गा पाते हैं. राष्ट्रगान के रचयिता रविंद्रनाथ टैगोर के बारे में भी सीमित लोगों को ही जानकारी है. मुंबई में 42 फीसदी, बेंगलुरु में 34 फीसदी जबकि चेन्नई में सिर्फ 28 फीसदी युवा 'जन गन मन' के रचयिता का नाम बता पाए. हालांकि दो नामों का विकल्प देने पर मुंबई के 53 प्रतिशत युवाओं ने रचयिता के रूप में रविंद्रनाथ टैगोर की पहचान की. इस मामले में बेंगलुरु ज्यादा पीछे नहीं है, वहां 49 फीसदी युवाओं को विकल्प देने के बाद रचयिता का नाम याद आ गया.

देखें: आजादी की 70वीं वर्षगांठ पर खास

सर्वे के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में पूछे गए कुछ साधारण सवालों के जवाब भी ज्यादातर लोग नहीं दे पाए. हिंदी फिल्मों और आंदोलनों के दौरान राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में अक्सर भगत सिंह का प्रयोग होता है. इसके बावजूद सर्वे में शामिल ज्यादातर लोग भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बारे में अंजान थे. देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में सिर्फ 34 फीसदी लोग ही बता पाए कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु कौन थे. यह सर्वे अगस्त महीने में कॉलेज कैंपसों, मेट्रो स्टेशनों और कॉफी शॉप्स में कराया गया था.

गूगल हैं ना!

राष्ट्रीय प्रतीकों या देश के बारे में बुनियादी सवालों के बारे में अनभिज्ञता पर संकोच ना होने की बात कहते हुए एक युवा तर्क देते हैं कि कुछ सवालों के जवाब ना आने से कोई कम राष्ट्रवादी नहीं हो जाता. वे कहते हैं कि यह सारी जानकारी उनके मोबाइल में है.वे जब चाहे गूगल कर इनके उत्तर देख सकते हैं. युवा पीढ़ी की गूगल पर निर्भरता पर कटाक्ष करते हुए संजय सिन्हा कहते हैं, झांसी की रानी था या थी, यह जानने के लिए भी बच्चों को गूगल का सहारा लेना पड़ता है.

वैसे, मानसिक स्वास्थ विशेषज्ञों का भी मानना है कि है कि टेक्नॉलजी पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता लोगों की यादाश्त कमजोर कर रही है. शिक्षा शास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार ने सर्वेक्षण के नतीजों पर चिंता जताते हुए कहा कि देश के बारे में कुछ बुनियादी बातों की जानकारी तो जागरूक लोगों को होनी ही चाहिए. हालांकि उनका भी मानना है, "राष्ट्रभक्ति को जांचने के लिए देश की बुनियादी बातों को जानना जरूरी नहीं है."

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