जर्मनी को मिला पहला भारतीय बिशप
जर्मनी में पहली बार विदेश में जन्मे किसी व्यक्ति को कथीड्रल का बिशप बनाया गया है. फादर जोशी पोटाकल भारत के केरल में जन्मे हैं और 20 साल से जर्मनी में रह रहे हैं.

बिशप बने जोशी पोटाकल
भारत से जर्मनी आए फादर जोशी पोटाकल को जर्मनी के माइंत्स कैथीड्रल में बिशप नियुक्त किया गया है. वह जर्मनी में इस पद पर पहुंचने वाले गैर-यूरोपीय मूल के पहले व्यक्ति हैं.
माइंत्स कथीड्रल में अभिषेक
जोशी पोटकाल को पोप लियो 14वें ने नवंबर 2025 में इस पद पर नियुक्त किया था. 15 मार्च 2026 को माइंत्स के कथीड्रल में उनका अभिषेक हुआ.
प्रवासियों में उत्साह
उनकी नियुक्ति के बाद से प्रवासी समुदाय में भारी उत्साह है. लोग इसे एक 'मजबूत संकेत' मान रहे हैं कि जर्मन कैथोलिक चर्च में अब प्रवासियों की भागीदारी को पूरी तरह स्वीकार किया गया है.
चर्च में विविधता
पोटाकल का मानना है कि उनकी नियुक्ति उन लाखों ईसाइयों के लिए एक प्रेरणा है जो प्रवासी पृष्ठभूमि से आते हैं. जर्मनी के चर्चों में अब विविधता एक वास्तविकता बन चुकी है, जिसे यह फैसला पुष्ट करता है.
एक तिहाई विदेशी
जर्मनी में लगभग 34 लाख कैथोलिक विदेशी नागरिकता वाले हैं. कई क्षेत्रों में तो 25 से 35 फीसदी तक श्रद्धालु घरों में जर्मन के बजाय दूसरी भाषाएं बोलते हैं, जो चर्च के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को दर्शाता है.
विदेशों से आ रहे पादरी
जर्मनी में पादरियों की कमी के कारण अब भारत और अफ्रीका से कई पादरी यहां सेवा देने आ रहे हैं. फादर जोशी खुद पिछले 20 वर्षों से जर्मनी में हैं और उनके पास जर्मन पासपोर्ट भी है.
विविधता का सम्मान
फादर जोशी कहते हैं कि जब समाज में प्रवासियों को लेकर दूरियां बढ़ रही हैं, तब चर्च का यह कदम विविधता का सम्मान करता है. माइंत्स के मुख्य बिशप ने भी इसे समय की मांग बताया है.
लकड़ी की अंगूठी
जोशी सादगी में विश्वास रखते हैं, इसलिए उनके बिशप का क्रॉस और अंगूठी लकड़ी से बनी है. उनका कहना है कि विश्वास बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि समुदाय के साथ मिलकर जीने में है.
सादगी में विश्वास
बिशप बनने के बाद भी फादर जोशी किसी महलनुमा निवास में रहने के बजाय माइंत्स के कार्मेलाइट मठ में ही रहेंगे. वह 15 साल की उम्र में इस मठ से जुड़े थे और इसे ही अपना परिवार मानते हैं.
जर्मन इतिहास में नया पन्ना
जोशी पोटाकल की यह यात्रा दिखाती है कि कैसे एक भारतीय पादरी ने अपनी सादगी और सेवा भाव से जर्मनी के धार्मिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है.