ईरान में नए राष्ट्रपति के आने के बाद परमाणु संधि वार्ता पर संकट | दुनिया | DW | 21.06.2021
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

ईरान में नए राष्ट्रपति के आने के बाद परमाणु संधि वार्ता पर संकट

पश्चिम ने ईरान को चेतावनी दी है कि परमाणु संधि को पुनर्जीवित करने के लिए हो रही वार्ताएं असीमित समय तक जारी नहीं रह सकतीं. इब्राहिम रईसी के राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों पक्षों ने वार्ता को कुछ समय के लिए रोक दिया है.

पश्चिमी नेताओं ने ईरान को चेतावनी दी है कि परमाणु संधि को पुनर्जीवित करने के लिए हो रही वार्ताएं असीमित समय तक जारी नहीं रह सकतीं. पिछले हफ्ते ईरान में इब्राहिम रईसी के राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों पक्षों ने वार्ता को कुछ समय के लिए रोक दिया है.

ईरान के साथ पश्चिमी देशों की परमाणु संधि को लेकर बातचीत अप्रैल से विएना में चल रही थी. इस बातचीत में ईरान और अमेरिका के समझौते में दोबारा लौटने को लेकर सहमति बनाने की कोशिश हो रही है. लेकिन पिछले हफ्ते इब्राहिम रईसी ने ईरान में चुनाव जीता है. रईसी पश्चिमी के कट्टर आलोचक और एक कट्टरपंथी माने जाते हैं. उनके राष्ट्रपति बनने के बाद विएना में वार्ताकारों ने करीब दस दिन के लिए बातचीत रोक दने की बात कही है.

रईसी अगस्त में पद संभालेंगे. वह व्यवहारिक माने जाने वाले मौजूदा राष्ट्रपति हसन रूहानी की जगह लेंगे, जिनके शासनकाल में ईरान ने पश्चिमी ताकतों के साथ परमाणु करार किया था. इस करार के तहत ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटाने की एवज में अपने परमाणु कार्यक्रम का आकार घटाने को सहमत हो गया था.

रईसी को लेकर संदेह

नए राष्ट्रपति रईसी के रुख को लेकर पश्चिमी देशों में ही नहीं, ईरान में भी फिलहाल संदेह है. हालांकि हर नीति पर आखिरी फैसला ईरान के कट्टरपंथी सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खोमेनी को ही लेना है. फिर भी, कुछ ईरानी नेताओं ने कहा है कि नए राष्ट्रपति के पद संभालने से पहले परमाणु समझौता कर लेना ईरान के हक में हो सकता है.

बातचीत में शामिल एक सरकारी अधिकारी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा कि यदि रईसी के पद संभालने से पहले समझौता हो जाता है तो ईरान द्वारा दी गई छूट के लिए वह अपने पूर्ववर्ती पर इल्जाम डाल सकेंगे. इस अधिकारी ने कहा, "समझौते को लेकर भविष्य में होने वाली दिक्कतों के लिए रईसी नहीं रूहानी जिम्मेदार होंगे.”

ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी, जिन्हें यूरोप के ई-3 कहा जाता है, इस समझौते के मध्यस्थ की भूमिका में रहे हैं. वे अमेरिका और ईरान को एक सहमति पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. पश्चिमी ताकतों का कहना है कि ईरान जितने ज्यादा समय तक समझौते का उल्लंघन करता रहेगा और प्रतिबंधित परमाणु सामग्री बनाएगा, समझौते को पुनर्जीवित करना उतना ही मुश्किल होगा. ई-3 के कूटनीतिज्ञों ने मीडिया को भेजे एक बयान में कहा, "जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं, वक्त किसी के साथ नहीं है. यह बातचीत हमेशा के लिए जारी नहीं रह सकती.”

अब जबकि बातचीत रोक दी गई है, तो संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी एजेंसी आईएईए और ईरान के बीच एक अन्य समझौता आगे बढ़ाने पर बात होगी. ईरान के यहां निगरानी करने को लेकह 2015 में हुआ यह समझौता 24 जून तक था.

रईसी का रवैया

रईसी का ईरान के राष्ट्रपति पद तक पहुंचना अनपेक्षित नहीं था. लेकिन यह समझौते के विरोधी पक्षों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. अमेरिका, इस्राएल और अरब देश पहले ही ईरान के साथ किसी भी समझौते को लेकर आशंकित रहे हैं. रविवार को ही इस्राएल के नए प्रधानमंत्री नफताली बेनेट ने कहा कि रईसी सरकार एक ‘क्रूर जल्लाद' की सरकार होगी, जिसके साथ परमाणु समझौता नहीं किया जाना चाहिए.

रईसी पर अमेरिका ने एक पुराने मामले में प्रतिबंध लगा रखे हैं. यह मामला 1988 का है जिसमें मानवाधिकार संगठनों और अमेरिका ने हजारों राजनीतिक कैदियों की न्यायेतर हत्याओं के आरोप लगाए थे. हालांकि इस बारे में रईसी ने सार्वजनिक तौर पर कभी कुछ नहीं कहा है. लेकिन परमाणु समझौते पर उनका रुख भी खोमेनी जैसा है कि इसके जरिए अमेरिकी प्रतिबंधों से छुटकारा पाया जा सकता है, क्योंकि इन प्रतिबंधों ने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़कर रख दी है.

इसलिए कई ईरानी नेता मानते हैं कि वार्ताकारों की मौजूदा टीम आने वाले कुछ महीनों तक काम करती रहेगी. एक अन्य नेता ने बताया, "रईसी का विदेश नीति को लेकर क्या रवैया रहता है, यह तब पता चलेगा जब वह अपना विदेश मंत्री चुनेंगे.”

वीके/सीके (रॉयटर्स, एएफपी)

DW.COM

संबंधित सामग्री