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अपराधभारत

बड़े शहरों में 'बिहारी' पहचान के मायने और हिंसा पर उठे सवाल

१४ मई २०२६

इसी अप्रैल दिल्ली में बिहार से आए प्रवासी मजदूर पांडव कुमार की गोली मारकर हत्या कर दी गई. इसे शहरों में पनप रही बिहार-विरोधी मानसिकता से जोड़कर देखा जा रहा है.

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दिल्ली में सामान से लदे अपने ठेले के ऊपर बैठा मजदूर
दिल्ली और कई अन्य बड़े शहरों में उनके अनुभव दिखाते हैं कि बिहार से आए लोगों को उनकी पहचान की वजह से काफी परेशान और प्रताड़ित किया जाता हैतस्वीर: Mayank Makhija/NurPhoto/picture alliance

बिहार के खगड़िया जिले के मूल निवासी 21 वर्षीय पांडव कुमार दिल्ली में रह कर फूड डिलीवरी का काम करते थे. 25 अप्रैल की रात करीब ढाई बजे वह अपने दोस्त रूपेश कुमार के साथ घर लौट रहे थे. इसी दौरान उनकी दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में तैनात कॉन्स्टेबल नीरज से कहासुनी हो गई. रूपेश के मुताबिक, बहस के दौरान नीरज चिल्लाने लगा, "तुम बिहारी हो, यहां से निकल जाओ.” इसके बाद उसने पांडव पर गोली चला दी. गंभीर हालत में पांडव को अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई.

ऊपरी तौर पर पांडव कुमार की मौत आपराधिक घटना लग सकती है. लेकिन कई और बड़े शहरों के उनके अनुभव दिखाते हैं कि बिहार से आए लोगों को उनकी पहचान की वजह से काफी परेशान और प्रताड़ित किया जाता है. देश में कई बार प्रवासी मजदूर भाषा और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर निशाना बनाए गए हैं. इसी साल मुंबई में बीएमसी चुनाव के दौरान राज ठाकरे ने उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाले लोगों को लेकर कहा कि महाराष्ट्र में हिंदी 'थोपने' की कोशिश करने वालों को वह बाहर कर देंगे.

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'बिहारी' होना गुनाह?

दिल्ली के शाहबाद डेरी इलाके में बस्ती अलग-अलग हिस्सों में बंटी हुई है. यहां पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश से आए लोग अपने-अपने मोहल्ले में रहते हैं. इसी इलाके में ऐसे परिवार भी हैं जो खुद को दिल्ली का मूल निवासी मानते हैं. लक्ष्मी देवी को इस बस्ती में रहते एक दशक बीत गया. वह मूल रूप से बिहार के सिमरी की रहने वाली हैं. वह घरों में काम कर महीने में करीब 8 हजार रुपये तक कमा लेती हैं. डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में लक्ष्मी ने बताया कि बिहारी होने की वजह से उन्हें अक्सर ताने सुनने पड़ते हैं.

वह कहती हैं, "जिन लोगों के घरों में हम काम करते हैं, वे सोचते हैं कि सभी मजदूर बिहार से ही आते हैं. लोग ‘बिहारी' शब्द का इस्तेमाल अक्सर किसी गाली की तरह हमें अपमानित करने के लिए करते हैं. चाहे बिहार से हो या उत्तर प्रदेश से, आपको ‘बिहारी' कहा जाता है. मैं बाजार में थी. मेरे पास 10 रुपये का नोट नहीं था. पास खड़े आदमी ने कहा, 'अरे जाने दे, ये तो बिहारन है.' मुझे बहुत बुरा लगा."

बिहार के सिमरी की रहने वाली लक्ष्मी देवी को शाहबाद डेरी बस्ती में रहते हुए दस साल से ऊपर हो चुके हैं
बिहार के सिमरी की रहने वाली लक्ष्मी देवी को शाहबाद डेरी बस्ती में रहते हुए दस साल से ऊपर हो चुके हैंतस्वीर: Shivangi Saxena

बिहार देश के सबसे गरीब राज्यों में गिना जाता है. राज्य की प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे कम है. खेती के अलावा काम के अवसरों की कमी के कारण हर साल लाखों लोग रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार, बिहार से करीब 74.54 लाख प्रवासी देश के 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रह रहे हैं. वे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों में निर्माण कार्य, सेवा क्षेत्र और असंगठित कामों में रोजगार तलाशते हैं.

लक्ष्मी सिमरी लौटना नहीं चाहती. वह इसकी वजह बताती हैं, "वहां काम के लिए कोई उद्योग और फैक्ट्री नहीं है. मैं पहले अपने गांव में रहती थी. हमारे परिवार को पत्ते जलाकर खाना बनाना पड़ता था क्योंकि जलाने के लिए लकड़ी तक नहीं थी. मैं लौट भी गई, तो बच्चों को खाना कैसे खिलाऊंगी?" वह मानती हैं कि यह सरकार की नाकामी है जिसकी कीमत शहरों में बिहारी प्रवासी चुका रहे हैं.

बिहार से दिल्ली कमाने गए प्रवासी मजदूरों की एक कच्ची कालोनी
बिहार से दिल्ली कमाने गए प्रवासी मजदूर ऐसी कई कच्ची कालोनियों में बिुनियादी सुविधाओं की कमी झेलते हुए रहते हैं तस्वीर: Shivangi Saxena

स्कूल से ही हो जाती है उत्पीड़न की शुरुआत

कॉलोनी के अधिकतर लोग पांडव कुमार की घटना के बारे में सोशल मीडिया के जरिए जान चुके थे. अनिल कुमार रीटेल शॉप में काम करते हैं. बिहारी होने की वजह से उन्हें स्कूल में बच्चे तंग करते थे. अनिल याद करते हैं, "शायद अगर मैं आरा में अपने गांव में पढ़ाई करता, तो वह बेहतर होता. मेरे पिता दिहाड़ी मजदूर थे. उस वक्त हम समृद्ध नहीं थे. स्कूल के लड़के मुझे मारते हुए घर तक आते थे. वे जानते थे कि हम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे. मेरे कजिन भाई कभी दिल्ली नहीं आए. उन्होंने गांव में रहकर पढ़ाई की और सरकारी परीक्षाएं पास कर लीं. मैं वर्कर ही रह गया. दिल्ली का माहौल हमारे लिए अच्छा नहीं है. मानो किसी खास राज्य से होना कोई गलती है.”

दरभंगा के दुग्धेश्वर पिछले 20 वर्षों से दिल्ली में रह रहे हैं. वह मजदूरी किया करते थे. अब उन्होंने घर पर एक छोटी-सी दुकान शुरू की है. पांडव कुमार के बारे में जानकर वह दुखी हैं. उनका कहना है कि बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा से लोग रोजगार के लिए पलायन करते हैं. लेकिन निशाना खास तौर पर बिहारियों को बनाया जाता है.

डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, "अगर बिहार के लोग इस शहर को छोड़ दें, तो दिल्ली वाले भूखे रह जाएंगे. उनके घर साफ नहीं होंगे. ऊंची इमारतें नहीं बनेंगी. हम हर शहर की लाइफलाइन हैं.”

दिल्ली में रहने वाले दरभंगा के दुग्धेश्वर अपनी छोटी सी दुकान चलाते हैं
पिछले 20 वर्षों से दिल्ली में रहने वाले दरभंगा के दुग्धेश्वर पहले मजदूरी किया करते थे और अब अपने घर पर एक छोटी-सी दुकान चलाते हैंतस्वीर: Shivangi Saxena

'गरीब, चोर और मजदूर की पहचान बन गया है बिहारी'

दुग्धेश्वर के पड़ोसी ज्ञानेंद्र (बदला हुआ नाम) पास की एक फैक्ट्री में दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. वह अपना अनुभव बताते हैं, "बिहारियों को बदनाम किया जाता है. धारणा बना दी गई है कि बिहारी शहरों में कमाने और चोरी करने आते हैं. मैं नोएडा में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करता था. एक बिल्डिंग में चोरी हो गई. आरोप हमारे साथी पर लगा दिया. यह कहकर कि तुम बाहर से हमारे घरों में डकैती करने आते हो. जबकि उसकी कोई गलती नहीं थी. पुलिस के आने से पहले ही उसे पकड़ लिया और बहुत मारा."

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मुन्ना कुमार उत्तर प्रदेश में बलिया के रहने वाले हैं. वह 1990 के दशक से शाहबाद डेरी में रह रहे हैं. उन्होंने बताया कि यह बस्ती 2010 के बाद तेजी से बढ़ी. उससे पहले उत्तर प्रदेश और बिहार से लोग दिल्ली काम ढूंढने आते और झोपड़ियां बनाकर रहते थे. उस वक्त से उन्हें यहां से हटाने की कोशिश की जा रही है. मुन्ना बताते हैं, "पहले कंझावला, बवाना और आसपास रहने वाले लोग आते थे और हमें धमकाते थे. वे अब तक कहते हैं कि हमने उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया है. यहां मुख्य बाजार में रहने वाले कुछ लोग खुद को दिल्ली का मूल निवासी बताते हैं. वे बोलते हैं कि इन बिहारी लोगों ने आकर दिल्ली को गंदा कर दिया है. इसके अलावा खासकर बिहारी पुरुषों को लेकर मानसिकता बना दी गई है कि वे दिल्ली में अपराध और हिंसा करते हैं.”

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इस कॉलोनी में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग अलग-अलग गलियों में रहते हैं. यूपी के लोग खुद को बिहारी कहलाना पसंद नहीं करते, बल्कि वे इससे चिढ़ते हैं. ठेकेदार और फैक्ट्री मालिक इसका फायदा उठाकर मजदूरों का शोषण करते हैं. मुन्ना ने कहा, "फैक्ट्री मैनेजर यूपी के मजदूरों को बिहारियों के खिलाफ भड़काते हैं कि ये लोग कम पैसों में काम कर रहे हैं. जिससे यूपी के मजदूरों को लगता है कि अगर बिहारी नहीं होते, तो उन्हें ज्यादा मजदूरी मिलती."

उत्तर प्रदेश में बलिया के रहने वाले मुन्ना कुमार 90 के दशक से शाहबाद डेरी में रह रहे हैं
उत्तर प्रदेश में बलिया के रहने वाले मुन्ना कुमार 90 के दशक से शाहबाद डेरी में रह रहे हैंतस्वीर: Shivangi Saxena

मामले ने पकड़ा राजनीतिक तूल

पांडव कुमार की मौत के बाद यह मामला राजनीतिक विवाद का विषय बन गया. केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और खगड़िया सांसद राजेश वर्मा ने परिवार से मुलाकात की. बिहार सरकार ने मृतक के परिजनों को आठ लाख रुपये अनुग्रह अनुदान देने के निर्देश दिए हैं. इसके अलावा जनसुराज पार्टी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन भी किया.

बिहार के ही आदित्य मोहन ने भी इस प्रदर्शन में भाग लिया था. उनका कहना है कि कुशल कामगारों और अफसरों को भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता, मगर बिहार से आने वाले मजदूरों को काम की जगह पर उत्पीड़न झेलना पड़ता है. स्थानीय लोग मजदूरी का अधिक पैसा मांगते हैं. इसलिए ठेकेदार बिहार के गांवों से मजदूर बुलाते हैं.

वह डीडब्ल्यू से अपनी बात रखते हैं, "दिल्ली के बदरपुर, नांगलोई, बुराड़ी और ऐसे कई इलाकों में बिहार से आए लोगों ने छोटे प्लॉट खरीदकर एक या दो कमरों के घर बना लिए हैं. दिल्ली की प्रभावशाली और खुद को ताकतवर बताने वाली जातियों को लगता है कि बिहारी आकर उनके संसाधनों पर कब्जा कर रहे हैं. इसी वजह से उनके मन में नफरत है. जो पुलिस कॉन्स्टेबल में भी दिखी. कोई नेता बिहारी प्रवासियों की बात नहीं करता. इसलिए हमें निशाना बनाया जा रहा है."

आदित्य मानते हैं कि इसका अंत तभी होगा जब बिहार में नई फैक्टरियां आएंगी और रोजगार पैदा होगा.