क्या जर्मनी में आकर रहेगी कोरोना वायरस की दूसरी लहर | दुनिया | DW | 28.07.2020
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दुनिया

क्या जर्मनी में आकर रहेगी कोरोना वायरस की दूसरी लहर

कोविड-19 के खिलाफ अब तक लड़ी गई कठिन लड़ाई से मिले सारे फायदे खोते नजर आ रहे हैं क्योंकि लोग खतरे से खेलने की गलती कर रहे हैं. फाबियान श्मिट का कहना है कि महामारी के दौर में ऐसी लापरवाहियां बहुत महंगी पड़ सकती है.

Spanien Palma de Mallorca | Coronavirus | Touristen (picture-alliance/dpa/M. Wrobel/Birdy Media)

स्पेन के मायोर्को में पर्यटकों की ऐसी भीड़ आम हो गई है. तस्वीर 12 जुलाई की है. जर्मनों में यह शहर खासा लोकप्रिय है और वे बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं.

कोविड-19 के संक्रमण दर को काबू में लाने के लिए अब तक काफी कीमत चुकाई जा चुकी है. चीन, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ के तमाम देशों ने फौरन कड़े लॉकडाउन लागू किए और संक्रमण के सिलसिले को रोकने और तोड़ने के लिए इसके मामलों को ट्रेस किया गया. यह सब प्रयास कारगर साबित हुए और किसी तरह नए संक्रमणों की संख्या को इस स्तर पर लाने में कामयाबी मिली कि उसका ठीक तरह से प्रबंधन किया जा सके. उन्हीं सारे कदमों का नतीजा रहा कि जर्मनी जैसे देशों के हेल्थ सिस्टम पर कभी इतना बोझ नहीं आया कि वह ध्वस्त होने की कगार पर पहुंचें. यही वजह रही कि कई अर्थव्यवस्थाएं धीरे धीरे पटरी पर लौटने की ओर बढ़ती दिख रही हैं. 

महामारी जल्दी खत्म होने के आसार नहीं

सामान्य जीवन की ओर लौटते दिखने को महामारी का अंत समझ लेना बहुत बड़ी भूल साबित होगी. इससे कई लोगों को सुरक्षित होने की एक झूठी तसल्ली मिलती नजर आ रही है. और यही कारण है कि लोग अब उतनी सतर्कता नहीं बरत रहे. लेकिन एक बार फिर इसे समझने की जरूरत है कि महामारी खत्म नहीं हुई है और दुनिया भर में तो संक्रमण दर इस समय तेजी से बढ़ रही है. इसका अर्थ हुआ कि हर दिन पहले से भी ज्यादा लोग वायरस की चपेट में आ रहे हैं. कोरोना महामारी पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक हो चुकी है.

जिन गरीब देशों में स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से ही कमजोर थीं, उन पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा है. खासतौर पर, ऐसे देश जहां गरीबी और अभाव में जी रहे लोग एक दूसरे के काफी पास पास रहने को मजबूर हैं वहां शारीरिक दूरी बना कर रखने का सलाह काम नहीं आती. इसके अलावा जिन देशों में सरकारों ने अर्थव्यवस्था की सेहत को अपने नागरिकों की सेहत से ज्यादा महत्व दिया, वहां भी संक्रमण की ऋंखला को तोड़ने के लिए पर्याप्त कड़े कदम नहीं उठाए गए. अमेरिका और ब्राजील जैसे देशों में इसकी मिसाल देखी जा सकती है.

गरीब और विकासशील देश केंद्र में

फिलहाल अमेरिका, ब्राजील, भारत, रूस, दक्षिण अफ्रीका और मेक्सिको में संक्रमण लगातार बढ़ रहे हैं. यह सभी देश फिलहाल कोविड के भंवर के केंद्र में माने जा सकते हैं. कई दूसरे देशों में संक्रमण दर को समतल किया जा चुका है लेकिन वहां भी दोबारा इसके लौटने की आशंका जताई जा रही है. यूरोप के कई देशों में संक्रमणों में अचानक उछाल देखने को मिल रहा है.

ऐसे में बीमारी के दोबारा लौटने की काफी संभावना है. हम इसे रोक तो नहीं सकते लेकिन इसकी रफ्तार कैसे कम की जा सकती है ये हमें पता चल चुका है. लेकिन इसके लिए सबको जिम्मेदाराना बर्ताव करना होगा. भीड़भाड़ से बचना होगा, पार्टी और दूसरे बड़े आयोजनों से दूर रहना होगा और अगर गर्मी की छुट्टियां मनाने जाना ही है तो वह भी केवल अपने सबसे करीबी लोगों के एक छोटे समूह में जाना चाहिए.

भीड़ से बचना ही होगा

जिन लोगों को लगता है कि अब उनसे और इंतजार नहीं हो रहा और उन्हें निश्चिंत होकर सबसे मिलना ही है, वे स्वार्थी हो रहे हैं. सच तो ये हैं कि हमने अब तक भी इसके लिए काफी कीमत चुकाई है और तमाम परिवारों ने अपने करीबी लोगों को कोरोना महामारी के चलते खो दिया है. कई अन्य लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है तो कइयों का कारोबार, काम-धंधा चौपट हो गया है. उनके लिए, अपने लिए - अभी हम सबको कोरोना वायरस को हल्के में लेने की गलती नहीं करनी चाहिए. पहले लगे प्रतिबंध हट जाने का मतलब बेपरवाह होकर सबकी जान को जोखिम में डालना नहीं है.

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