भारत-जर्मन रिश्ते के तारों को जोड़ने की बड़ी कोशिश | दुनिया | DW | 27.04.2018
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दुनिया

भारत-जर्मन रिश्ते के तारों को जोड़ने की बड़ी कोशिश

भारत और जर्मनी के बीच रिश्ते सदियों से हैं. लेकिन अगर कोई इस बारे में शोध करना चाहे तो पुख्ता जानकारी और स्रोत तलाशना कई बार मुश्किल होता है. अब इसी मुश्किल को आसान करने की कोशिश हो रही है.

बर्लिन की हुम्बोल्ट यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान जब मैं भारत और जर्मनी के संबंधों के मौलिक स्रोतों पर काम करना चाहती थी तो मुझे बहुत परेशानी झेलनी पड़ी. बड़ा सवाल यह था कि मुझे ये स्रोत कहां से मिलेंगे? इसी सवाल से डॉ. आनंदिता वाजपेयी को भी जूझना पड़ा है, जो हुम्बोल्ट यूनिवर्सिटी में रिसर्च एसोसिएट हैं और वह भारत और पूर्वी जर्मनी की सांस्कृतिक राजनीति पर शोध कर रही हैं. वह कहती हैं कि उनका प्रोजेक्ट "शीत युद्ध के सालों के दौरान भारत में जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक (जीडीआर) की मौजूदगी" उन गतिविधियों पर नजर डालता है जो दोनों देशों के बीच 1952 से 1972 के बीच राजनयिक संबंधों की कमी को कहीं ना कहीं पूरा करती हैं. इसकी एक बढ़िया मिसाल रवींद्रनाथ टैगोर के रूप में देखी जा सकती है जिन्हें आज भी जर्मनी में याद किया जाता है.

अगर जर्मनी में भारत को लेकर कोई शोध करना चाहता है तो उसे संबंधित सामग्री कैसे और कहां से मिलेगी? इस सवाल का जवाब है- आर्काइव में. जर्मनी में जानकारी को जमा करने और उसे क्रमबद्ध तरीके से संभाल कर रखने की लंबी परंपरा है. जर्मनी की विदेश प्रसारण सेवा डॉयचे वेले में ऐतिहासिक आर्काइव की प्रमुख डॉ कोर्डिया बाउमन कहती हैं कि "हमें 18वीं सदी से ही व्यवस्थित तरीके से तैयार लेखागारों में संभाल कर रखे गए स्रोत और जानकारी मिलती हैं." जर्मनी में कई तरह के आर्काइव हैं, जिनमें विभिन्न जानकारियां मौजूद हैं. इनमें स्टेट आर्काइव, चर्च आर्काइव, यूनिवर्सिटी आर्काइव, व्यापार और कारोबार आर्काइव के अलावा डॉयचे वेले जैसे आर्काइव संस्थानों के नाम लिए जा सकते हैं.

लेकिन अगर भारत में कोई टैगोर के बारे में जानकारी जुटाना चाहता है, तो वह कहां से शुरुआत करे? टैगोर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी हस्ती थे. दुनिया के बहुत से हिस्सों में उन्हें न सिर्फ भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्रवादी आंदोलन में उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है, बल्कि साहित्य और अन्य कलाओं में उनके योगदान को भी खूब सराहा जाता है. इसलिए जर्मनी में उनकी मौजूदगी राजधानी बर्लिन के कई लेखागारों में आपको मिलेगी. इनमें विदेश मंत्रालय का राजनीतिक आर्काइव, संघीय आर्काइव, प्रूसियन सांस्कृतिक विरासत प्रतिष्ठान का आर्काइव और बर्लिन का संघीय आर्काइव शामिल है.

इस सिलसिले में "आधुनिक भारत पर जर्मन आर्काइव (MIDA)" एक अहम परियोजना है जिसकी शुरुआत 2014 में हुई. तीन जर्मन संस्थानों ने इसे शुरू किया जिनमें जॉर्ज ऑगस्ट यूनिवर्सिटी गोएटिंगन का सेंटर फॉर मॉडर्न इंडियन स्टडीज, हुम्बोल्ट यूनिवर्सिटी बर्लिन का इंस्टीट्यूट फॉर एशिया एंड अफ्रीकन स्टडीज और बर्लिन का लाइबनित्स सेंटर फॉर मॉडर्न ओरिएंट शामिल हैं. भारत से जुड़े विषयों पर काम कर रहे इन संस्थानों को पता है कि शोध में किस तरह की परेशानियां सामने आती हैं, इसलिए उन्होंने इस बारे में जानकारी जमा करने और उस तक पहुंच को आसान बनाने की ठानी है.

इस प्रोजेक्ट का मकसद भारत और जर्मनी के संबंधों पर मुक्त रूप से उपलब्ध आंकड़ों के जरिए समृद्ध जानकारी मुहैया कराना है. अब तक इस डाटाबेस में 10 हजार फाइलें जमा हो चुकी हैं. इसके अलावा एक डिजिटल आर्काइव गाइड भी तैयार की जा रही है ताकि जर्मनी में भारत के बारे में सभी संबंधित विषयों के संग्रहों को एक साथ पेश किया जा सके. मीडा की रिसर्च एसोसिएट डॉ आनंदिता वाजपेयी कहती हैं कि यह प्रोजेक्ट आधुनिक भारतीय इतिहास और 1706 से लेकर 1989 तक भारत और जर्मनी के संबंधों के इतिहास को सूचीबद्ध करना चाहता है और उसका विश्लेषण भी. वह कहती हैं, "मीडा का मकसद भारत और जर्मनी के जटिल इतिहासों के साथ साथ दक्षिण एशिया के इतिहास के नए आयामों की भी पड़ताल करना चाहता है. जर्मन आर्काइव में मौजूद स्रोतों के जरिए इस तरह के नए परिपेक्ष्य के पर्दा हटाया जा सकता है. इन आर्काइव पर शायद अभी तक दक्षिण एशिया के स्कॉलरों का समुचित ध्यान नहीं गया है और वे पूरी तरह औपनिवेशक लेखागारों पर ही निर्भर हैं."

वापस टैगोर से जुड़ी रिसर्च पर लौटते हैं. मीडा डाटाबेस में अगर सर्च करें तो आपके सामने अलग अलग दस्तावेज आएंगे लेकिन वे सब आपस में जुड़े हैं जो विभिन्न जर्मन लेखागारों से लिए गए हैं. विदेश मंत्रालय के आर्काइव और संघीय आर्काइव के दस्तावेज बताते हैं कि टैगोर ने 1921, 1926 और 1930 में जर्मनी की यात्रा की थी. बर्लिन के संघीय स्टेट आर्काइव में तस्वीरों के साथ इन यात्राओं का ब्यौरा मौजूद है. 1921 में बर्लिन की यात्रा में टैगोर ने फ्रीडरिष विल्हेम यूनिवर्सिटी में "द मैसेज ऑफ द फॉरेस्ट" नाम से एक भाषण दिया था. इसी को अब हुम्बोल्ट यूनिवर्सिटी के नाम से जाना जाता है. टैगोर का यह भाषा शैलेक डिस्क पर रिकॉर्ड किया गया था और हुम्बोल्ट यूनिवर्सिटी के साउंड आर्काइव में जाकर आज भी इसे सुना जा सकता है.

1959 में जब जीडीआर के तत्कालीन प्रधानमंत्री ऑटो ग्रोटेवॉल ने भारत का दौरा किया था, तो भाषण की यह रिकॉर्डिंग भी उनके साथ ले जाई गई थी. ग्रोटेवॉल टैगोर के जरिए भारत और जर्मनी के बीच सांस्कृतिक स्तर पर संबंधों को सघन करना चाहते थे. आनंदिता वाजपेयी कहती हैं, "सांस्कृतिक संबंध मजबूत बनाने के अहम निशान और साथ ही साथ भारत द्वारा जीडीआर को आधिकारिक मान्यता दिए जाने के बाद पूरे भारत में भारत-जीडीआर मैत्री समितियां बनाई गईं."

इस तरह मीडा डाटाबेस दक्षिण एशिया और जर्मनी, दोनों ही जगह शोधार्थियों के लिए स्रोत बन सकता है. साथ ही दुनिया भर के वे रिसर्चर भी इससे लाभ ले सकते हैं जिनकी दिलचस्पी इस तरह के इतिहासों में है. इसके अलावा जो लोग भारत और जर्मनी के सबंधों और इन दोनों देशों के साझा इतिहास को समझना और परखना चाहते हैं, उनके लिए यह डाटाबेस बहुत काम आ सकता है.

इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए देखें: www.project-mida.de.

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