अरुणाचल प्रदेश में यूरेनियम की खुदाई पर चीन क्यों बौखलाया | भारत | DW | 23.03.2021
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भारत

अरुणाचल प्रदेश में यूरेनियम की खुदाई पर चीन क्यों बौखलाया

भारत के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में मिले नए भंडार से यूरेनियम के मामले में भारत के आत्मनिर्भर होने की संभावना जगी है. लेकिन यूरेनियम की खुदाई पर चीन की बौखलाहट कितनी सही है?

भारत के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल के बूमला में चीन के साथ लाइन ऑफ कंट्रोल पर गश्त लगाने भारतीय सैनिक. (21 अक्टूबर 2012 की फाइल फोटो)

भारत के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल के बूमला में चीन के साथ लाइन ऑफ कंट्रोल पर गश्त लगाने भारतीय सैनिक. (21 अक्टूबर 2012 की फाइल फोटो)

चीन सीमावर्ती इलाकों में भारत की हर गतिविधि पर नजदीकी निगाह रखता है. खासकर पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में तो वह केंद्रीय मंत्रियों और नेताओं के दौरे के अलावा स्थानीय विकास परियोजनाओं पर भी आपत्ति जताता रहा है. इसकी वजह यह है कि वह अरुणाचल को दक्षिण तिब्बत का हिस्सा मानता है. अब ताजा विवाद राज्य में यूरेनियम के भंडार का पता लगाने और उसकी खुदाई के मुद्दे पर पैदा हुआ है. चीन में सरकारी मीडिया और तमाम विशेषज्ञों ने इस खुदाई को अवैध बताते हुए भारत की खिंचाई की है. यूरेनियम का उपयोग परमाणु ऊर्जा के उत्पादन के लिए किया जाता है. इसे स्वच्छ ऊर्जा माना जाता है. यह पहला मौका है जब देश में यूरेनियम का भंडार तलाशने के लिए किसी जगह को आरक्षित किया गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि इलाके में यूरेनियम का भंडार मिलने और वहां उत्पादन शुरू होने के बाद भारत इस मामले में आत्मनिर्भर हो सकता है.

क्या है मामला?

भारत-चीन सीमा से महज कुछ किलोमीटर दूर अरुणाचल प्रदेश की मेचुका घाटी में हाल में यूरेनियम के भंडार का पता चला है. इलाके में बर्फीली पहाड़ियां होने की वजह से हवाई मार्ग से उस जगह पर जाना मुमकिन नहीं था. बावजूद इसके इस बारे में खोजबीन के लिए वैज्ञानिक दुर्गम मेचुका घाटी में भारतीय सीमा के सबसे आखिरी गांव तक गए. यूरेनियम की खोज के नतीजे सकारात्मक रहने के बाद अब जल्दी ही खनन शुरू किया जायेगा.

मेचुका या मेचुक अरुणाचल प्रदेश के शि-योमी जिले के तहत मेचुका घाटी में समुद्र तल से 1,829 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक छोटा-सा शहर है. उस शहर के बाद मैकमोहन लाइन भारतीय और चीनी को बांटती है. मेचुका शहर भारत-चीन सीमा से महज 29 किलोमीटर दूर है. यहां सड़क बनने से पहले इलाके में अकेली हवाई पट्टी थी जहां मौसम अनुकूल होने पर हेलीकॉप्टर उतर सकते थे. उसका इस्तेमाल भारतीय वायु सेना स्थानीय लोगों को खाद्यान्न और दूसरे जरूरी चीजों की सप्लाई के लिए करती थी. यूरेनियम का भंडार होने की संभावना के बाद सरकार ने मेचुका घाटी में खोज की अनुमति दी थी. उसके बाद परमाणु खनिज निदेशालय ने केंद्र सरकार के सहयोग से इस परियोजना पर काम शुरू किया.

परमाणु खनिज निदेशालय (एएमडी) के निदेशक डॉ. डीके सिन्हा ने बीते सप्ताह हैदराबाद में एक सेमिनार में बताया था, "केंद्र से प्रोत्साहन मिलने के बाद हमने यूरेनियम के भंडार की तलाश का काम शुरू किया था. इसके लिए शोधकर्ताओं की टीम को पैदल ही दुर्गम पहाड़ियों पर चढ़ना पड़ा. इस मिशन के तहत टीम मेचुका घाटी में भारतीय सीमा के सबसे आखिरी गांव तक गए.”

सिन्हा का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश की मेचुका घाटी में यह खोज जमीन से लगभग 619 मीटर की गहराई में की गई है. वह बताते हैं, "अरुणाचल में जिस जगह यूरेनियम के लिए खुदाई की परियोजना चल रही है वह चीनी सीमा से कुछ किलोमीटर भीतर भारतीय सीमा में है. वहां तक आवाजाही में काफी सहूलियत है. इसलिए यूरेनियम के उत्पादन में इसकी भूमिका अहम हो सकती है. इसके अलावा राज्य की राजनीतिक परिस्थिति भी इस परियोजना के लिए काफी अनुकूल है.”

परमाणु ईंधन परिसर के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी दिनेश श्रीवास्तव बताते हैं, "हिमाचल प्रदेश में भी यूरेनियम की खोज के प्रयास किए जा रहे हैं. अब मणिपुर ने भी इसकी खोज के लिए अपनी अनुमति दे दी है. इसके अलावा असम, नागालैंड, गुजरात, एमपी, यूपी, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड में भी काम चल रहा है.”

चीन की बौखलाहट

अरुणाचल प्रदेश में यूरेनियम का भंडार होने की खबरें मीडिया में छपने के बाद चीन ने इस मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है. चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स में छपी एक खबर में तो कुछ विशेषज्ञों के हवाले चीन सरकार से इस मामले में कार्रवाई की मांग की गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारत-चीन सीमा पर होने वाली बातचीत को नुकसान पहुंचेगा. उसने इसे एकतरफा भड़काने वाली प्रतिक्रिया तक करार दिया है.

दरअसल, चीन शुरू से ही अरुणाचल प्रदेश के दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा होने का दावा करता रहा है. अखबार ने यूरेनियम के भंडार संबंधी खबरें छापने के लिए भारतीय मीडिया की भी आलोचना की है. उसकी दलील है कि चीन ने अरुणाचल को भारत के हिस्से के तौर पर कभी मान्यता नहीं दी है. अरुणाचल को चीन में तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा या जंगनान के रूप में जाना जाता है. चीनी अखबार ने सिंघुआ विश्वविद्यालय में इंडियन स्टडीज के सहायक प्रोफेसर शी चाओ के हवाले लिखा है कि इलाके में यूरेनियम के भंडार का होना या नहीं होना बड़ा मुद्दा नहीं है. असली मुद्दा उस इलाके पर अपना दावा जताने का भारत का अड़ियल रवैया है. इससे सीमा विवाद और भड़कने का अंदेशा पैदा हो गया है. ग्लोबल टाइम्स का दावा है कि अरुणाचल प्रदेश को बीसवीं सदी में अवैध रूप से बनाया गया था. उसमें चीन का 90 हजार वर्ग किलोमीटर हिस्सा शामिल है.

इसबीच, राज्य में सत्तारुढ़ बीजेपी ने चीन की प्रतिक्रिया को बेतुका करार देते हुए कहा है कि एक संप्रभु राष्ट्र अपनी सीमा के भीतर कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है. पार्टी के एक प्रवक्ता कहते हैं, "जिस इलाके में यूरेनियम का भंडार होने की संभावना है वह शि-योमी जिले में है जो अरुणाचल का हिस्सा है. अरुणाचल प्रदेश शुरू से ही भारत का हिस्सा रहा है. ऐसे में चीन का दावा ही बेतुका और निराधार है.”

सामरिक विशेषज्ञ सुविमल मुखर्जी कहते हैं, "चीन को हमेशा अरुणाचल प्रदेश से समस्या रही है.वह प्रधानमंत्री के दौरों के समय भी आपत्ति जताता रहा है. लेकिन उसकी दलीलों में कोई दम नहीं है. अरुणाचल प्रदेश हमेशा भारत का हिस्सा रहा है. चीन अपनी गलतियों को छिपाने के लिए इस विवाद को जबरन अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास करता रहा है. लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय बिरादरी भी उसका असली चेहरा पहचान गई है.”

विशेषज्ञों का कहना है कि इलाके में यूरेनियम का भंडार मिलने और वहां उत्पादन शुरू होने के बाद भारत इस मामले में आत्मनिर्भर हो सकता है. फिलहाल वह यूरेनियम के आयात के लिए कजाखस्तान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर निर्भर है. देश में 1960 के दशक में परमाणु संयंत्रों का निर्माण शुरू होने के बाद भारत ने यूरेनियम का भंडार तलाशने और अपनी परमाणु क्षमता मजबूत करने की दिशा में ठोस प्रयास शुरू किया था. लेकिन यूरेनियम का भंडार कम होने और उसकी गुणवत्ता खराब होने की वजह से इस दिशा में ज्यादा प्रगति नहीं हो सकी थी.

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