भारत के राजा-महाराजाओं के बच्चों का स्कूल
राजस्थान के अजमेर में एक ऐसा स्कूल है, जिसे कभी 'राजकुमारों का स्कूल' कहा जाता था. अब भी यहां पढ़ने वाले बच्चे राजकुमारों से कम नहीं हैं! शाही परिवार से लेकर उद्योगपति और डिप्लोमैट्स के बच्चे यहां पढ़ाई कर रहे हैं.

राजकुमारों का स्कूल
राजस्थान के अजमेर में स्थित मेयो कॉलेज की पहचान कभी राजकुमारों का स्कूल होने की थी. आज यह भारत के नए अभिजात वर्ग के बच्चों को शिक्षा दे रहा है.
साल 1875 में स्थापना
इसे ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड मेयो ने इंग्लैंड के ईटन कॉलेज की तर्ज पर स्थापित किया था. मकसद था, भारतीय राजपरिवार और ब्रिटिश शासन के रिश्ते मजबूत हों. साल 1875 में ही अलवर के महाराजा के बेटे एक पालकी में 300 नौकरों के साथ यहां दाखिला लेने पहुंचे थे.
अब कितने छात्र पढ़ते हैं यहां?
अब इस ‘ईटन ऑफ द ईस्ट’ में 9 से 18 साल के करीब 850 छात्र पढ़ते हैं. इनमें कुछ ही शाही परिवार से आते हैं. ज्यादातर छात्र मंत्री, उद्योगपति, राजनयिक और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के परिवारों से हैं.
एक साल की फीस कितनी?
वार्षिक फीस करीब 10 लाख रुपये है. यह देश के कुछ चुनिंदा, सबसे महंगे बोर्डिंग स्कूलों में गिना जाता है. जोधपुर में इवेंट कंपनी चलाने वाले अभिषेक सिंह टाक इसी स्कूल से पढ़े हैं. वह बताते हैं, “मैंने अपने दोनों बेटों को भी यहां भेजा क्योंकि यह स्कूल हर तरह से तैयार करता है. मेरी जिंदगी की शुरुआत यहीं से हुई थी.”
स्कूल में सख्त अनुशासन
स्कूल का कैंपस 76 हेक्टेयर में फैला है. इसमें पुराने पेड़, हरी-भरी लॉन और संगमरमर की इमारतें हैं. छात्र तड़के उठते हैं और सख्त अनुशासन के बीच रात 9:30 बजे तक पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं.
समय के साथ चलता मेयो
हेडमास्टर सौरव सिन्हा कहते हैं, “हम विरासत का सम्मान करते हैं, लेकिन मेयो को आगे बढ़ते समय बदलते दौर के हिसाब से भी ढालते हैं.” अब यहां बच्चों की मानसिक सेहत का ध्यान रखने के लिए मनोवैज्ञानिक और महिला शिक्षक भी जोड़े गए हैं.
60 घोड़ों का अस्तबल
यहां पढ़ाई के साथ खेलों पर खास जोर है. पोलो, गोल्फ, स्विमिंग, शूटिंग और टेनिस समेत 20 खेलों की सुविधा है. हाल के वर्षों में फुटबॉल, क्रिकेट से ज्यादा लोकप्रिय हो गया है. कैंपस में ओलंपिक आकार का स्विमिंग पूल, 9-होल गोल्फ कोर्स और 60 घोड़ों का अस्तबल है.
छात्रों के सपने
यहां पढ़ने वाले छात्रों के सपने अलग-अलग हैं. कोई ऑक्सफर्ड जाना चाहता है, कोई डिप्लोमैट बनना चाहता है, तो कोई फुटबॉलर. 17 वर्षीय छात्र अद्वय सिद्धार्थ भाटिया कहते हैं, “मैं भारत में ही कारोबार शुरू कर देश की मदद करना चाहता हूं.” मेयो कॉलेज के मुताबिक, यही उसका नया मकसद है: परंपरा को संभालते हुए भविष्य गढ़ना.