सबसे प्रदूषित शहर भिवाड़ी में जहर सोखते लोगों को जानकारी तक नहीं | भारत | DW | 13.04.2022

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भारत

सबसे प्रदूषित शहर भिवाड़ी में जहर सोखते लोगों को जानकारी तक नहीं

भिवाड़ी को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बताया गया है. यहां के लोग जहरीली हवा में जी रहे हैं और बहुतों को तो इस जहर का पता तक नहीं है. पर बाकी भारत में भी हालत कोई बहुत अच्छी नहीं है.

भारत में प्रदूषण

भारत में प्रदूषण

भारत की राजधानी दिल्ली से सौ किलोमीटर से भी दूर एक चौराहे पर खड़े ट्रैफिक पुलिस के जवान सुरेंद्र सिंह धुएं और धूल के बादल को हाथ से हटाने की कोशिश करते हैं. फिर वह अपनी कमीज के बटन खोलते हैं और एक छोटा सा डिब्बा दिखाते हैं जो उनके सीने पर चिपका हुआ है.

48 वर्षीय सिंह कहते हैं, "यही मुझे जिंदा रखे हुए है." यह डिब्बा दरअसल एक कार्डिएक डिफिलब्रिलेटर डिवाइस है जो धड़कनें गिनती रहती है और अगर धड़कनों की संख्या खतरनाक हद तक कम हो जाए तो बिजली का छोटा सा झटका देती है ताकि दिल काम करता रहे.

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भिवाड़ी शहर के आसमान पर छाए धुएं और धूल के प्रदूषण की ओर इशारा करते हुए सुरेंद्र सिंह कहते हैं, "यह इस पागलपन की कीमत है." भिवाड़ी को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बताया गया है. औद्योगिक केंद्र के रूप में स्थापित भिवाड़ी ने 6,475 शहरों की उस सूची में पहला नंबर हासिल किया है, जिनके अध्ययन के आधार पर स्विट्जरलैंड की तकनीकी कंपनी आईक्यूएयर ने पिछले महीने सबसे प्रदूषित शहरों की सूची जारी की थी.

घातक बीमारियों का घर

भिवाड़ी की हालत यह है कि उसकी हवा में सूक्ष्म कण, जिन्हें पीएम 2.5 कहा जाता है, विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश के स्तर से 20 गुणा ज्यादा है. ये पीएम 2.5 कण इतने छोटे होते हैं कि सांस के जरिए फेफड़ों के अंदर घुस जाते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि प्रदूषित वायु में ज्यादा देर तक रहने से दमा और फेफड़ों के कैंसर जैसी घातक बीमारियां हो सकती हैं. इसके अलावा खून में ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक हद तक कम हो सकता है व धड़कनों की गति कम या ज्यादा हो सकती है जिससे सीने में दर्द रहता है और जकड़न महसूस होती है.

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शायद यही वजह है कि सुरेंद्र सिंह बीमार रहने लगे, जबकि वह ना धूम्रपान करते हैं ना शराब पीते हैं और लगातार पौष्टिक भोजन खाते हैं. वह मानते हैं कि 27 साल तक जहरीली हवा में सांस लेने का ही नतीजा था कि 2018 में उन्हें भयानक खांसी और सीने में दर्द की शिकायत हुई. उसके बाद वह ज्यादातर दफ्तर के अंदर ही काम करने लगे. उनके सहकर्मियों के लिए यह ईर्ष्या लायक स्थिति थी, जो हर रोज 12 घंटे की शिफ्ट के बाद लाल जलती आंखों के साथ खांसते हुए घर लौटते हैं.

वैसे, सिंह की चिंता से सब सहमत नहीं हैं. भिवाड़ी में गली-चौराहों पर ठेले लगाने वाले, इमारतें बनाने वाले मजदूर, जमांदार, सिक्यॉरिटी गार्ड और ऑटो ड्राइवर जैसे हजारों लोग रोज इसी हवा में सांस ले रहे हैं. इनमें से कई लोगों ने कहा कि हवा में उन्हें कोई खराबी नहीं लगती और उनकी सेहत पर कोई असर नहीं हो रहा है.

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बहुत से लोग तो यहां तक मानते हैं कि उनकी प्रतिरोध क्षमता इतनी मजबूत है कि उन्हें कुछ नहीं होगा. डंपर चलाने वाले रोहित यादव कहते हैं, "ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? मर ही जाऊंगा ना? यहां काम नहीं करूंगा तो भी तो मर जाऊंगा. गरीबों के लिए प्रदूषण बड़ी चिंता नहीं है, पेट भरना बड़ी चिंता है."

धीमा जहर

आईक्यू एयर के मुताबिक दुनिया के 100 से सबसे प्रदूषित शहरों में से 63 भारत में हैं. भिवाड़ी से सिर्फ ढाई घंटे दूर स्थित भारत की राजधानी भी उनमें शामिल है जो लगातार चार साल तक सबसे प्रूदषित शहर रहा है. शहर की हालत अब भी कोई बहुत ज्यादा सुधरी नहीं है. जगह-जगह हो रहे निर्माण कार्य, सड़क निर्माण के दौरान जलता कोलतार, वाहनों का धुआं और किसानों के खेतों से उड़कर आते धूल व धुएं ने लगभग हर बाशिंदे को प्रभावित किया है.

अमेरिका की शिकागो यूनिवर्सिटी के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक वायु प्रदूषण के कारण लगभग 40 फीसदी भारतीयों की औसत आयु में नौ साल तक की कमी हो रही है. दिल्ली स्थित सेंटर ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के साथ जुड़े विश्लेषक सुनील दहिया कहते हैं, "यह धीमा जहर है जो सालों तक आपके शरीर को धीरे-धीरे खत्म करता है."

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भिवाड़ी में काम कर रहे लोगों की इस धीमे जहर के प्रति अनभिज्ञता और जागरूकता की कमी का ही नतीजा है कि वे मास्क पहनने जैसे आसान उपाय भी नहीं अपना रहे हैं. लेकिन दहिया इसे सरकार की कमी मानते हैं कि वह लोगों को जागरूक नहीं कर पा रही है, जबकि उसने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना जैसे कार्यक्रम भी चलाए हैं. इस बारे में पर्यावरण मंत्रालय ने कोई टिप्पणी नहीं की.

आर्थिक नुकसान

एक सामाजिक संस्था क्लीन एयर फंड ने एक अध्ययन के बाद पिछले साल कहा था कि भारत को वायु प्रदूषण के चलते सालाना 95 अरब डॉलर यानी 72 खरब रुपये का नुकसान होता है, जो उसकी जीडीपी का कुल 3 प्रतिशत है.

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मजदूरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता इस स्थिति को लेकर खासतौर पर चिंतित हैं क्योंकि इससे मजदूरों की उत्पादकता तो कम होती ही है, साथ ही बीमारी आदि के कारण उनके परिवार का खर्चा भी बढ़ता है. खासतौर पर खुले में काम करने वाले मजदूरों के लिए तो खतरा और भी ज्यादा है. पीपल्स ट्रेनिंग एंड रिसर्च सेंटर के निदेशक जगदीश पटेल कहते हैं, "वे घर के अंदर रहना तो वहन नहीं कर सकते."

वीके/एए (रॉयटर्स)

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