पेटेंट नहीं मिला तो कंपनी क्या करेगी | विज्ञान | DW | 03.04.2013
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विज्ञान

पेटेंट नहीं मिला तो कंपनी क्या करेगी

भारत की सुप्रीम कोर्ट के कैंसर की एक महंगी दवा पर नोवार्टिस को पेटेंट देने से इनकार करने का दुनिया की बड़ी दवा कंपनियों पर बड़ा असर हो सकता है. सोमवार को आए फैसले ने दुनिया के दवा बाजार के बदलते रुख का संकेत दे दिया है.

पश्चिमी देशों की सरकारें नियमित रूप से दवाइयों में मामूली सुधार के लिए भी कंपनियों को पेटेंट देती रहती हैं. आम तौर पर पेटेंट की मियाद खत्म होने से पहले ही कंपनियां कुछ मामूली सुधार कर दोबारा पेटेंट हासिल कर लेती हैं. इससे दवा बनाने वाली कंपनियों को नए मरीज मिल जाते हैं और दवाइयों की कीमत बढ़ाने की वजह भी मिल जाती है. हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि आम तौर पर दवाइयों में सुधार उनकी बढ़ी कीमत को उचित ठहराने लायक नहीं होता.

भारत, इंडोनेशिया और कुछ दूसरे विकासशील देशों में स्थिति अलग है. ये देश पश्चिमी देशों के पेटेंट को खारिज कर रहे हैं और स्थानीय दवा कंपनियों को सस्ती जेनेरिक दवाएं बनाने के लिए लाइसेंस दे रहे हैं जिससे कि लोगों को कम पैसे में भी दवा मिल सके.

फाइजर और बायर जैसी कंपनियों ने सोमवार को भारतीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संभावित कदमों के बारे में कुछ कहने से इनकार कर दिया. हालांकि दवा उद्योग से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि इसके बाद बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां भारत में दवाओं के शोध और विकास का काम बंद कर सकती हैं. नोवार्टिस इंडिया के उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक एक अधिकारी ने कहा, "नोवार्टिस अब भारत में दवा के विकास में निवेश नहीं करेगी. मुझे नहीं लगता कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय कंपनी भारत में रिसर्च की योजना बना रही है." मिशिगन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और विश्लेषक एरिक गोर्डन भी इस राय से सहमत हैं. उन्होंने कहा, "अब भारत में शोध और विकास का कोई मतलब नहीं है."

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अब तक दवा कंपनियों को यकीन था कि वो दुनिया भर में होने वाली अपनी कमाई का एक तिहाई या कम से कम एक चौथाई हिस्सा उभरते बाजारों से कमा लेंगे. उनकी सरकार बढ़ते मध्यम वर्ग को लक्ष्य बना कर नीति तैयार कर रही है. उन्हें भरोसा था कि लोगों को स्थानीय सस्ती दवाओं की बजाय ब्रांडेड दवाइयों से लुभाया जा सकेगा. भारत के इस कदम ने उनकी उम्मीदों पर आशंकाएं खड़ी कर दी हैं. गॉर्डन का कहना है, "बड़े विकासशील बाजारों में कम पेटेंट होने से उनकी कमाई घटेगी और विकास की कहानियां महज कल्पनाएं बन कर रह जाएंगी."

बड़ी कंपनियों के साथ दिक्कत यह है कि उन पर पहले से ही चारों ओर से दबाव है. औद्योगिक देशों और खास तौर से यूरोप में सरकारी और निजी स्वास्थ्य सेवाएं उन पर दवाओं की कीमत घटाने के लिए दबाव बना रहे हैं. महंगी दवाओं को स्वास्थ्य योजनाओं में शामिल करने से इनकार किया जा रहा है. स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च ने मंदी के कई झटके झेले हैं. रिसर्च भी पहले से ज्यादा खर्चीला होता जा रहा है. इसके अलावा पिछले कुछ सालों में हर दवा कंपनी को मशहूर दवाओं का पेटेंट खत्म होने से भारी नुकसान हुआ है.

इंडोनेशिया और ब्राजील जैसे देश पिछले कई सालों से स्थानीय कंपनियों को सस्ती दवाएं बनाने के लिए लाइसेंस दे रहे हैं. हाल ही में भारत ने कैंसर की कई दवाओं का पेटेंट खारिज कर दिया इनमें बायर का नेक्सावर, एस्ट्राजेनेका पीलसी का इरेसा, फाइजर का सुटेंट और ब्रिस्टल मायर्स स्क्विब का स्प्राइसेल भी है.

भारत बहुत कम दवाइयों के लिए पेटेंट देता है. दवा कंपनियों का कहना है कि बिना पेटेंट की सुरक्षा के दवाइयों की बिक्री मुश्किल है. हालांकि कंपनियां यह भी जानती हैं कि भारत में शोध और विकास बंद करने का नुकसान भी हो सकता है. भारत में काम करना इतना सस्ता है कि यहां से निकलना भी आसान नहीं.

एनआर/एजेए (एपी)

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