मीडिया ने खुद को बचाए रखा है, कमोबेश | ब्लॉग | DW | 20.06.2016
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ब्लॉग

मीडिया ने खुद को बचाए रखा है, कमोबेश

भारतीय मीडिया की आजादी पर हमले कम नहीं हैं लेकिन उसने खुद को बचाए रखा है. उन हमलों का सामना करते हुए भी वह सच के साथ खड़ा होने में कामयाब रहा है, पूरी तरह नहीं तो काफी हद तक.

ऐसे वक्त में जब दुनियाभर में प्रिंट मीडिया संकट में है, अखबारों और पत्रिकाओं का सर्कुलेशन गिर रहा है और पाठक ऑनलाइन की ओर जा रहे हैं, भारत में प्रिंट मीडिया मजबूत हो रहा है. अखबारों का सर्कुलेशन बढ़ रहा है. यह अपने आप में बहुत सकारात्मक और उत्साहजनक बात है. भारतीय अखबार पाठकों के बीच ज्यादा गहरी पैठ बना रहे हैं. उन्होंने सीखा है कि कैसे इंटरनेट और टीवी के बढ़ते प्रभाव का सामना करते हुए भी अपनी जगह बनाई रखी जा सकती है. अखबारों ने खुद को बदला है, सुधारा है. वे लगातार बेहतर हो रहे हैं.

कंटेट की दृष्टि से भी और पाठकों से संवाद के स्तर पर भी पिछले कुछ समय में भारी बदलाव देखने को मिले हैं. इसका असर टीवी और ऑनलाइन मीडिया पर भी दिख रहा है. पाठकों और दर्शकों से इंटरेक्शन बढ़ा है. लोगों के लिए अपनी बात कहना आसान हुआ है. अब उनके पास स्पेस भी है और मीडियम भी. इस वजह से मीडिया की भाषा बदली है. उनकी स्टोरीज के विषय बदले हैं. अब पहले से कहीं ज्यादा मुद्दों पर और कहीं ज्यादा विस्तार से बात हो रही है. अब टीवी ऐसी स्टोरीज कर रहे हैं जिन्हें पहले स्क्रीन पर जगह नहीं मिलती थी. यह एक सकारात्मक बात है.

इस बीच सरकार बदलने का असर भी दिखा है. 2014 में एक बहुत ही तीखी राजनीतिक लड़ाई के बाद नई सरकार बनी है. एक तरफ वे लोग थे जिन पर भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता का ठप्पा लगा था. दूसरी ओर वे लोग थे जिन्हें अब तक परखा नहीं गया था लेकिन जिनकी पृष्ठभूमि एक विचारधारा विशेष से जुड़ी थी. लिहाजा एक तीखे संघर्ष के बाद एक नई सरकार देश को मिली. उसे कितने लोगों का समर्थन मिला, कितने पर्सेंट वोट मिले यह अलग बात है और व्यवस्थागत विषय है. इसी व्यवस्था का फायदा पहले दूसरी पार्टियों को भी मिलता रहा है. लिहाजा उस पर बहस करने की जरूरत अलग स्तर पर हो सकती है. लेकिन नई सरकार के समर्थकों ने मीडिया को भी प्रभावित किया है.

खासकर सोशल मीडिया के माध्यम से वे अपना असर दिखा रहे हैं. विपरीत विचारधारा के लोगों और खासकर पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है. हमारे संपादक को ही कितनी ट्रॉलिंग झेलनी पड़ती है. कई नामी पत्रकारों पर जबानी हमले हो रहे हैं. लेकिन उन सबने इससे निपटना या इसे नजरअंदाज करना भी सीखा है. लेकिन इसकी वजह मीडिया नहीं है बल्कि मेरा मानना है कि भारतीय गैर-दक्षिणपंथी ताकतों की लापरवाही है. वे लोग सोशल मीडिया को उस तरह इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं जिस तरह से दक्षिणपंथियों ने किया है, इसलिए एक खास तरह की आवाज ज्यादा सुनाई पड़ रही है.

लेकिन मीडिया ने अपनी आजादी और निष्पक्षता को कमोबेश बचाकर रखा है. अपनी सत्यनिष्ठा को बचा पाने में मीडिया कमोबेश कामयाब रहा है. पत्रकारों पर प्रेस्टिट्यूट्स जैसे हमले पहले भी हुए हैं और बेअसर रहे हैं, मुझे लगता है कि अभी भी भारतीय मीडिया पहले की तरह मजबूती से अपना काम जारी रखे हुए है. वहां विभिन्न आवाजों को जगह मिल रही है. विभिन्न विचारों को जगह मिल रही है. वहां निराशा के बजाय काम करने का जज्बा ही बढ़ा है.

जी. अनंतकृष्णन

(सीनियर असोशिएट एडिटर, द हिंदू)

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