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दिल्ली दंगों में पहली सजा, युवक को 5 साल की जेल

२१ जनवरी २०२२

गुरुवार को दिल्ली की एक अदालत ने दिनेश यादव नाम के एक युवक को पांच साल की सजा सुनाई है. दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए सांप्रदायिक दंगों में यह पहली सजा है.

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तस्वीर: Syamantak Ghosh/DW

गुरुवार को दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने 2020 में हुए दंगों के मामले में पहली सजा का ऐलान किया. दिनेश यादव नाम के एक युवक को 5 साल की जेल और 12,000 रुपये के जुर्मान की सजा दी गई है. दिल्ली दंगों में 50 से ज्यादा लोग मारे गए थे जिनमें से ज्यादातर मुसलमान थे.

दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगे शहर में दशकों की सबसे घातक सांप्रदायिक हिंसा थी. महीनों तक जारी रहे नए नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शनों के बाद ये दंगे हुए थे, जिनमें अल्पसंख्यकों के घरों पर बलवाइयों की भीड़ ने आगजनी और मारकाट मचाई थी.

अदालत में गवाहों और सरकारी वकील ने कहा कि दिनेश यादव 200 से ज्यादा लोगों की उस भीड़ का हिस्सा था जिसने दिल्ली में मनोरी नाम की एक महिला के घर पर हमला किया था. यादव की वकील शिखा गर्ग ने कहा कि इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की जाएगी.

छह लोगों को जमानत

इससे पहले इसी हफ्ते दिल्ली हाईकोर्ट ने सांप्रदायिक हिंसा के दौरान गोकुलपुरी में हुई एक युवक दिलबर नेगी की हत्या के मामले में मंगलवार को छह लोगों को जमानत दे दी थी. आरोपियों के खिलाफ गोकुलपुरी थाने में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज थी.

जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने मंगलवार को मोहम्मद ताहिर, शाहरुख, मोहम्मद फैजल, मोहम्मद शोएब, राशिद और परवेज को जमानत दे दी. इन सभी आरोपियों पर मिठाई की दुकान में तोड़फोड़ और आग लगाने से संबंधित एक मामले में मुकदमा दर्ज किया गया था, जिसके चलते 22 वर्षीय दिलबर नेगी की की जलने से मौत हो गई थी.

फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में हिंसा हुई थी. दंगे 23 से 29 फरवरी तक चले थे और इनमें कम से कम 50 लोग मारे गए थे. इसके अलावा हजारों लोग बेघर भी हो गए थे.

सबसे घातक दंगे

पिछले साल मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी ने दंगाग्रस्त इलाकों में पड़ताल और 50 लोगों से बात के बाद एक रिपोर्ट जारी की थी. दंगों में अपनी जान बचा लेने वाले, चश्मदीद गवाह, वकील, डॉक्टर, मानवाधिकार कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त पुलिस अफसर आदि से बातचीत के बाद तैयार रिपोर्ट के अनुसार पुलिसकर्मियों ने कई जगहों पर अपने सामने हो रही हिंसा को रोकने के लिए हस्तक्षेप नहीं किया, जब हस्तक्षेप किया भी तो नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन वाले लोगों पर हमला करने के लिए या उन्हें गिरफ्तार करने के लिए. कई मामलों में पुलिस ने पीड़ितों की शिकायतें दर्ज करने से भी इनकार कर दिया.

26 फरवरी के एक वीडियो में पुलिस को सड़क पर चलते हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता खालिद सैफी को हिरासत में लेते हुए देखा जा सकता है. खालिद के परिवार का कहना है कि उन्हें हिरासत में यातनाएं दी गईं, अस्पताल ले जाया गया और उसी रात कड़कड़डूमा अदालत परिसर की पार्किंग में ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर जेल में डाल दिया गया.

11 मार्च को जब खालिद को फिर अदालत में पेश किया गया, तब वो व्हीलचेयर पर थे. बाद में उन पर आतंकवादियों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाने वाला कानून यूएपीए लगा दिया गया. खालिद आज भी जेल में हैं. उनकी पत्नी का कहना है कि उन्हें हिरासत में बहुत ही क्रूरता से यातनाएं दी गईं.

रिपोर्टः विवेक कुमार (रॉयटर्स)

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