समाज में एकीकृत नहीं हो पाते हैं भारत आने वाले प्रवासी | ब्लॉग | DW | 13.01.2021
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समाज में एकीकृत नहीं हो पाते हैं भारत आने वाले प्रवासी

दुनिया में सबसे अधिक प्रवासी भारतीय हैं. लेकिन भारत में रहने वाले प्रवासियों को संदेह और भय की नजर से देखा जाता है. माइग्रेशन पर जारी वैश्विक रैंकिंग में भारत को प्रवासियों के लिए सबसे बुरे देशों में से एक पाया गया है.

दुनिया में सबसे ज्यादा प्रवासी भेजने वाले भारत में जब बात आती है आने वाले प्रवासियों की तो इस मामले में उसका रिकॉर्ड संतोषजनक नहीं है. माइग्रेशन इंटीग्रेशन पॉलिसी इंडेक्स (माइपेक्स) के एक ताजा अध्ययन में भारत को 100 में से 24 अंक ही मिले हैं. यह पाया गया है कि भारत आने वाले प्रवासी समाज में एकीकृत नहीं हो पाते हैं. वे अलग-थलग रहने को विवश होते हैं.

यूरोप के दो बड़े थिंक टैंकों- बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स स्थित माइग्रेशन पॉलिसी ग्रुप और स्पेन के बार्सीलोना स्थित सेंटर फॉर इंटरनेशनल अफेयर्स ने 2004 में इस रैंकिंग को जारी करने की शुरुआत की थी. तबसे इसने संयुक्त राष्ट्र, विषय विशेषज्ञों और दुनिया की सरकारों और नीति निर्माताओं के बीच अपनी प्रतिष्ठा अर्जित की है. प्रवासियों की एकीकरण या समन्वय नीति से जुड़े जिन तीन मुख्य आयामों पर यह इंडेक्स काम करता है वे हैं- बुनियादी अधिकार, समान अवसर और सुरक्षित भविष्य. इन तीन आयामों के दायरे में फिर देशों की माइग्रेशन इंटीग्रेशन की पद्धतियों का मूल्यांकन किया जाता है.

10वेंनंबरपरहैअमेरिका

ऐसी चार पद्धतियां बनायी गई हैं- समग्र एकीकरण की पद्धति यानी प्रवासियों को समान अधिकार, अवसर और सुरक्षा की गारंटी मिलती है. कागजी समानता की पद्धति यानी प्रवासियों को समान अधिकार और लंबी अवधि की सुरक्षा तो हासिल होती है लेकिन समान अवसर नहीं मिल पाते. अस्थाई एकीकरण पद्धति का अर्थ है कि प्रवासियों को बुनियादी अधिकार और समान अवसर तो मिलते हैं लेकिन समान सुरक्षा नहीं दी जाती और उन्हें लंबी अवधि का प्रवास हासिल करने में अवरोधों का सामना करना पड़ता है. चौथी पद्धति है- एकीकरणविहीन प्रवास जिसके तहत प्रवासियों को बुनियादी अधिकारों और समान अवसर मुहैया नहीं होते हैं, भले ही वे लंबे समय से देश में रहते हों.

माइपेक्स की ताजा रैंकिंग में माइग्रेशन के लिए टॉप पांच देशो में कनाडा, फिनलैंड, न्यूजीलैंड, पुर्तगाल और स्वीडन शामिल हैं. टॉप टेन में एशिया का कोई देश नहीं है. अमेरिका 10वें नंबर पर है जबकि सबसे ज्यादा प्रवासियों को खपाने वाला देश वही है. प्रवासियों और शरणार्थियों को लेकर उदार रहा जर्मनी भी कई कारणों से टॉप टेन से बाहर है. भारत का नाम उन पांच देशों में शामिल है जहां प्रवासियों का एकीकरण नहीं हो पाता है यानी प्रवास से जुड़ी नीतियां ऐसी किसी व्यवस्था की इजाजत नहीं देती हैं लिहाजा लंबे समय तक रह भी जाएं, तो इन देशों में प्रवासियों को समान अधिकार, अवसर या समाज में भागीदारी कभी हासिल नहीं हो पाती है. इसीलिए इन देशों को प्रवासियों के लिए सबसे प्रतिकूल आंका गया है.

भारतका सबसे बुरा हाल

सबसे नीचे के पांच देशों में साइप्रस, चीन, रूस, इंडोनेशिया और भारत  हैं. 24 अंकों के साथ सबसे निचले पायदान पर भारत है. जानकारों के मुताबिक भारत की इस रैंकिंग का मतलब ये भी है कि प्रवासियों के लिए देश के दरवाजे थोड़ा बहुत ही खुले हैं. ये रवैया नीतियों से लेकर समाज के व्यवहार तक झलकता है. ध्यान देने वाली बात है कि दुनिया में सबसे अधिक प्रवासियों की संख्या भारतीयों की है. संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय प्रवास संगठन (आईओएम) की 2020 की माइग्रेशन रिपोर्ट के मुताबिक एक करोड़ 75 लाख भारतीय विभिन्न देशों में प्रवासी हैं, उसके बाद चीन और मेक्सिको का नंबर आता है. विदेशों से सबसे ज्यादा धन स्वदेश भेजने वाले प्रवासियों में भारतीयों का नंबर पहला है. 27 करोड़ से अधिक लोग यानी दुनिया की साढ़े तीन प्रतिशत आबादी बतौर प्रवासी विभिन्न देशों में रहती है.

और भारत में कितने प्रवासी रहते हैं? 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत पचास लाख प्रवासियों का ठिकाना है. संयुक्त राष्ट्र के 2019 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रवासियों की संख्या में गिरावट आई है. 1990 में उनकी संख्या साढ़े सतर लाख से ज्यादा थी और 2019 में घटकर पचास लाख से कुछ अधिक रह गई थी. दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी आयोग के जनवरी 2020 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में पनाह चाहने वालों की संख्या दो लाख से कुछ अधिक ही बताई है.

नियमित और अनियमित अंतरक्षेत्रीय आवाजाही का संबंध मजबूत और एक समान ऐतिहासिक जड़ों, भौगोलिक निकटताओं और सांस्कृतिक और पारिवारिक रिश्तों के अलावा प्राकृतिक विपदाओं, हिंसा और सत्ता के दमन और राजनीतिक अस्थिरता से भी है. 2019 में दक्षिण एशिया में करीब डेढ़ करोड़ अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों में से 80 प्रतिशत लोग इसी उपक्षेत्र में एक देश से अन्य देश को माइग्रेट हुए हैं. भारत इस इलाके में प्रमुख माइग्रेशन ठिकाने के रूप में रहा है. 1947 के बंटवारे के समय पाकिस्तान से आने वाली आबादी और 1960 के दशक में तिब्बती शरणार्थियों का बसेरा बना भारत- नेपालियों, बांग्लादेशियों, श्रीलंकाई तमिलों से लेकर रोहिंग्या मुसलमानों तक के लिए भी आश्रयस्थल बना है या माइग्रेशन का कॉरीडोर.

छोटेमोटेरोजगारसेहीजुड़ेहैं प्रवासी

भारत के असंगठित क्षेत्र में लाखों बांग्लादेशी और नेपाली प्रवासी, निर्माण सेक्टर में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं, कुछ टैक्सी या ऑटो रिक्शा चलाते हैं, कोई दुकान लगाता है तो कोई सड़क पर फल और सब्जी की रेहड़ी लगाता है. कुछ लोग घरों में काम करते हैं तो कुछ व्यापारिक प्रतिष्ठानों और दुकानों में. अधिकांश प्रवासी छोटेमोटे रोजगार से ही जुड़े हैं. लेकिन असंगठित क्षेत्र में उनकी मेहनत और योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

जाहिर है जीडीपी में कुछ मामूली अंश की ही सही लेकिन योगदान उनका भी है. अनियमित प्रवासियों की निश्चित संख्या नहीं है लेकिन उनकी संख्या भी कम नहीं होगी, ऐसा माना जाता है. लेकिन ये प्रवासी समाज और राजनीति में सक्रिय भागीदारी से दूर ही रखे गए हैं. वे समाज में घुलनामिलना भी चाहें तो इसके आगे राजनीतिक और सामाजिक अवरोध हैं. उन्हें अक्सर सवाल, संदेह और भय से देखने की प्रवृत्ति भी रही है. उनके काम और पहचान को लेकर भी समाज में एक टैबू लंबे समय से रहा है.

भारत में ठोस रोजगार और श्रम बाजार में प्रवासियों के लिए, समग्र रूप से देखें तो आशाजनक स्थितियों का अभाव है. स्वास्थ्य के लिहाज से कुछ राहतें जरूर हैं. जैसे समन्वित बाल विकास सेवाओं के तहत पूरक पोषण, अनौपचारिक शिक्षा, टीकाकरण और छोटे बच्चों के हेल्थ चेकअप जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जैसी सेवाएं प्रवासी समुदायों और शरणार्थियों के लिए भी खुली हैं.

इसी तरह तिब्बती और श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों के लिए भी स्वास्थ्य योजनाएं हैं. जो उन्हें केंद्रीय स्तर की इंटीग्रेशन नीतियों के जरिए हासिल हैं. लेकिन भारत की कुल प्रवासी आबादी के ये चार प्रतिशत ही हैं. मुख्य समाज की उदासीनता, भीड़ की हिंसा और सरकारों के रवैये के अलावा इधर कोविड-19 की वैश्विक महामारी ने गरीबों के साथ साथ शरणार्थियों और प्रवासी वंचितों को और मुश्किल में धकेल दिया है. आंकड़े भी बताते हैं कि ये स्थिति कमोबेश पूरी दुनिया में बनी है.

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