साइबर बुलीइंग से घिरे भारत के बच्चे और किशोर | भारत | DW | 17.03.2020
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भारत

साइबर बुलीइंग से घिरे भारत के बच्चे और किशोर

भारत साइबर बुलीइंग का एक कुख्यात ठिकाना बन गया है.2018 की एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के बाद अब क्राई संस्था की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश में इंटरनेट इस्तेमाल करने वाला, हर दस में से एक बच्चा ऑनलाइन प्रताड़ना का शिकार है.

बच्चो और किशोरों के कल्याण के लिए गठित स्वयंसेवी संस्था, चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) ने पिछले दिनों दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में एक सर्वे किया था. सर्वे में सैंपल की संख्या 600 से कुछ अधिक ही थी लेकिन इससे सोशल मीडिया दौर की नयी भयावहता का अंदाजा तो लगता ही है. अध्ययन में पाया गया है कि हर दस में एक बच्चा साइबर बुलीइंग की चपेट में आता है और इनमें से आधे बच्चे ऐसे हैं जो अपने साथ हो रही ऑनलाइन बदतमीजी या बदमाशी की शिकायत भी अपने परिजनों, शिक्षकों या अन्य कानूनी संस्थाओं या कंपनियों से कर पाते हैं. 13-18 साल के करीब 28 प्रतिशत वे बच्चे जो चार घंटों से ज्यादा इंटरनेट पर थे वे बुलीइंग के शिकार ज्यादा बने. पिछले महीने जारी की गई इस रिपोर्ट से पता चलता है कि सिर्फ 35 प्रतिशत बच्चे ही एनसीईआरटी से प्रकाशित इंटरनेट सेफ्टी गाइड के बारे में जानते  हैं या उससे परिचित हैं.

प्रतिष्ठित संस्था कम्पेरिटेक की वेबसाइट में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि साइबर प्रताड़ना के मामले में भारत के अलावा ब्राजील और अमेरिका वैश्विक सूची में सबसे ऊपर के तीन देश हैं. प्यू संस्था के 2007 के एक अध्ययन के मुताबिक 32 प्रतिशत किशोर साइबर प्रताड़ना के शिकार बनते हैं. "बुलीइंग स्टैस्टिक्स” के मुताबिक 80 प्रतिशत किशोर नियमित रूप से मोबाइल फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और इनमें से अधिकतर किसी न किसी रूप में साइबर बुलीइंग झेलते हैं. यूनिसेफ के एक आंकड़े के मुताबिक वैश्विक स्तर पर हर तीन में एक इंटरनेट यूजर, बच्चा है यानी 33 प्रतिशत. इंडिया इंटरनेट रिपोर्ट 2019 के मुताबिक भारत में हर तीन में से दो इंटरनेट यूजर 12 से 29 साल की उम्र के हैं. ये कुल यूजरों का 66 प्रतिशत है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2017 से 2018 की एक साल की अवधि में साइबर अपराधों में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी पाई गई है. सिमेनटेक की एक रिसर्च के मुताबिक भारत में हर 10 में से आठ व्यक्ति साइबर बुलीइंग के शिकार बनते हैं. 

साइबर बुलीइंग का अर्थ है कंप्यूटर, लैपटॉप, स्मार्टफोन, टैबलेट आदि किसी डिजीटल उपकरण के जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या चैटरूप या गेमिंग के प्लेटफॉर्म पर किसी यूजर को (खासकर बच्चों और किशोरों और महिलाओं को) अश्लील, आपत्तिजनक टेक्स्ट, वीडियो, ऑडियो, ग्राफिक्स या चित्र भेजना या कई यूजर में प्रसारित करना, गलत तथ्य देना, मानहानि करना, ब्लैकमेल, अफवाह फैलाना, मानसिक रूप से उसे प्रताड़ित करना उसके साथ ऑनलाइन गालीगलौज या अपशब्दों के जरिए बदतमीजी या दुर्व्यवहार करना, उसकी निजी सूचना लीक करना, साइबर बुलीइंग के दायरे में आता है. साइबर स्टॉकिंग यानी यूजर की ऑनलाइन गतिविधियों को टटोलने की प्रवृत्ति भी साइबर बुलीइंग का हिस्सा मानी जाती है. पीड़ितों का मानसिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक ब्रेकडाउन या बिखराव भी साइबर बुलीइंग का एक चिंताजनक पहलू है. बुलीइंग के साथ साथ डॉक्सिंग के बारे में भी जानना जरूरी है. इंटरनेट पर ये वो नाजायज गतिविधि है जिसमें व्यक्ति के सोशल मीडिया अकाउंट और अन्य ऑनलाइन प्रोफाइलों के जरिए उसके बारे में सूचना निकाल ली जाती है और फिर उन सूचनाओं या जानकारियों के आधार पर उसे परेशान किया जाता है.

साइबर बुलीइंग करने वालों की मानसिकता, मनोविकार, वर्चस्व, बदले या ईर्ष्या की भावना, दूसरों को तकलीफ पहुंचाने में मजा लेने की क्रूर मनोदशा, जैसे व्यवहारों को समझने की जरूरत भी है. कानून के डर से बेफिक्र होने की मानसिकता भी उन्हें ऑनलाइन दुर्व्यवहार की निर्भयता दे देती है. लेकिन दोषियों या अभियुक्तों को कानूनन दंडित करने से पहले उनमें मनोवैज्ञानिक सुधार की गुंजाइश भी देखी जानी चाहिए. पहले दंड और फिर सुधार की प्रक्रिया को उलटने की जरूरत है. लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि ऐसा होने तक दूसरी ओर पीड़ितों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए. उनकी परवाह करना हमेशा पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.

सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर स्कूलों या स्वतंत्र स्तरों पर जागरूकता सेल बनाई जा सकती हैं जहां बच्चे साइबर बुलीइंग जैसी पेचीदा और डरावनी स्थितियों में फौरन उनकी काउंसिलिंग या कानूनी मदद हासिल कर सकें. बेवजह के सवालों, दोस्तों, सहपाठियों और करीबियों में बदनामी या नेमशेमिंग के डर और पुलिस या अदालत के चक्करों से निजात दिलाने की भी जरूरत है. सोशल मीडिया ट्रॉल्स पर भी सख्त कार्रवाई की जरूरत है. यूं तो महिला और बाल विकास मंत्रालय ने साइबर बुलीइंग के बढ़ते मामलों को देखते हुए हेल्पलाइन लांच की है और विभिन्न स्वयंसेवी और निजी संस्थाओं ने ऑनलाइन अपराधों, घोटालों और प्रताड़नाओं की शिकायतों के खिलाफ अभियान और कार्यक्रम भी बनाए है, आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं उपधाराओं के तहत ऑनलाइन आपत्तिजनक व्यवहार के लिए सजाओं का प्रावधान भी है लेकिन मूल बात यही है कि उन पर कितनी सख्ती या तत्परता से अमल हो पाता है. 

सोशल मीडिया व्यवहार के बारे में शिक्षित करने की सबसे पहली शुरुआत पारिवारिक पर्यावरण की सामाजिकता और स्नेहिल वातावरण के निर्माण से ही हो सकती है. अगर बच्चे निर्धारित समय से ज्यादा या जरूरत से ज्यादा इंटरनेट पर व्यस्त हैं या रोजमर्रा के व्यवहार में असामान्य हैं तो उनका पर्यवेक्षण और मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग घर से ही शुरू हो सकती है. सबसे ज्यादा जरूरी है परिवारों में अलगाव की स्थिति न बनने देना, चाहे वो आपसी खींचतान की वजह से हो या अपने अपने स्वार्थों के चलते आपसी सलाह से निर्मित. एक व्यक्ति बेशक एक इकाई है लेकिन घर और समाज में यही इकाई एक वृहद नागरिक परिप्रेक्ष्य में सामूहिकता और सामुदायिकता के निर्माण की इकाई भी है. वो उससे विच्छिन्न नहीं की जा सकती है. ब्रिटिश कवि जॉन डॉन्न ने 17वीं सदी में कह दिया थाः "नो मैन इज ऐन आईलैंड....”

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