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तस्वीर: Save the Children
समाज

कोरोना का असरः बढ़ गए बाल विवाह

मुरली कृष्णन
२५ जून २०२१

कोरोना महामारी ने भारतीय समाज को आर्थिक तौर पर काफी ज्यादा प्रभावित किया है. महामारी की वजह से देश में बाल विवाह के मामले तेजी से बढ़े हैं. खर्च से बचने के लिए, लोग कम उम्र में ही बेटियों की शादी कर रहे हैं.

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पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद की रहने वाली 15 साल की नीलम की मई में शादी हुई है. यह शादी बंगाल में यास चक्रवात आने के ठीक कुछ दिनों पहले हुई. नीलम के परिवार वाले पहले से ही महामारी की वजह से परेशान थे. वे जानते थे कि चक्रवात की वजह से भी उनका काफी नुकसान होगा. इसलिए, उन्होंने चक्रवात के पहले ही बेटी की शादी करने का फैसला लिया. 

पश्चिम बंगाल भारत के उन पांच राज्यों में से एक है जहां कम उम्र में शादी करने का प्रचलन सबसे अधिक है. पूरे देश में 12 प्रतिशत लड़कियों की शादी 15 से 19 साल की उम्र में कर दी जाती है. वहीं, बंगाल में यह दर 25.6 प्रतिशत है.

कोलकाता में जबला एक्शन रिसर्च ऑर्गनाइजेशन में काम करने वाली बैताली गांगुली ने डॉयचे वेले को बताया, "राज्य में ऐसे परिवारों की संख्या काफी ज्यादा है जिनकी जिंदगी दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर है. कोविड की वजह से इन्हें काम मिलना बंद हो गया. इन्हें काफी ज्यादा आर्थिक संकट से गुजरना पड़ रहा है.”

मदद मांगने वाली लड़कियां बढ़ीं

बाल अधिकार संगठन का कहना है कि पूरे राज्य में, खासकर ग्रामीण इलाकों में बाल विवाह के मामले काफी तेजी से बढ़े हैं जो चिंताजनक हैं. बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता बिपल्ब मंडल ने डॉयचे वेले को बताया, "हमने महामारी के दौरान बाल-विवाह के कई मामलों को रोकने की कोशिश की. कई बार हम अपने प्रयास में सफल भी हुए, लेकिन एनजीओ के हस्तक्षेप के अलावा भी बहुत कुछ करने की जरूरत है.”

दक्षिण भारत स्थित राज्य तेलंगाना में बाल सुरक्षा हेल्पलाइन पर आने वाले कॉल की संख्या काफी बढ़ गई है. कई लड़कियां राज्य के अधिकारियों से मदद मांग रही हैं. उनका कहना है कि उनके माता-पिता उन्हें शादी के लिए मजबूर कर रहे हैं.

फरवरी 2019 से मार्च 2020 तक, सरकार की तरफ से संचालित महिला विकास और बाल कल्याण विभाग ने राज्य में बाल विवाह के 977 मामले रोके. महामारी की शुरुआत के बाद से यह संख्या बढ़कर 1355 तक पहुंच गई है. स्फूर्ति फाउंडेशन एनजीओ के निदेशक श्रीव्याल वुय्युरि ने डीडब्ल्यू से कहा, "यह आधिकारिक आंकड़ा है. आप खुद अनुमान लगा सकते हैं कि ऐसे कितने मामले होंगे जिनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई होगी.”

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान, भारत में इस साल अप्रैल और मई महीने में एक दिन में चार लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए. हालांकि, अब यह संख्या एक दिन में करीब 50 हजार तक पहुंच गई है. मामले कम होने पर देश के अलग-अलग हिस्सों में लागू किए गए प्रतिबंधों में छूट दी जा रही है. हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि कोरोना पर पूरी तरह से नियंत्रण पाने में भारत को अभी लंबा सफर तय करना होगा.

बाल विवाह के खिलाफ जंग

बाल-विवाह के ज्यादा मामले

नाइजर, गिनी, दक्षिण सूडान, चाड और बुर्किना फासो के साथ, भारत दुनिया के कुछ उन देशों में से है जहां बाल विवाह को व्यापक तौर पर सामाजिक स्वीकृति मिली हुई है. इसकी मुख्य वजह गरीबी, कानून का सही तरीके से पालन न होना, पारिवारिक सम्मान से जुड़ी चिंता, और पितृसत्तात्मक समाज है. हालांकि, 2001 के बाद से देश में बाल-विवाह के मामलों में कमी आनी शुरू हुई है. इसके बावजूद, 2011 की जनगणना की रिपोर्ट से पता चलता है कि देश में हर तीन में एक महिला की शादी 18 साल से कम उम्र में हुई है. यह समस्या ग्रामीण इलाकों में सबसे अधिक है जहां भारत की दो-तिहाई आबादी रहती है.

भारत में डेटा जर्नलिज्म की शुरुआत करने वाले IndiaSpend की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 13 राज्यों के 70 जिलों में बाल-विवाह के ‘सबसे ज्यादा मामले' दर्ज किए गए हैं. देश में होने वाले बाल-विवाह के कुल मामलों में 21 प्रतिशत मामले इन जिलों में दर्ज किए गए हैं.

बाल-विवाह के मामलों में लैंगिक असमानता भी काफी ज्यादा देखने को मिलती है. लड़कों की तुलना में लड़कियां बाल-विवाह से सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं. इससे बच्चों के अधिकारों का भी उल्लंघन होता है. विशेषज्ञ कहते हैं कि कम उम्र में शादी होने की वजह से महिलाओं के शारीरिक और मानसिक विकास पर असर होता है. वे कुपोषण का शिकार हो सकती हैं.

हालांकि, सरकार ने बाल विवाह को रोकने के लिए 2006 में बाल विवाह निषेध अधिनियम बनाया था, लेकिन यह नियम धरातल पर पूरी तरह लागू नहीं हो पाया. जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है. भारत में बाल अधिकार की सर्वोच्च ईकाई राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के अनुसार, भारत के शहरी इलाकों में भी कम उम्र में विवाह के मामले बढ़ रहे हैं, खासकर लड़कियों के.

कोरोना महामारी में तेजी से बढ़े मामले

बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली कार्यकर्ता एनाक्षी गांगुली ने डॉयचे वेले से कहा, "महामारी के दौरान बाल विवाह की संख्या आसमान छू रही है. हमारा मानना है कि ऐसा गरीबी, असुरक्षा, लैंगिक असमानता और कानून का पूरी तरह पालन न होने की वजह से हो रहा है.” कार्यकर्ताओं का कहना है कि आर्थिक तौर पर कमजोर माता-पिता कम उम्र में ही अपनी बेटी की शादी कर देते हैं, ताकि वे बेटी के लालन-पालन में होने वाले खर्च से बच जाएं.

राजस्थान स्थित ‘महिला जन अधिकार समिति' संस्था महिला सशक्तिकरण के लिए काम करती है. इसकी संस्थापक इंदिरा पंचोली कहती हैं, "शहर हो या गांव, जहां भी लड़कियों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता वहां बाल-विवाह ज्यादा होते हैं. इसके नतीजे काफी नुकसानदायक होते हैं.”

कार्यकर्ताओं का कहना है कि कम उम्र में शादी की वजह से लड़कियां अपने मौलिक अधिकारों से वंचित रह जाती हैं. उनका बचपना छिन जाता है. ज्यादातर मामलों में, शादी होते ही उनका स्कूल छूट जाता है. कम उम्र में गर्भ धारण होने से उनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है. साथ ही, यौन शोषण होने का जोखिम बढ़ जाता है.

भारत में यूनिसेफ के प्रतिनिधि यासमीन अली हक ने डॉयचे वेले को बताया, "कोविड 19 की वजह से भारत में बाल-विवाह के बढ़ते मामले को लेकर हम चिंतित हैं. महामारी की वजह से स्कूल बंद हो गए हैं, आर्थिक तौर पर लोगों को काफी नुकसान हुआ है, और सामाजिक सेवाओं में रुकावटें पैदा हो रही हैं. इन सारी वजहों से बाल-विवाह के खतरे बढ़ सकते हैं.” हक ने जोर देकर कहा कि जिला स्तर पर मौजूद निकायों को सशक्त बनाया जाना चाहिए, ताकि अधिकारी तेजी से कार्रवाई कर सकें और बाल विवाह को रोक सकें.

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