रिपोर्ट: लॉकडाउन के दौरान भी बेदखल किए गए लोग | भारत | DW | 21.08.2020
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भारत

रिपोर्ट: लॉकडाउन के दौरान भी बेदखल किए गए लोग

हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क की रिपोर्ट के मुताबिक देश में कोरोना वायरस महामारी के दौरान 20,000 लोगों को बलपूर्वक मकानों से बाहर कर दिया गया.

कोरोना वायरस महामारी के दौरान राज्य प्रशासन की तरफ से बलपूर्वक कम से कम 20,000 लोगों को घरों से निकाला गया. गैर लाभकारी संगठन हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क (एचएलआरएन) ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का दावा किया है. रिपोर्ट के मुताबिक महामारी के दौरान 16 मार्च और 31 जुलाई 2020 के बीच देश में बलपूर्वक घर खाली कराने की घटनाएं दर्ज की गई. एचएलआरएन की एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर शिवानी चौधरी डीडब्ल्यू से कहती हैं यह संख्या मीडिया रिपोर्ट्स और संपर्कों से इकट्ठा की गई हैं. वह कहती हैं, "लेकिन असलियत शायद इससे भी गंभीर होगी, क्योंकि देश भर के सभी आंकड़े हमारे पास नहीं है. अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक आवास अधिकार एक मानव अधिकार है. भारत के सुप्रीम कोर्ट और कई हाई कोर्ट ने भी यह माना है और दोहराया है, लेकिन फिर भी कानून का उल्लंघन करते हुए, सरकार लोगों का घर जबरदस्ती तोड़ती है और उन्हें बेदखल करती है."

एचएलआरएन का कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशों और परिवार कल्याण मंत्रालय के 'घर पर रहने' की सलाह के बावजूद राज्य की एजेंसियों ने कम आय वाले लोगों के घर को मनमाने ढंग से ढहा दिया. शिवानी अफसोस जताकर कहती हैं कि बेदखल करने वालों पर कभी कोई कार्यवाही नहीं होती और ना ही जबरन बेदखली करने वालों को कोई सजा होती है. शिवानी के मुताबिक, "कोरोना महामारी के समय जब सभी को घर में रहने के लिए कहा गया, ऐसे समय में लोगों का घर तोड़ना और उन्हें बेघर करना सिर्फ गैर कानूनी ही नहीं है बल्कि बहुत ही क्रूर और दुख की बात है."

एचएलआरएन के मुताबिक महामारी के समय में इस तरह से प्रशासन और एजेंसियों द्वारा घर खाली कराना पीड़ितों में कोरोना के जोखिम को बढ़ाता है. शिवानी कहती हैं, "महामारी के कारण देशभर में गंभीर आर्थिक संकट है और मजदूर खासकर बहुत मुश्किल झेल रहे हैं. इनमें से आवासहीन लोगों के लिए खास समस्याएं हैं. सरकार को पर्याप्त आवास सभी को देना चाहिए, तोड़फोड़ बंद करना चाहिए और रोजगार गारंटी कानून को शहरी और ग्रामीण इलाको में लागू करना चाहिए. शहर और गांव में लोगो के आवास और भूमि अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए."

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महामारी के दौरान बलपूर्वक बेदखल किए गए लोग.

संगठन ने लगातार होते बलपूर्वक घर खाली कराने और घर ढहाए जाने के मामले की निंदा करते हुए राज्यों से तत्काल प्रभाव से कार्रवाई को स्थगित करने की मांग की है. एचएलआरएन के मुताबिक जबरन घर खाली कराना मानवाधिकार का उल्लंघन है, साथ ही यह गरीबों के लगातार होने वाले व्यवस्थित बेदखली को भी दर्शाता है. संगठन का कहना है कि निरंतर घर ढहाने का कार्य और बेदखली सीधे तौर पर बेघर, भूमिहीनता, विस्थापन, गरीबी और आय में असमानता को बढ़ावा देता है. प्रभावित लोग मानवाधिकार उल्लंघन का सामना करने के अलावा उनके जीवन के स्तर में काफी गिरावट आती है. कोविड-19 महामारी ने पर्याप्त आवास को स्वास्थ्य, सुरक्षा और जीवन के प्रमुख निर्धारक के रूप में दोहराया है.

साथ ही रिपोर्ट में बीते तीन सालों का भी जिक्र है जिसमें कहा गया है कि देश में 5,68,000 लोगों को बलपूर्वक घर से बेदखल किया गया. शिवानी कहती हैं, "जबरन बेदखली से लोगों के कई मानव अधिकारों का उल्लंघन होता है. लोगों के पास बहुत ही कम रास्ते हैं न्याय पाने के लिए. हमारी रिपोर्ट के मुताबिक 2018 और 2019 में, सिर्फ 29 प्रतिशत केस में लोगों को तोड़फोड़ के बाद पुनर्वास मिला, बाकि लोगों को अपने आप ही कोई रास्ता निकालना पड़ा. ज्यादातर लोग बेघर हो गए." रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान में 1.49 करोड़ लोग बेदखली और विस्थापन के बीच रह रहे हैं.

रिपोर्ट में संभावित विस्थापन के कारण "बुनियादी ढांचा परियोजनाएं, वन संरक्षण, जल निकायों की बहाली, 'अतिक्रमणों को हटाना', कोर्ट का आदेश लागू कराना और पर्यटन विकास" बताए गए हैं.

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