चीनी परियोजना में शामिल ना होकर भारत गलती कर रहा है? | दुनिया | DW | 15.05.2017
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

चीनी परियोजना में शामिल ना होकर भारत गलती कर रहा है?

चीन की महत्वाकांक्षी "वन बेल्ट वन वन रोड" परियोजना की पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है. इसका एक हिस्सा पाकिस्तानी कश्मीर से भी गुजरता है. आर्थिक मामलों के जानकार एमके वेणु इस पर भारत के रुख को विरोधाभासी मानते हैं.

वन बेल्ट वन रोड परियोजना के तहत बनने वाले चीन-पाकिस्तान कॉरिडोर का एक हिस्सा पाकिस्तानी कश्मीर से गुजरता है. भारत पाकिस्तानी कश्मीर पर अपना दावा जताता रहा है और इसलिए वह कॉरिडोर परियोजना को अपनी संप्रुभता का उल्लंघन बता रहा है. भारत का कहना है कि यह इलाका अनसुलझे कश्मीर मुद्दे का हिस्सा है, इसीलिए वहां से कॉरिडोर परियोजना को नहीं निकाला जा सकता.

इस कॉरिडोर के जरिए चीन के कशगर शहर को पाकिस्तान के बंदरगाह शहर ग्वादर से जोड़ा जाएगा. इसके तहत चीन ने पाकिस्तान में 50 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है जबकि पूरी वन बेल्ट वन रोड परियोजना को लगभग 900 अरब डॉलर की परियोजना बताया जा रहा है. इस परियोजना के तहत यूरोप और एशिया के देशों के बीच पाइपलाइनों, रेल और सड़कों का नेटवर्क तैयार किया जाएगा जिससे व्यापार और निवेश के नए अवसर पैदा होंगे.

ये भी पढ़ें: सिल्क रूट प्रोजेक्ट पर संदेह की हवा

भूटान को छोड़ कर भारत के सभी पड़ोसी देश इस परियोजना का हिस्सा हैं. बीजिंग में हुए वन बेल्ट वन रोड सम्मेलन में कम से कम 100 देशों के प्रतिनिधि पहुंचे, लेकिन भारत ने इसका बहिष्कार किया. भारत का इससे दूर रहना कितना वाजिब है? इसी मुद्दे पर हमने बात की आर्थिक मामलों के जानकार एमके वेणु से.

दुनिया के इतने सारे देश जब इस परियोजना में शामिल हो रहे हैं, तो क्या आपको लगता है कि भारत आर्थिक रूप से अलग थलग पड़ रहा है?

वन बेल्ट वन रोड कांफ्रेंस में न जाने का भारत का रुख थोड़ा सा विरोधाभासी है. विरोधाभासी इसलिए क्योंकि भारत तीन दिन पहले तक यह कहता रहा है कि हमें इस बात पर नाराजगी है कि इस परियोजना का एक हिस्सा पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से गुजरता है, जिसे सीपैक यानी चाइना-पाकिस्तान कॉरिडोर कहते हैं और जो ग्वादर पोर्ट तक जाता है. अगर आप तार्किक रूप से देखें तो तीन चार दशक पहले चीन ने इसी इलाके से होता हुआ काराकोरम हाइवे भी बनाया था. भारत को उस पर भी आपत्ति थी क्योंकि यह इलाका कश्मीर मसले के तहत विवादित है. इसके बावजूद भारत ने चीन से बहुत अच्छे संबंध बनाए रखे हैं.

आप देखें तो पिछले बीस साल में दोनों देशों के बीच 20 गुना व्यापार बढ़ा है. ऐसे में, फिर भारत सीपैक को लेकर अपनी आपत्ति जता रहा है. यह पूरा प्रोजेक्ट 900 अरब डॉलर का है जिसमें तीस चालीस देश शामिल हैं. इसमें यूरोप भी है, सेंट्रल एशिया भी और ईस्ट एशिया भी है. दक्षिण एशिया से श्रीलंका और नेपाल है. भूटान के अलावा सभी दक्षिण एशिया देश इसमें अपनी इच्छा से भाग ले रहे हैं. 

ऐसे में भारत को भी किसी हद इसमें शामिल होना चाहिए. साथ ही वह अपनी आपत्ति भी रखें कि यह विवादित इलाके से जा रहा है. कम से कम वह इतना तो कह ही सकता है कि विवाद सुलझने पर हम इसका हिस्सा बनेंगे. ब्रिक्स और कई एशियाई वित्तीय संस्थान हैं जहां भारत और चीन एक दूसरे के साझीदार हैं. तो इसका मतलब है कि आगे जाकर कुछ समाधान तो निकालना होगा. भारत बिल्कुल अलग अथग नहीं पड़ सकता.

तो क्या हम समझें कि भारत इसे अपने अहम का विषय बनाकर आर्थिक नुकसान उठाने की तरफ बढ़ रहा है?

अभी यह कहना मुश्किल है कि वन बेल्ट वन रूट को लेकर यह भारत का अंतिम रुख है. उसने सिर्फ अभी इस कांफ्रेस से दूरी बनाई है. लेकिन अगर सरकार आगे जाकर इसे अपने अहम का मुद्दा बनाती है तो आर्थिक तौर पर नुकसान होगा. दरअसल यह प्रोजेक्ट पूरे यूरोप और एशिया को एक नए नेटवर्क के जरिए जोड़ेगा जिसमें पाइपलाइन, रेलवे और सड़कें हैं. इससे निवेश और व्यापार में जबरदस्त इजाफा होगा. हम कह सकते हैं कि पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी से निपटने का यह एक बहुत अच्छा वित्तीय जरिया है. सारे देश इसमें शामिल हैं

.

इसलिए मेरे ख्याल से, यह कहना ठीक नहीं होगा कि यह सिर्फ चीन के प्रभुत्व वाला कोई प्रोजेक्ट है या फिर वह अपनी मनमानी चला रहा है. सभी देशों ने इसका समर्थन किया है. आप यह तो नहीं कह सकते हैं कि यह सारे देश चीन के प्रभुत्व में आगे बढ़ रहे हैं. यह साझेदारी है और 21वीं सदी में आप साझेदारी के जरिए ही आगे बढ़ सकते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार बार कहते रहे हैं कि 21वीं सदी एशिया की सदी है. उस लिहाज से आप भारत के रुख को कैसे देखते हैं?

मोदी ही नहीं, बल्कि पिछले 20-25 से भारत के सारे प्रधानमंत्री यही कहते आ रहे हैं कि यह सदी एशिया की सदी है. चाहे नरसिंह राव रहे हो, वाजपेयी या फिर मनमोहन सिंह. अगर यह एशिया की सदी है तो फिर यह प्रोजेक्ट एशियाई सदी को ठोस आकार देता है. जो आर्थिक ताकत एशिया की तरफ आ रही है, उसे यह और बढ़ावा देगा. भारत की बस यह आपत्ति है कि इसे एक कंसल्टेटिव फ्रेमवर्क में लाकर ठीक से लागू करना होगा. चीन ऐसा करेगा तो अच्छा होगा.

हमने देखा है कि पिछली सदी में दूसरे विश्व युद्ध के बाद जिस तरह मार्शल प्लान के तहत अमेरिका और यूरोप ने मिलकर बुनियादी ढांचा खड़ा किया, उसी मार्शल प्लान से इस परियोजना की तुलना हो रही है, हालांकि अब किसी तरह की लड़ाई नहीं हो रही है. लेकिन चीजें उतने ही बड़े स्तर पर तैयार करने की कोशिश है. हालांकि चीन अगर लोगों से सलाह मशविरा करके इसे आगे बढ़ाए तो और अच्छा हो सकता है, ताकि भारत को यह कहने का मौका न मिले कि चीन ने इसे अच्छी तरह लागू नहीं किया.

लेकिन अगर भारत के बिना भी परियोजना लागू हो जाएगी तो फिर चीन को उससे बात करने की जरूरत क्यों होगी? अभी इसका कोई हिस्सा भारत से गुजरता भी नहीं है. तो क्या चीन भारत की परवाह करेगा?

देखिए, चीन की बड़ी इच्छा रही है कि भारत इस परियोजना का हिस्सा बने, क्योंकि अगर आप सिल्क रोड को पुनर्जीवित करने की बात करेंगे, तो भारत उसका एक अटूट भाग है. इसके अलावा भारत एक बड़ा बाजार भी है. चीन अगर बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार में पोर्ट बनाये, पाइपलाइन लाये और सड़क बनाये और भारत उनका इस्तेमाल ना करे, तो यह एक अजीब सी स्थिति होगी. अगर भारत को इसके साथ नहीं जोड़ा गया तो एक अधूरा प्रोजेक्ट लगेगा.

जाहिर भारत के लिए कुछ समस्या अहम की है और कुछ मुद्दा संप्रभुता का भी है, जो मेरे हिसाब से जायज भी है. चीन को कम से कम भारत को कुछ तो आश्वासन देना ही चाहिए. मान लीजिए अगर कल को कश्मीर समस्या हल हो जाती है तो फिर चीन को भारत के साथ इस परियोजना पर फिर से बात करनी होगी.

क्या आपको ऐसा लगता है कि चीन के सिलसिले में भारत की मोदी सरकार हालात का ठीक से अंदाजा नहीं लगा पा रही है या फिर उन्हें समझ नहीं पा रही है?

मुझे लगता है कि चीन के सिलसिले में भारत को थोड़ी सी और लचक दिखानी चाहिए. हमें चीन को पाकिस्तान से थोड़ा सा अलग करके देखना चाहिए. मैं मानता हूं कि यह सरकार थोड़ी सी यह गलती कर रही है कि चीन और पाकिस्तान को एक ही चश्मे से देखा जा रहा है. अगर पिछले 20-25 साल को देखें तो हमारी विदेश नीति का मूल बिंदु यह रहा है कि हम पूरी दुनिया को पाकिस्तान से हटकर देखेंगे. चीन भी इसी में आता है. उसके साथ संबंध बढ़ाए गए हैं और इसी वजह से उसके साथ व्यापार इतना बढ़ा है. चीन पूरी दुनिया की मैन्युफैक्चरिंग हब है. इसलिए उसे अनदेखा तो कर नहीं सकते.

अभी जो सरकार में हर चीज को पाकिस्तान से जोड़कर देखा जा रहा है, उसे लेकर मुझे थोड़ी चिंता है. कश्मीर मुद्दे पर भी पिछले एक-डेढ़ साल में हालात बहुत खराब हुए हैं. यह मुद्दा घरेलू स्तर पर आक्रामक राष्ट्रवाद से भी जुड़ गया है. उससे समस्या हो रही है. उस समस्या में भी यह सरकार थोड़ी सी फंस रही है.

क्या आपके कहने मतलब यह है कि घरेलू राजनीतिक हितों को देखते हुए विदेश नीति से जुड़े हितों को दांव पर लगाया जा रहा है?

बिल्कुल. इस बात को कहने से मैं नहीं हिचकता कि पहली बार ऐसा हो रहा है कि हमारी विदेश नीति कुछ हद तक हमारी घरेलू राजनीति से संचालित हो रही है. घरेलू राजनीति से उसे तय किया जा रहा है. इसका खतरा यह है कि अगर घरेलू राजनीति को आपने बहुत उकसा लिया, तो फिर उससे पीछे हटना मुश्किल हो जाता है और इससे फिर विदेश नीति में भी असर होगा.

पिछले छह आठ महीने से मैंने देखा है कि भारत में चीनी सामान के खिलाफ संघ परिवार के कई संगठनों ने एक बड़ी मुहिम चलाई है. खास कर दीवाली के वक्त या उससे चार महीने पहले. इन्हें बाद में नियंत्रित नहीं कर सकते.

इंटरव्यू: अशोक कुमार

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन