1. कंटेंट पर जाएं
  2. मेन्यू पर जाएं
  3. डीडब्ल्यू की अन्य साइट देखें
इतिहासजर्मनी

नाजी जर्मनी के खिलाफ विद्रोह का हथियार कैसे बना ‘जैज’ संगीत

मेलिसा एस्कारिया पारा
२९ मई २०२६

जर्मनी में जैज संगीत लोगों के बीच काफी लोकप्रिय था, लेकिन नाजियों ने इसे ‘घटिया और भ्रष्ट कला’ करार दिया था. जब शासन ने लोगों के बोलने की आजादी पर पाबंदियां लगानी शुरू की, तो कुछ युवाओं ने जैज से ही इसके खिलाफ आवाज उठाई.

https://p.dw.com/p/5EWyS
वाइमर रिपब्लिक बर्लिन में 1928 में परफॉर्म करती जोसेफीन बेकर
नाजियों के सत्ता में आने से पहले जोसेफीन बेकर जर्मनी में एक प्रसिद्ध स्टार थींतस्वीर: TT/IMAGO

दो विश्व युद्धों के बीच वाले ‘वाइमर रिपब्लिक' के दौर को अक्सर जर्मनी में कला और रचनात्मकता का ‘स्वर्ण युग' कहा जाता है. यह एक ऐसा समय था जब भयानक आर्थिक मंदी और राजनीति में चरम ध्रुवीकरण के बावजूद, जर्मनी में अभूतपूर्व व क्रांतिकारी बदलाव हो रहे थे, चाहे वह ‘बाउहाउस' आर्किटेक्चर (इमारत बनाने की कला) हो, नए प्रयोगों वाले सिनेमा हों या फिर आधुनिक कला और रंगमंच हों, सब बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे थे.

बर्लिन जैसे बड़े शहर जो खुफिया बार, रंगारंग कैबरे और मौज-मस्ती से भरी नाइटलाइफ से गुलजार रहते थे, वहां संगीत का एक बिल्कुल नया अंदाज लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा. यह था ‘जैज' संगीत, जो अमेरिका के सुदूर दक्षिणी इलाकों के अफ्रीकी-अमेरिकी समुदायों से निकला था. प्रथम विश्व युद्ध के बाद अमेरिका, लंदन और पेरिस से आए नए प्रयोग करने वाले कुछ कलाकारों ने पहली बार इस संगीत से जर्मनी के लोगों को रूबरू कराया था.

जोसेफीन बेकर जर्मनी में एक बहुत बड़ी स्टार थीं और बाद में अमेरिका के नागरिक अधिकार आंदोलन में अपनी सक्रियता के लिए भी जानी गईं
जोसेफीन बेकर जर्मनी में एक बहुत बड़ी स्टार थीं और बाद में अमेरिका के नागरिक अधिकार आंदोलन में अपनी सक्रियता के लिए भी जानी गईंतस्वीर: Keystone Archives/HIP/picture-alliance

अमेरिका में जन्मीं डांसर, एक्ट्रेस और जैज कलाकार जोसेफिन बेकर ने 1920 के दशक में पेरिस में खूब नाम कमाया था. फिर साल 1926 में जब उन्होंने बर्लिन में ‘ब्लैक वीनस' के रूप में एक धमाकेदार शुरुआत की, तो वह जर्मनी में भी रातों-रात बहुत बड़ी स्टार बन गईं. इसके बाद 1930 का दशक आते-आते लुई आर्मस्ट्रांग और ड्यूक एलिंगटन जैसे दिग्गज जैज कलाकारों के रिकॉर्ड पूरे देश में सुने जाने लगे थे.

क्यों लगाई जैज संगीत बजाने प पूरी रोक

सन 1933 में जब नाजियों ने सत्ता पर कब्जा किया, तो जैज जैसे आधुनिक कला शैलियों पर भारी आफत आ गई. खुद को सबसे ऊपर मानने वाले नस्लवादी नाजी यह मानते थे कि जर्मन लोग एक सर्वश्रेष्ठ ‘आर्यन मास्टर रेस' (सर्वोच्च नस्ल) से ताल्लुक रखते हैं. इसलिए, वे पूरे जर्मन समाज को अपने सांचे में ढालना चाहते थे, जिसे वे ‘ग्लाइशशाल्टुंग' यानी पूरे समाज का एकीकरण या सिंक्रोनाइजेशन कहते थे.

इरावती कर्वे: वो भारतीय महिला, जिन्होंने नाजियों की रेस थिअरी को गलत साबित किया

यह पूरे समाज का ‘नाजीकरण' करने का तरीका था, जिसके तहत राजनीति और कानून से लेकर कला, संगीत और रोजमर्रा की आम जिंदगी, यानी हर एक चीज को पूरी तरह सरकार के कड़े नियंत्रण (तानाशाही व्यवस्था) के तहत ला दिया गया. इसके लिए, उन्होंने ‘राइष कल्चर चैंबर' बनाया, जिसने संगीत, कला, साहित्य, नाटक, रेडियो, फिल्म और अखबारों पर सरकारी पहरा लगा दिया. अब सिर्फ वही कलाकार काम कर सकते थे जो नाजी पार्टी से जुड़े संगठनों के सदस्य थे.

न्यूरेमबर्ग ट्रायल: नाजी युद्ध के अपराधियों पर कैसे चला मुकदमा?

साल 1937 और 1938 में, नाजियों ने ‘भ्रष्ट कला' और ‘भ्रष्ट संगीत' जैसे ठप्पे लगाने शुरू किए. इसका मकसद उन कलाकारों और उनकी कलाकृतियों को अपमानित करना और उन पर जुल्म ढाना था, जो नाजियों के हिसाब से कला और सुंदरता के पैमाने पर खरे नहीं उतरते थे या जो नाजियों की नस्लवादी सोच के खिलाफ थे. साल 1935 आते-आते जैज संगीत बजाने या उसका प्रसार करने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई. नाजियों ने इसे एक ‘घटिया' और निम्न दर्जे का संगीत बताया, क्योंकि इसकी जड़ें अश्वेत अमेरिकी संस्कृति से जुड़ी थीं. इसके अलावा, जैज संगीत को बढ़ावा देने वाले कई प्रमोटर और संगीतकार यहूदी थे. इसलिए, नाजियों ने इसके इतिहास को लेकर यहूदी-विरोधी और नस्लवादी अफवाहें फैलाईं. साथ ही, जैज को सीधे तौर पर यहूदी लोगों से जोड़कर बदनाम किया.

1938 की एक नाजी प्रदर्शनी के लिए बनाए गए एक प्रचार पोस्टर में डेविड का सितारा पहने एक जैज संगीतकार का नस्लवादी व्यंग्य चित्र दिखाया गया था
1938 की एक नाजी प्रदर्शनी के लिए बनाए गए एक प्रचार पोस्टर में डेविड का सितारा पहने एक जैज संगीतकार का नस्लवादी व्यंग्य चित्र दिखाया गया थातस्वीर: Fine Art Images/Heritage Images/IMAGO

आगे चलकर कई कलाकारों पर व्यक्तिगत रूप से पाबंदी लगा दी गई और यहां तक कि विदेशी रेडियो स्टेशन सुनने पर भी रोक लगा दी गई. इसके बावजूद, नाजियों ने जैज संगीत को कभी भी पूरी तरह से गैरकानूनी घोषित नहीं किया. लोगों के बीच इसकी जबरदस्त लोकप्रियता को देखते हुए, खुद नाजियों ने जैज का एक ऐसा ‘जर्मन रूप' तैयार करने की कोशिशें भी कीं, जो उनकी सोच के हिसाब से सही हो. यहीं से शुरुआत होती है ‘स्विंग यूथ' की, जो साल 1939 में जर्मनी के उत्तरी शहर हैम्बर्ग के अमीर परिवारों के किशोरों के बीच एक विद्रोही आंदोलन के रूप में उभरा. यह आंदोलन बहुत तेजी से बर्लिन जैसे दूसरे बड़े शहरों में भी फैल गया.

नाजी शासन में युवा: दमन से लेकर प्रतिरोध तक

जर्मनी के नौजवान 1920 के दशक से ही नाजी दुष्प्रचार के निशाने पर थे. फिर 1933 के बाद तो उनके लिए इस वैचारिक सोच से बच पाना नामुमकिन जैसा हो गया, क्योंकि युवाओं के संगठनों को नाजियों ने अपनी विचारधारा थोपने का सबसे बड़ा हथियार बना लिया था. लोगों के इकट्ठा होने और संगठन बनाने की आजादी छीनने और सभी आजाद युवा समूहों को खत्म करने के बाद, नाजी सरकार ने खुद लड़कों के लिए ‘हिटलर यूथ' और लड़कियों के लिए ‘लीग ऑफ जर्मन गर्ल्स' जैसे संगठन बनाए. इनका मकसद यह था कि जर्मन बच्चों को बचपन से ही इस तरह ढाला जाए कि वे बड़े होकर नाजी सोच वाले ‘जन-समुदाय' के वफादार और अनुशासित नागरिक बनें.

1930 से 1940 के बीच की न्यूरेनबेर्ग की इस तस्वीर में 'हिटलर यूथ' के साथ जुड़े युवाओं को देखा जा सकता है
1930 से 1940 के बीच की न्यूरेनबेर्ग की इस तस्वीर में 'हिटलर यूथ' के साथ जुड़े युवाओं को देखा जा सकता हैतस्वीर: United Archives/kpa Keystone/IMAGO

हालांकि, नाजी जर्मनी के सभी युवा इस शासन की विचारधारा के समर्थक नहीं थे और ‘स्विंग यूथ' के लिए जैज संगीत बगावत का एक बड़ा जरिया बन गया. इस समूह के लड़के-लड़कियों ने नाजी युवा संगठनों से खुद को अलग दिखाने के लिए अमेरिकी फैशन और नामों को अपनाना शुरू कर दिया. वे अपने बाल लंबे रखते थे और चेकदार जैकेट पहनकर ऐसे कैफे और क्लबों में मिलते थे जहां ‘स्विंग' (जैज संगीत का एक रूप) बजता था. यहां तक कि वे एक-दूसरे से मिलते वक्त ‘स्विंग हाइल!' कहते थे.

यह माना जाता है कि ‘स्विंग यूथ' शब्द की शुरुआत असल में उन नाजी अधिकारियों ने की थी जो इन युवाओं पर जुल्म ढाते थे. उन्होंने यह नाम उन लड़के-लड़कियों को बदनाम करने के लिए एक ‘ठप्पे' की तरह दिया था, जो मुख्य रूप से ‘स्विंग' संगीत पसंद करने की वजह से नाजी शासन और उनकी सोच से दूर रहते थे. फाउंडेशन फॉर रिमेंबरेंस, रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड फ्यूचर (ईवीजेड) की इतिहासकार माशा विल्के ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "वे युवा एक खास तरह की आजादी के लिए खड़े हुए थे. उन्होंने इस बात का खुलकर विरोध किया कि उन्हें भी बाकी सब लोगों की तरह एक ही सांचे में ढलना होगा या उनके जैसा बनना पड़ेगा.”

नाजियों ने तथाकथित ‘विकृत’ कला और संगीत के खिलाफ प्रदर्शनियां आयोजित कीं, जैसे कि 1938 में डुसेलडॉर्फ की यह प्रदर्शनी
नाजियों ने तथाकथित ‘विकृत’ कला और संगीत के खिलाफ प्रदर्शनियां आयोजित कीं, जैसे कि 1938 में डुसेलडॉर्फ की यह प्रदर्शनीतस्वीर: TT/IMAGO

'स्विंग यूथ' का विरोध

भले ही, नाजी विचारधारा के खिलाफ ‘स्विंग यूथ' का यह विरोध राजनैतिक होने के बजाय सांस्कृतिक ज्यादा था, फिर भी वे नाजी सरकार के दमन और जुल्म का शिकार बने. यहां तक कि नाजी खुफिया सुरक्षा एजेंसियां भी उन पर पैनी नजर रखती थीं. संगीत विशेषज्ञ राल्फ विलेट के मुताबिक, नाजियों ने इन युवाओं पर यह आरोप लगाया था कि वे ‘लोकतांत्रिक आजादी और अमेरिका जैसी खुली जीवनशैली चाह रहे हैं.'

इनमें से कई युवाओं को गिरफ्तार कर लिया गया और यहां तक कि उन्हें यातना शिविरों में भी भेज दिया गया. इतिहासकार माशा विल्के ने एक ऐसी ही घटना का जिक्र किया है, जहां कथित तौर पर कैंप के अंदर बंद कैदियों ने लुई आर्मस्ट्रांग का मशहूर गाना ‘जीपर्स क्रीपर्स' गाया और उस पर डांस भी किया. विल्के इस कदम को ‘बेहद बहादुरी भरा' मानती हैं.

8 मई 2026 को बर्लिन में स्विंग यूथ की स्मृति को 'लिबरेशन डांस' के माध्यम से  सम्मानित किया गया
8 मई 2026 को बर्लिन में स्विंग यूथ की स्मृति को 'लिबरेशन डांस' के माध्यम से सम्मानित किया गयातस्वीर: Melissa Escarria Parra/DW

8 मई, 2026 को हर उम्र के जैज और स्विंग संगीत के दीवाने बर्लिन के बेसेलपार्क में इकट्ठा हुए. वे वहां ‘मुक्ति दिवस' की 81वीं बरसी मनाने आए थे, जो नाजी सेना के बिना शर्त आत्मसमर्पण की याद में मनाया जाता है. इसके साथ ही, इस आयोजन का मकसद उन लोगों को सम्मान देना भी था, जिन्हें सिर्फ जैज और स्विंग संगीत से प्यार करने की वजह से नाजी शासन के जुल्म सहने पड़े थे.

ईवीजेड फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में आए मेहमानों को स्विंग डांस करने के लिए आमंत्रित किया गया था. जो लोग इस डांस में नए थे, उन्हें नाताली राइंष से सीखने का मौका भी मिला. नाताली एक इतिहासकार होने के साथ-साथ प्रोफेशनल स्विंग डांसर भी हैं. वे ‘ब्रेमेन अलायंस फॉर जर्मन-चेक कोऑपरेशन' के लिए काम करती हैं और उन्हें इस कार्यक्रम के लिए खास तौर पर ईवीजेड ने आमंत्रित किया था. राइंष ने कहा, "तानाशाही सरकारों ने हमेशा स्विंग और जैज जैसी कलाओं को दबाने की कोशिश की है, क्योंकि ये संगीत इंसान की आजाद सोच और उसकी खुद की अलग पहचान का प्रतीक हैं.”