बेहद लंबी दूरी की उड़ानों का शरीर और सेहत पर कैसा असर होता है | खबरें | DW | 15.05.2022

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खबरें

बेहद लंबी दूरी की उड़ानों का शरीर और सेहत पर कैसा असर होता है

क्वान्टस एयरलाइन ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका और यूरोप की बहुत ज्यादा लंबी अवधि वाली उड़ानें शुरू कर रही है.

लंबी यात्राओं में फिलहाल स्रोत और गंतव्य के बीच कम से कम एक स्टॉप तो होता ही है.

लंबी यात्राओं में फिलहाल स्रोत और गंतव्य के बीच कम से कम एक स्टॉप तो होता ही है.

कई लोगों को 13 घंटे की उड़ान लेना बहुत भारी लगता है. लेकिन कुछ विमान कंपनियां 20 घंटे या उससे ज्यादा की नॉन-स्टॉप यानी लगातार उड़ानों की तैयारी कर रही हैं, जो कहलाती हैं- अल्ट्रा-लॉन्ग हॉल फ्लाइट यानी बेहद लंबी निरंतर उड़ान.

ऑस्ट्रेलिया की विमान कंपनी कॉन्टस ने ऐसे विमानों को खरीदने का ऑर्डर दिया है जो सिडनी और मेलबॉर्न से न्यूयार्क और लंदन की नॉन-स्टॉप उड़ानें भरेंगे. कुछ लोग ये सोच सकते हैं कि निरंतर उड़ानें सुविधाजनक होती हैं. कुछ को लगेगा कि इतने घंटे बैठे रहने से तो तनाव के मारे माथा ही फट जाएगा. 

चढ़ने से लेकर उतरने तक, विमान का सफर खासा तनाव भरा हो सकता है- सही समय पर हवाई अड्डे पहुंचना, विशाल और अपरिचित टर्मिनलों के बीच अपना रास्ता ढूंढना, भाषा संबंधी परेशानियां, सुरक्षा जांच और फिर सैकड़ों अजनबियों के बीच विमान पर चढ़ना, और आखिर में इतने सारे घंटे उसमें बैठे रहना- लगता है कि बचाव का कोई रास्ता ही नहीं है.

आप सोच रहे होंगे कि उड़ान जितना लंबी खिंचेगी, उतना ही बुरी होगी. दरअसल, शरीर और दिमाग दोनों पर उड़ान का अलग-अलग असर पड़ता है. एक तरीके से आपकी शारीरिक और मानसिक सेहत का इम्तिहान है यह.

मानसिक सेहत पर प्रभाव

अगर आपको उड़ने से डर लगता है, जिसे एवियोफोबिया या एयरोफोबिया भी कहते हैं, तो विमान में आप  खासतौर पर परेशानी महसूस करेंगे.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर रिचर्ड मैकनैली के मुताबिक, आमतौर पर लोगों के दो समूह हैं जिन्हें उड़ान से डर लगता हैः पहले तो वे जिन्हें पहले से एगोराफोबिया है यानी भीड़ से डर लगता है और घबराहट होती है. दूसरा समूह उन लोगों का है जिन्हें डर लगा रहता है कि विमान दुर्घटनाग्रस्त हो जाएगा.

प्रोफेसर मैककेली के मुताबिक, "पहले समूह के लोगों में आमतौर पर वैसी स्थितियों मे घबराहट की एक हिस्ट्री होती है जिनसे निकल पाना उन्हें असुविधाजनक या कठिन लगता है, जैसे कि सबवे, विमान या भीड़ भरी दुकानें. दूसरा समूह उन लोगों का है जो विमान दुर्घटनाओं को लेकर कई किस्म की गलत मान्यताओं से ग्रसित होते हैं."

लेकिन एक बार विमान में बैठने के बाद, उड़ान 13 घंटे की हो या 20 घंटे की, ये बात उतनी मायने नहीं रखती. मैककेली कहते हैं, "विमान में बैठने के बाद डर से पीड़ित लोगों की घबराहट या चिंता कम होने लगती है क्योंकि जिन चीजों का डर रहता है वे नहीं घटतीं. घबराहट का दौरा भी अपने आप में खतरनाक नहीं है और वो खुद-ब-खुद काफुर हो जाता है." वैसे इस तरह के मामलों के लिए थेरेपी और दवाएं भी हैं. आप डॉक्टर से सलाह ले सकते हैं.

लंबी यात्राओं में फिलहाल स्रोत और गंतव्य के बीच कम से कम एक स्टॉप तो होता ही है.

लंबी यात्राओं में फिलहाल स्रोत और गंतव्य के बीच कम से कम एक स्टॉप तो होता ही है.

शारीरिक सेहत पर असर

बेहद लंबी उड़ान हो या लंबी उड़ान, दोनों का एक बड़ा शारीरिक साइड अफेक्ट है- जेट लैग.

जेट लैग तब होता है जब व्यक्ति दो या उससे अधिक टाइम जोन को पार करता है. ये आपकी सिरकाडियन रिद्म यानी शरीर की आंतरिक घड़ी को गड़बड़ा देता है, नींद नहीं आती, याददाश्त में परेशानी और ध्यान भटकने जैसी समस्याएं होती हैं.

कोलोन के यूनिवर्सिटी अस्ताल में इमरजेंसी मेडिसन के प्रोफेसर और जर्मन सोसायटी फॉर एयरोस्पेस मेडिसन के उपाध्यक्ष, योखेन हिनकेलबाएन कहते हैं कि टाइम जोन के हर घंटे के अंतर को समान्य करने में एक दिन लग सकता है. यानी टाइम जोन में 7 घंटे का अंतर हो तो शरीर को तालमेल बिठाने में 7 दिन लग सकते हैं.

वापसी की उड़ान में ये स्थिति और बिगड़ सकती है. छोटी सी समयावधि में कई सारे टाइम जोन को पार करना होता है. हिनकेलबाइन कहते हैं कि तभी आपका जगने और सोने का समय चक्र "पूरी तरह गड़बड़ हो जाता है."

ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) की सिफारिश के मुताबिक, नये टाइम जोन में आते ही, जितना जल्दी संभव हो सके, आपको अपनी नींद का समय बदल लेना चाहिए और दिन के समय बाहर निकलना चाहिए क्योंकि स्वाभाविक या प्राकृतिक प्रकाश, उस जगह के लिहाज से ढलने में आपकी मदद करता है.

यात्री विमान की दो बड़ी निर्माता हैं- अमेरिकी कंपनी बोइंग और यूरोपीय (फ्रांस) कंपनी एयरबस.

यात्री विमान की दो बड़ी निर्माता हैं- अमेरिकी कंपनी बोइंग और यूरोपीय (फ्रांस) कंपनी एयरबस.

विमान में ऑक्सीजन की सप्लाई

विमान में ऑक्सीजन की मात्रा उतनी ही होती है जितनी जमीन पर. लेकिन जब आप ऊंचाई में उड़ान भर रहे होते हैं तो केबिन में वायु-दबाव का असर, खून में ऑक्सीजन के सोखे जाने पर पड़ता है. 

खून में ऑक्सीजन का लेवल 95-100 फीसदी होना चाहिए लेकिन हवा में ये गिर सकता है. अधिकांश स्वस्थ लोगों के लिए ये कोई समस्या नहीं है. लेकिन अगर आपको दमा या सीओपीडी यानी श्वास संबंधी तकलीफ है, तो इसका मतलब आप कमतर ब्लड ऑक्सीजन के साथ ही विमान पर चढ़ रहे होते हैं और उड़ान के दौरान वो लेवल और गिर जाता है.

हिनकेलबाइन कहते हैं, "सीओपीडी के मरीज का जमीन पर ब्लड ऑक्सीजन 92 परसेंट हो सकता है और विमान में वो 70 परसेंट तक गिर सकता है." ब्लड ऑक्सीजन में गिरावट से हाइपोएक्सेमिया हो सकता है. इससे सरदर्द हो सकता है, सांस लेने में मुश्किल आ सकती है, दिल की धड़कन बढ़ सकती है, खांसी हो सकती है, दिमाग चकरा सकता है और त्वचा, नाखून और होंठ नीले पड़ सकते हैं.

एयर इंडिया नई उड़ान के लिए तैयार

उड़ान के दौरान व्यायाम

कॉन्टस का कहना है कि उसके नए बेहद लंबी उड़ान वाले विमानों में इकोनमी और प्रीमियम इकोनमी क्लासों में और चौड़ी-खुली सीटें होंगी. विमान के बीचोंबीच एक "वेलबींग जोन" भी होगा जहां लोग अपने पांव सीधे कर पाएंगे. खून के जमने या डीप वेन थ्रोम्बोसिस जैसी स्वास्थ्य समस्या से बचने के लिए मूवमेंट यानी हरकत में रहना जरूरी है. खून के थक्के तो अपने आप गायब हो जाते हैं लेकिन थक्के का कोई हिस्सा टूटकर फेफड़ों की ओर चला जाए तो वो खून का रास्ता रोक सकता है, इसे पल्मनरी एम्बोलिज्म कहते हैं जो जानलेवा भी हो सकता है.

अमेरिकी रोग नियंत्रण और बचाव केंद्र (सीडीसी) का कहना है कि व्यक्ति जितनी देर स्थिर और गतिहीन रहेगा, उतना ही ज्यादा खतरा, खून के जमने और डीप वेन थ्रोम्बोसिस का होगा. सीडीसी के मुताबिक, उम्र के साथ ये खतरा बढ़ता जाता है- जैसे कि 40 साल के ऊपर. दूसरे खतरे भी होते हैं जैसे कि मोटापा, ताजा सर्जरी या चोट, एस्ट्रोजन वाली गर्भ निरोधक गोलियां, हॉर्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी, गर्भावस्था या बच्चे का जन्म, कैंसर या उसका ताजा इलाज, और नसों में सूजन.

उड़ान में स्वस्थ कैसे रहें

एयरोस्पेस मेडिसन एक्सपर्ट योखेन हिनकेलबाएन उड़ान के दौरान स्वस्थ रहने के लिए कुछ बुनियादी बातें बताते हैं. पहले, अगर आपको पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या है तो आपको उड़ान से पहले अपने डॉक्टर से बात करनी चाहिए और रोजमर्रा की दवा लेने के बारे में एक योजना बनानी चाहिए. टाइम जोन बदलने से सामान्य रूटीन गड़बड़ा सकता है. इसलिए जिस शहर से आप निकल रहे हैं, उसके समय के बारे में पता रहना जरूरी है.

दूसरी बात, हर दो घंटे बाद फ्लाइट में जरूर उठना चाहिए. साथ ही, हर घंटे करीब 100 मिलीलीटर पानी पीना ही चाहिए. उससे आप हाइड्रेट रहेंगे यानी आपके शरीर में पानी बना रहेगा और आप उठकर टॉयलेट भी जाएंगे.

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