जलवायु परिवर्तन से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रहीं | दुनिया | DW | 22.10.2021
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दुनिया

जलवायु परिवर्तन से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रहीं

ऐसे समय में जब विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों की लगातार चेतावनी दे रहे हैं, एक अंतरराष्ट्रीय शोध में पाया गया है कि ग्लोबल वार्मिंग दुनिया की स्वास्थ्य समस्याओं को बदतर बना रही है.

विज्ञान पत्रिका लांसेट की वार्षिक रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप 44 स्वास्थ्य समस्याओं को सूचीबद्ध किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन की वजह से स्वास्थ्य समस्याएं गंभीर होती जा रही हैं. रिपोर्ट में 44 वार्षिक स्वास्थ्य मुद्दों को जलवायु परिवर्तन से जोड़ा गया है, जिसमें गर्मी से संबंधित मौतें, संक्रामक रोग और भूख शामिल हैं.

लांसेट काउंटडाउन प्रोजेक्ट की शोध निदेशक और बायोकेमिस्ट मरीना रोमानिलो ने कहा, "इनमें से हर एक बीमारी बदतर होती जा रही है."

रिपोर्ट की सह-लेखक और वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में पर्यावरणीय स्वास्थ्य की प्रोफेसर क्रिस्टी एबी कहती हैं, "ये सभी बढ़ते तापमान के कारण हो रहे हैं."

कोड रेड

द लांसेट ने दो रिपोर्ट जारी की हैं. एक दुनिया के लिए है और दूसरा केवल संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए है. स्वस्थ भविष्य के लिए कोड रेड के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग के जोखिम वाले वृद्ध और युवा लोग पिछले वर्ष की तुलना में अधिक खतरनाक तापमान के संपर्क में हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि 1986 और 2005 की तुलना में पिछले साल 65 वर्ष से अधिक आयु के तीन अरब से अधिक लोगों को अत्यधिक गर्मी का सामना करना पड़ा.

उनमें से ज्यादातर उन जगहों पर रहते थे जहां पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बीमारियां फैल सकती थीं. पिछले एक दशक में प्रशांत महासागर के बाल्टिक, उत्तरपूर्वी और उत्तर-पश्चिमी तटीय क्षेत्र विब्रियो बैक्टीरिया के लिए गर्म हो गए हैं. जहां उनकी संख्या में वृद्धि हुई है.

कुछ गरीब देशों में मच्छर जनित मलेरिया के मौसम की अवधि 1950 के दशक की तुलना में अधिक लंबी है.

गंभीर मुद्दा

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में ट्रॉपिकल मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ मिशेल बेरी ने कहा कि रिपोर्ट को "कोड रेड" कहना पर्याप्त नहीं है. उन्होंने कहा, "इस नई रिपोर्ट के नतीजे पिछली लांसेट रिपोर्ट की तुलना में एक गंभीर और संवेदनशील मुद्दा है. यह दुखद है कि हम गलत दिशा में जा रहे हैं."

वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में पर्यावरणीय स्वास्थ्य और आपातकालीन चिकित्सा के प्रोफेसर और अध्ययन में शामिल डॉ. जेरेमी हसी ने कहा कि उन्होंने गर्मियों में सिएटल में आपातकाल में काम करते हुए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखा. वे बताते हैं, "मैंने पैरामेडिक्स को देखा जो फ्लू के रोगियों की देखभाल खुद करते थे. मैंने कई रोगियों को हीटस्ट्रोक से मरते हुए भी देखा है."

बॉस्टन विश्वविद्यालय के एक अन्य डॉक्टर ने कहा कि शोध अब उन चीजों की पुष्टि कर रहा है जो वह वर्षों से देखी जा रही थीं, जैसे कि एलर्जी के कारण अस्थमा के मामलों की बढ़ती संख्या.

रिपोर्ट के सह-लेखक डॉ. रेनी सालास कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन स्वास्थ्य संकट का नंबर एक कारण है.

जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के डीन डॉ. लिन गोल्डमैन का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली स्वास्थ्य समस्याएं "कुछ साल पहले की तुलना में बहुत तेजी से बिगड़ रही हैं."

रिपोर्ट में कहा गया है कि 84 में से 65 देश जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल पर सब्सिडी दे रहे हैं जिससे जलवायु परिवर्तन होता है.

पर्यावरणविद डॉ. रिचर्ड जैक्सन कहते हैं, "इसका एक उदाहरण है जब एक व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार रोगी की देखभाल के नाम पर सिगरेट और जंक फूड दे रहा हो."

एए/सीके (एपी)

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