जर्मनी में धुर दक्षिणपंथ का विरोध कर रहे संस्थानों का भविष्य अनिश्चित क्यों | दुनिया | DW | 14.10.2019
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दुनिया

जर्मनी में धुर दक्षिणपंथ का विरोध कर रहे संस्थानों का भविष्य अनिश्चित क्यों

जर्मनी में यहूदी विरोधी मानसिकता और धुर दक्षिणपंथ को दूर करने के लिए काम कर रहे संस्थान अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं. इन संस्थानों को सरकार से लंबे समय की वित्तीय मदद नहीं मिल पा रही है.

जर्मनी में धुर दक्षिणपंथी और नव नाजी लोगों को मुख्यधारा में वापस लाने के लिए एग्जिट नाम से एक संस्थान चलाया जा रहा है. ये संस्थान पिछले 20 साल से चल रहा है. लेकिन फिलहाल इस प्रोजेक्ट का भविष्य में अधर में लटक गया है. ये तय नहीं है कि 2020 में इस प्रोजेक्ट को चलाए रखने के लिए जरूरी ढाई लाख यूरो, यानी करीब दो करोड़ रुपये की राशि सरकार से मिलेगी या नहीं. यह खबर उन लोगों के लिए बड़ा झटका है जिन्हें इस स्कीम का फायदा मिला है. इस संस्थान के संस्थापक बैर्न्ड वांगर का कहना है, "हमें कई नियो नाजी लोग धमकियां देते हैं. जान से मारने तक की धमकी दी जाती है. लेकिन कई नियो नाजियों को हम सही रास्ते पर लाए हैं. ऐसे में इस प्रोजेक्ट को चलाए रखना जरूरी है और इसके लिए मदद मिलनी चाहिए."

छह साल पहले जर्मन सरकार ने वादा किया था कि एग्जिट संस्थान को चलाए रखने के लिए लंबे समय तक पैसा दिया जाता रहेगा. लेकिन वांगर का कहना है कि ऐसी अब तक कोई मदद नहीं आई है. वांगर कहते हैं कि इसी वजह से उन्होंने पिछली और अभी की सरकार को गंभीरता से लेना छोड़ दिया है. कट्टरपंथ से लड़ने के लिए बनाई गई "लिव डेमोक्रेसी" स्कीम के तहत यह संस्थान चलाया जा रहा है. इस स्कीम के लिए सरकार पैसा देती है. लेकिन सरकार ने फिलहाल अपने बजट में 80 लाख यूरो यानी करीब 64 करोड़ रुपये की कटौती का एलान किया था. हालांकि पिछले हफ्ते हाले में हुए यहूदी विरोधी हमले के बाद घोषणा की गई कि इस बजट में कटौती नहीं होगी. जर्मनी के परिवार कल्याण मंत्रालय ने कहा कि "लिव डेमोक्रेसी" के बजट में कोई कमी नहीं की जाएगी और इसे 2019 के बराबर 115 मिलियन यूरो यानी करीब 900 करोड़ रुपये मिलता रहेगा. मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा, "इस अतिरिक्त खर्च की जरूरत आज की समस्याओं का सामना करने और इस क्षेत्र में काम कर रहे संस्थानों की मदद करने के लिए है."

Deutschland Karlsruhe | Attentäter von Anschlag auf Synagoge in Halle (Reuters/R. Orlowski)

हाले में हमले के बाद जांच करती पुलिस.

संस्थानों को भविष्य की चिंता

इस फैसले के बावजूद इस क्षेत्र में काम कर रहे कई संस्थान अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं. जर्मन सरकार ऐसे संस्थानों को तीन से पांच साल तक आर्थिक मदद देती है. इस समय सीमा के पूरा होने के बाद इन संस्थानों को फिर से मदद के लिए आवेदन देना होता है. जर्मन सरकार के पास इन संस्थानों को लंबे समय तक मदद पहुंचाने का तरीका नहीं है. जो संस्थान सरकार से आर्थिक मदद पाते हैं, उन्हें हर साल इस मदद के लिए आवेदन करना होता है. शो योर फेस नाम से संस्थान चलाने वाली सोफिया ओपरमान कहती हैं, "इस प्रक्रिया के चलते लंबे समय की परियोजनाएं नहीं बनाई जा सकती हैं. इस प्रोजेक्ट के तरीके से लगता है कि जर्मन नेता खुद ही अपने लक्ष्यों को खत्म करने का काम कर रहे हैं." उनकी संस्था यहूदी विरोधी हमलों और दक्षिणपंथी चरमपंथ को रोकने का काम कर रही है.

सोफिया के संस्थान के पास 2020 में बिना किसी मदद के अपने संस्थान को चलाए रखने के लायक फंड नहीं है. उन्होंने सरकारी फंडिंग के लिए तीन आवेदन किए हैं. इनमें से दो खारिज हो चुके हैं. अब वो दिसंबर में फंडिंग पाने के लिए फिर से तीसरा आवेदन दाखिल करेंगी. सोफिया कहती हैं, "हमें नहीं पता कि हमें फंडिंग मिलेगी या नहीं. इसलिए संस्थान के कर्मचारियों को नहीं पता कि जनवरी 2020 में उनके पास नौकरी होगी या नहीं. इसी वजह से वो दूसरी जगहों पर नौकरी देखना शुरू कर देते हैं. यही कारण है कि हमारे पास से इस काम में माहिर विशेषज्ञ चले जाते हैं."

Nach Angriff in Halle/Saale - Gedenken (picture alliance/dpa/H. Schmidt)

हाले हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजली देते लोग.

हाले हमला सिर्फ एक चेतावनी नहीं

लाल फीताशाही के चलते लंबे समय की योजनाएं ना बना पाने से इन संस्थानों को बड़ी मुश्किलें होती हैं. इसलिए ये संस्थान अब सरकार से गंभीरता से कुछ करने की मांग कर रही हैं. हाले में हुए यहूदी विरोधी हमले को सीडीयू पार्टी की नेता आनेग्रेट क्रांप-कारेनबावर ने चेतावनी बताया था. लेकिन मोबाइल काउंसलिंग सर्विस अगेंस्ट फार राइट एक्सट्रीज्म की  हाइको क्लारे का कहना है, "स्वास्तिक के चित्र बनाना और कब्रों को नुकसान पहुंचाना चेतावनी के निशान हैं. हाले में हुआ हमला एक त्रासदी है जो हमारी वजह से हुई है."

जर्मनी के गृह मंत्रालय के मुताबिक पिछले चार सालों में यहूदी विरोधी हमलों में वृद्धि हुई है. 2015 में 1,366 यहूदी विरोधी हमले हुए वहीं 2018 में यह संख्या 1,799 तक पहुंच गई. इसका मतलब हर दिन करीब पांच हमले हुए. एग्जिट संस्था के वांगर कहते हैं कि आजकल यहूदी विरोधी कॉन्सिपरेसी थ्योरीज भी बहुत चल रही हैं. इनमें यहूदियों द्वारा दुनिया पर कब्जा कर लेने वाला झूठ भी शामिल है. वांगर का कहना है कि यह थ्योरी धीरे धीरे दक्षिणपंथी लोगों के बीच फैल रही है.

संस्थानों को लंबे समय की मदद चाहिए

हाइको क्लारे का कहना है कि ऐसे अपराधों को रोकने के लिए सरकार को एक ठोस नीति बनानी चाहिए और लोकतंत्र को मजबूत करना चाहिए. साथ ही इस क्षेत्र में काम कर रहे संस्थानों की मदद करनी चाहिए. उनका कहना है कि ऐसे नियम बनाए जाएं जिनसे इन संस्थानों को लंबे समय तक आर्थिक मदद दी जा सके. कुछ जर्मन सांसदों ने इसके लिए  एक कानून की जरूरत का समर्थन किया है.

Berlin Unteilbar-Demonstration (imago images/C. Ditsch)

बर्लिन में दक्षिणपंथी कट्टरपंथ के खिलाफ प्रदर्शन करते लोग.

ग्रीन पार्टी की क्लाउडिया रोथ का कहना है कि दक्षिणपंथी कट्टरपंथ और नस्लभेद से लड़ने वाले संस्थानों की मदद करनी होगी और अल्पसंख्यकों की सहायता करनी होगी. इसके लिए हमें एक कानून बनाना होगा. जर्मन सरकार में सहमेल कमिश्नर और सीडीयू के नेता अनेटे विडमन-माउत्स का कहना है, "हमें ये समझने के लिए कि जर्मनी में कट्टर दक्षिणपंथ की समस्या है और किस चीज के होने का इंतजार करना होगा. हमें ये महसूस करना चाहिए." जर्मनी की परिवार कल्याण मंत्री और एसपीडी की फ्रांसिस्का गिफाय ने कई बार ऐसे कानून की मांग की है. लेकिन सीडीयू ने अभी तक इअसे समर्थन नहीं दिया है. गिफाय अपनी राजनीतिक सहयोगी पार्टी से ऐसे कानून को पास करने की लगातार मांग कर रही हैं.

रिपोर्टः मिरयम बेनेके/आरएस

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