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ऐप से धन कमाने का चस्का

१० नवम्बर २०२१

भारत में निवेशकों की एक नई पीढ़ी तैयार हो चुकी है. ये युवा हैं. शेयर बाजार के बारे में यूट्यूब से सीखते हैं. और उनके पास ऐसी ऐप हैं जिनके जरिए दुनियाभर के शेयर बाजार तक उनकी पहुंच है.

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तस्वीर: picture alliance/dpa/N. Bo/Imaginechina

दिल्ली के ईशान श्रीवास्तव ने पिछले साल दिसंबर में ही ट्रेडिंग शुरू की. कॉलेज छात्र ईशान श्रीवास्तव कहते हैं, "सच कहूं तो कॉलेज की मुझे ज्यादा परवाह नहीं है. जो है सो है बाजार, बाजार और बस बाजार.”

श्रीवास्तव कई भारतीय ट्रेडिंग ऐप प्रयोग करते हैं जैसे जीरोधा और अपस्टॉक्स. फाइनेंस के बारे में सलाह के लिए वो यूट्यूब के वीडियो देखते हैं. 20 साल के इस छात्र को उम्मीद है कि वह एक बढ़िया पोर्टफोलियो तैयार करेंगे और 45 की उम्र में रिटायर हो जाएंगे.

फ्रैंकफर्ट: यूरोप का डाटा कैपिटल

जैसे अमेरिकी इन्वेस्टमेंट ऐप रॉबिनहुड ने पश्चिमी देशों में ग्राहक कमाए ही हैं, वैसे ही नाइजीरिया से लेकर भारत तक कई देशों के लोग भी ऐप्स के दम पर शेयर बाजार में निवेश कर रहे हैं.

खासतौर पर भारत में निवेशकों की इस बाढ़ के पीछे डिमैट खातों का बड़ा हाथ है. आसानी से खुल जाने वाले इन खातों ने बहुत से लोगों की पहुंच शेयर बाजार तक बढ़ा दी है. लेकिन ऐप के जरिए ट्रेडिंग ने भी कम क्रांति नहीं की है. और ऐसा सिर्फ भारत में नहीं, आठ हजार किलोमीटर दूर नाइजीरिया में भी हो रहा है.

नाइजीरिया की आर्थिक राजधानी लागोस को यूं तो जश्न मनाने वाले लोगों का शहर कहा जाता है लेकिन देश की कमजोर होती मुद्रा ने युवाओं पर आर्थिक बोझ बढ़ाया है. महंगाई बढ़ गई है और जीवन मुश्किल हुआ है. इसी दौरान देश में घरेलू इन्वेस्टमेंट ऐप का बोलबाला बढ़ा है. ट्रोव और राइजवेस्ट जैसी ऐप के जरिए युवा अमेरिकी शेयर बाजारों में इन्वेस्ट कर रहे हैं.

दुनियाभर में दीवानापन

23 साल के दाहूंसी ओएडेले बताते हैं, "मेरे पास दो विकल्प थे. या तो अपना पैसा बैंक में रखूं. लेकिन उसमें कुछ आकर्षण था नहीं. कई बार मैं अपना पैसा राइजवेस्ट में लगाता हूं और हफ्तेभर में रिटर्न मिल जाता है. थोड़ा है लेकिन मेरे लिए बहुत होता है.”

महामारी के कारण टेक पत्रकार ओएडेले की नौकरी चली गई थी. उन्होंने क्रिप्टोकरंसी में ट्रेड करके अपना किराया कमाया. और ऐसा करने वाले वह अकेले नहीं हैं. नौकरी जाने, घर पर रहने और कुछ किस्मतवालों के लिए बचा हुआ पैसा मिलकर ऐसे हालात बना गया कि महामारी के दौरान बहुत से लोगों ने पहली बार ट्रेडिंग में हाथ आजमाया.

अमेरिका में ही इस साल की पहली छमाही में एक करोड़ से ज्यादा नए निवेशक बाजार में आए हैं. कुछ लोग तो सोशल मीडिया पर क्रिप्टो और ट्रेडिंग के बारे में बातें पढ़ पढ़कर ही प्रेरित हुए हैं. अमेरिका में ही नहीं, दुनियाभर में आए ये नए निवेशक बड़ी संख्या में युवा हैं. रॉबिनहुड के अमेरिकी ग्राहकों की औसत उम्र 31 है. भारत के अपस्टॉक्स में 80 प्रतिशत ग्राहक 35 साल से कम उम्र हैं. यही स्थिति नाइजीरिया की बैम्बू ऐप की है जिसके 83 फीसदी ग्राहक 35 से कम आयु के हैं.

आप अपना पासवर्ड कहां रखते हैं?

इसमें बड़ा योगदान ऐप का है जिन्होंने कम पैसा लगाने की सुविधा देकर युवाओं के लिए रास्ते खोल दिए हैं. वहां फ्रैक्शनल ट्रेड जैसे ऑफर हैं. मसलन अमेजॉन का एक शेयर मान लीजिए अभी 3,500 डॉलर का है जो युवा लोग खरीद नहीं सकते. लेकिन वे इस शेयर का छोटा सा हिस्सा खरीद सकते हैं, वो भी जीरो कमीशन देकर.

हाथ भी जलते हैं

लेकिन नोटों की तरह ऐप की तस्वीर का रंग सिर्फ हरा नहीं है. आलोचक कहते हैं कि इनके कारण अनुभवहीन निवेशकों को नुकसान होने की संभावना भी बहुत ज्यादा बढ़ गई है. अमेरिका में तो शेयर बाजार नियामक सिक्यॉरिटी एक्सचेंज कमीशन इस बात की जांच भी कर रहा है कि कहीं ये ऐप ईमेल और नोटीफिकेशन भेज-भेज कर लोगों को गैरजिम्मेदाराना तरीके से जरूरत से ज्यादा ट्रेडिंग के लिए तो नहीं उकसा रहे.

ब्रिटेन की फाइनेंशन कॉन्‍डक्ट अथॉरिटी ने मार्च में चेतावनी दी थी कि युवा, महिला और अल्पसंख्यकों के ऐप से पैसा खोने की संभावना ज्यादा होती है. अथॉरिटी ने एक सर्वे किया था, जिसमें दो तिहाई निवेशकों ने बताया कि अगर उन्हें बड़ा घाटा हुआ तो उनकी जिंदगी और भविष्य दोनों प्रभावित होंगे.

यूजर डाटा का बड़ा कारोबार

अथॉरिटी ने कहा, "निवेशकों का यह नया समूह समकालीन मीडिया जैसे यूट्यूब सोशल मीडिया आदि पर ज्यादा निर्भर है. ऐसा निवेश ऐप से मिली सुविधाओं के चलते हुआ दिखता है.”

बहुत से युवा निवेशक तो हाथ जला भी चुके हैं. मुंबई में रहने वाले प्रॉडक्ट डिजाइनर अली अतरवाला क्रिप्टोकरंसी में हुए खराब अनुभव के बाद ट्रेडिंग से दूरी बरत रहे हैं. 30 साल के अतरवाला कहते हैं, "इन ऐप्स से क्रिप्टो जैसी एसेट खरीदना आसान होता है लेकिन इनमें उतार चढ़ाव बहुत ज्यादा है. जब मैंने शुरुआत की तो अपनी आधी पूंजी गवां दी थी. उसे मैं नुकसान नहीं कहता, सीखने की फीस कहता हूं.”

वीके/सीके (एएफपी)

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