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महामारी, बेरोजगारी से जूझते पर्यावरण शरणार्थी

५ अक्टूबर २०२१

कोरोना वायरस के प्रसार के कारण हजारों बांग्लादेशी श्रमिकों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा. वहीं देश में कई लोग कठोर मौसम का सामना कर रहे हैं, जो उनके लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है.

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तस्वीर: Fabeha Monir/DW

बांग्लादेश के लाखों श्रमिक विदेशों में रोजगार की तलाश में जाते हैं. पिछले साल कोरोना वायरस के फैलने से पहले तक उनमें से लगभग सात लाख लोग विदेश में थे. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कोरोना महामारी का गहरा असर पड़ा है. कई देशों की अर्थव्यवस्था का पहिया अभी भी धीमा है और इसे ठीक होने में कुछ और साल लगेंगे. दूसरी ओर हजारों बांग्लादेशी श्रमिक वर्तमान में बेरोजगार हैं. वे महामारी के साथ-साथ मौसम की मार का भी सामना कर रहे हैं.

दक्षिणी बांग्लादेश के तटीय दलदली इलाके के कस्बे गोरी खिली के रहने वाले बिलाल हुसैन और उनका परिवार इस समय कठोर मौसम और कोरोना महामारी से जूझ रहा है. बिलाल हुसैन जैसे कई लोग आर्थिक और सामाजिक संकट का सामना कर रहे हैं. बिलाल कहते हैं कि उन्होंने सुंदरबन के जंगलों को छोड़ दिया क्योंकि उनका क्षेत्र कमजोर पारिस्थितिक तंत्र और नकारात्मक जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुआ है.

इस दौरान उन्हें मलेशिया में नौकरी मिल गई और वे वहां चले गए, लेकिन कोरोना महामारी ने उनकी कंपनी को गहरे आर्थिक संकट में धकेल दिया. आखिरकार उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और इस साल मार्च में वे घर लौट आए. उनके घर लौटने पर तूफान ने उनका साहस और तोड़ दिया और परिवार में एक नया आर्थिक संकट शुरू हो गया. 

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जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक आर्थिक प्रभाव

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में स्थित एक थिंक टैंक ओवी बशी कर्मी उन्नयाय के संस्थापक शाकिर अल सलाम का कहना है कि पर्यावरण प्रवासियों की समस्याएं और गंभीर हो गई हैं क्योंकि उन्होंने बेदखली और फिर महामारी के कारण अपनी नौकरी खो दी है. इस्लाम के मुताबिक, "बाद में आए तूफान और बाढ़ ने उनके जीवन को दयनीय बना दिया है और कुल मिलाकर उनकी चिंताएं दोगुनी या चौगुनी हो गई हैं."

बांग्लादेश में सेंटर फॉर एडवांस स्टडीज के प्रमुख अतीक उर रहमान कहते हैं कि ऐसे संकटग्रस्त लोगों की समस्याओं की गहराई बहुत अधिक है. उनका कहना है कि पहले जलवायु परिवर्तन के कारण पलायन, फिर महामारी का संकट और अब बारिश और बाढ़ ने उन्हें गरीबी के दलदल में धकेल दिया है. अतीक उर रहमान के मुताबिक, "इन संकटग्रस्त लोगों के जीवन पर अधिक शोध करना और डेटा जमा करना बहुत महत्वपूर्ण हो गया है ताकि उनकी समस्याओं की गंभीरता को पर्याप्त रूप से कवर किया जा सके."

गंभीर होती स्थिति

गैर-लाभकारी अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समूह अमेरिकी भू-भौतिकीय संघ का अनुमान है कि जिस तरह से बांग्लादेश तूफान, बारिश और बाढ़ का सामना कर रहा है उस कारण 2050 तक 13 लाख लोग बेघर हो सकते हैं.

बांग्लादेश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा तटीय क्षेत्रों में रहता है और उनका अंतिम सहारा समुद्री क्षेत्रों से अन्य स्थानों पर स्थानांतरित करना है. अब तटीय क्षेत्रों से विस्थापित लोग बड़े शहरों की मलिन बस्ती में बस गए हैं क्योंकि वे बेरोजगारी और अच्छी आय की जटिल समस्याओं का सामना कर रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन से जुड़े शोधकर्ता तसनीम सिद्दीकी का कहना है कि तटीय क्षेत्रों में बेघरों की आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों को दूर करने के लिए सरकारी स्तर पर महत्वपूर्ण नवीन पहलों की जरूरत है और उनके जरिए से वित्तीय मामलों में सुधार किया जा सकता है.

एए/सीके (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

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