जलवायु परिवर्तन से जूझता बांग्लादेश का सुंदरबन | दुनिया | DW | 13.11.2017
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दुनिया

जलवायु परिवर्तन से जूझता बांग्लादेश का सुंदरबन

जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भारतीय सुंदरबन का जिक्र तो अक्सर होता है लेकिन बांग्लादेश में स्थित सुंदरबन की हालत पर खास चर्चा नहीं होती. हकीकत यह है कि वह इलाका भी ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की चपेट में है.

वहां कोयला आधारित बिजली संयंत्रों और जहाजों से तेल रिसने की घटनाओं ने इस विपदा को और बढ़ाया है. पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील इस इलाके में बीते तीन वर्षों के दौरान कोयले और दूसरे रसायनों से लदे तीन बड़े जहाज डूब चुके हैं. समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण इलाके की नदियों के पानी का खारापन भी बढ़ रहा है. नतीजतन आजीविका पर संकट गंभीर हो रहा है. जैविक विविधता से भरपूर सुंदरबन का छह हजार वर्ग किलोमीटर इलाका बांग्लादेश में है और चार हजार वर्ग किलोमीटर भारत में.

जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से जूझता बंगाल

बाघ के जबड़े में जाने को मजबूर सुंदरबन की विधवायें

ताप बिजली संयंत्र

बांग्लादेश के सुंदरबन इलाके में मैंग्रोव जंगलों से महज 14 किलोमीटर के दायरे में ताप बिजली संयंत्रों की स्थापना पर लंबे अरसे से विवाद चल रहा है. पर्यावरणविदों ने इन संयंत्रों और इनके लिए जहाज से कोयले की ढुलाई को इलाके के पर्वारण और सुंदरबन के पारिस्थितिकी संतुलन के लिए गंभीर खतरा करार दिया है. सुंदरबन से सटे इलाके में 1320 मेगावाट क्षमता वाले रामपाल ताप बिजली संयंत्र ने तमाम पर्यावरणविदों को गहरी चिंता में डाल दिया है. इस संयंत्र के लिए सालाना 47.2 लाख टन कोयले की जरूरत होगी. इस कोयले और संयंत्र के संचालन के लिए जरूरी रसायनों समेत तमाम वस्तुएं जल मार्ग से ही परियोजना स्थल पर पहुंचेंगी.

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मैनग्रोव खत्म तो जमीन खत्म

विशेषज्ञों का कहना है कि जलमार्ग से रोजाना लगभग 13 हजार टन कोयले की ढुलाई से रिसाव का भारी खतरा है. पर्यावरणविदों की यह चिंता जायज है. बीते कुछ वर्षों के दौरान जलमार्ग पर कई हादसे हो चुके हैं. वर्ष 2014 में साढ़े तीन लाख लीटर तेल के रिसाव ने संवेदनशील जंगल वाले इस इलाके पर दूरगामी असर डाला था. तब सुंदरबन इलाके के 359 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में तेल फैल गया था. हाल में नजदीकी पासूर नदी में एक हजार टन कोयले से लदी एक नाव भी डूब चुकी है. सबसे ताजा मामले में बीते साल 12 हजार टन कोयले से लदे एक जहाज के डूबने से पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ गयी है.

पर्यावरणविदों  का कहना है कि हो सकता है कि इन घटनाओं का तत्काल कोई असर महसूस नहीं हो, लेकिन आगे चल कर इनसे जंगल नष्ट होने की प्रक्रिया तेज होगी. सुंदरबन इलाके में कई नदियों और उनकी सहायक नदियों का जाल बिछा है. इन घटनाओं से इलाके के तेजी से घटते जंगल पर खतरा और बढ़ गया है. पर्यावरणविदों का कहना है कि सुंदरबन होकर गुजरने वाला जहाजों का रास्ता वैसे भी पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षित नहीं है.

वैसे, बीते साल जहाज डूबने की घटना के बाद बांग्लादेश सरकार ने मालवाहक जहाजों की आवाजाही पर पाबंदी लगा दी है. लेकिन पर्यावरणविदों को डर है कि व्यापारिक दबाव में यह पाबंदी शीघ्र हटा ली जाएगी. इससे पहले तेल से लदे जहाज के डूबने के बाद भी ऐसी ही पाबंदी लगायी गयी थी लेकिन उसे जल्दी ही हटा लिया गया था.

रामपाल संयंत्र को केंद्र में रख कर इलाके में कई सहायक उद्योगों की स्थापना भी होनी है. इनमें एक निजी कंपनी का 565 मेगावाट क्षमता वाला एक अन्य ताप बिजली संयंत्र भी शामिल है. यह जगह सुंदरबन से महज 12 किलोमीटर दूर है. दूसरी ओर, सरकार का दावा है कि रामपाल परियोजना से अगर सुंदरबन को कोई नुकान हुआ भी तो वह लगभग नगण्य होगा.

सुंदरबन इलाके में मैंग्रोव जंगल की अवैध कटाई भी बड़े पैमाने पर हो रही है. सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से सुंदरबन के पेड़ों को काट कर नावों के जरिए नजदीकी जिले में कुकुरमुत्ते की तरह उगी लकड़ी मिलों तक पहुंचाया जाता है. पर्यावरणविदों का कहना है कि मैंग्रोव जंगलों में तूफान जैसी प्राकृतिक आपदा के असर पर अंकुश लगाने की क्षमता होती है. लेकिन तेजी से कटते जंगलों ने देश में सुंदरबन को खतरे में डाल दिया है. इस साल अप्रैल से अगस्त के दौरान ही कोस्टगार्ड पश्चिमी जोन के अधिकारियों ने कोई पांच सौ घनमीटर लकड़ी जब्त की है. इससे यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि अधिकारियों की निगाहें बचा कर अवैध रूप से कितनी लकड़ी बाहर गयी होगी.

सुंदरबन की ओर सोलर पैनल

बदलेगी सुंदरबन की तस्वीर और तकदीर

मौसम विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि औसत तापमान में एक डिग्री की वृद्धि भी कई दुर्लभ वनस्पतियों का वजूद हमेशा के लिए मिटा सकती है. जलवायु परिवर्तन के असर के चलते बीते एक दशक के दौरान बांग्लादेश में चक्रवाती तूफानों के बीच का अंतराल घटा है. अब देश को साल में कई बार ऐसे तूफानों का समाना करना पड़ता है जिनमें जान-माल का भारी नुकसान होता है. लगभग हर साल आने वाले इन तूफानों के चलते सुंदरबन को जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई में कम से कम 40 साल लगेंगे.

बढ़ता खारापन

मौसम विज्ञानियों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण बांग्लादेश के तटवर्ती इलाकों की नदियों के पानी में खारेपन का स्तर हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है. इससे मीठे पानी की मछलियां नष्ट हो रही हैं. बांग्लादेश की ज्यादातर आबादी खेती और मछलियों पर निर्भर है. इन नदियों के खारे पानी से सिंचाई की स्थिति में खेतों की उर्वरता के भी कम होने का खतरा है. इससे लाखों लोगों की आजीविका संकट में है. समय के साथ इस खारेपन में और वृद्धि का अंदेशा है. विश्व बैंक की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि बदलते मौसम के साथ पानी और मिट्टी के बढ़ते खारेपन का सुंदरबन के नाजुक इको सिस्टम पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा और आसपास के इलाकों में रहने वाली गरीब आबादी भी इसकी चपेट में आ जाएगी. इसकी वजह से पीने के साफ पानी का संकट भी गहराएगा.

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बॉ़न में शुरू हुआ जलवाय सम्मेलन

विश्व बैंक के अलावा इंस्टीट्यूट ऑफ वाटर माडलिंग एंड वर्ल्ड फिश, बांग्लादेश की ओर से वर्ष 2012 से 2016 के बीच किए गये अध्ययन भी नदियों के पानी में बढ़ते खारेपन की पुष्टि करते हैं. खासकर बांग्लादेश के तटवर्ती इलाकों में जलवायु परिवर्तन का असर अब साफ नजर आने लगा है. जाने-माने पर्यावरणविद अबुल कलाम मोहम्मद इकबाल फारुक कहते हैं, "देश के जैविक संसाधनों और तटवर्ती इलाकों में जलवायु परिवर्तन के असर के बारे में विस्तृत अध्ययन जरूरी है. उसके आधार पर ही इससे निपटने के कारगर उपायों की रूपरेखा तय की जा सकती है."

वह कहते हैं कि ऐसे अध्ययन से खासकर सुंदरबन इलाके में डूब क्षेत्र में रहने वाले लोगों और पशुओं को समय रहते किसी ऊंचे स्थान पर शिफ्ट किया जा सकता है. विशेषज्ञों की राय में नदियों का खारापन बढ़ने से आने वाले कुछ वर्षों में लगभग एक करोड़ लोगों की जिंदगी और आजीविका गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है.

तत्काल ठोस उपाय जरूरी

देश के मौसम विज्ञानियों और पर्यावरणविदों में इस बात पर आम राय है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए तत्काल ठोस कदम उठाना जरूरी है. उनका कहना है कि वैश्विक उत्सर्जन न्यूनतम स्तर पर और ग्लोबल वार्मिंग 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे रहने पर ही बांग्लादेश के लोगों का वजूद निर्भर है. फिलहाल 83 लाख लोग तूफान के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील इलाकों में रहते हैं. लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग इसी दर से जारी रही तो वर्ष 2050 तक ऐसे लोगों की तादाद बढ़ कर 2.10 करोड़ तक पहुंच जाएगी. इसी तरह समुद्र का जलस्तर और 45 सेमी बढ़ने पर तीन-चौथाई मैंग्रोव जंगल पानी में समा जाएंगे.

विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने की दिशा में समय रहते ठोस कदम नहीं उठाये गये तो वर्ष 2050 तक डेढ़ करोड़ लोगों को विस्थापन का शिकार होना पड़ सकता है, यह मानवीय इतिहास में ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से होने वाला सबसे बड़ा विस्थापन होगा.

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