बनारस में बन रहा है उमराव जान का मकबरा | ताना बाना | DW | 11.01.2017
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ताना बाना

बनारस में बन रहा है उमराव जान का मकबरा

उमराव जान असल में थीं या बस किस्से-कहानियों में, पता नहीं. पर उनकी कब्र है जहां लोग आते हैं. अब एक मकबरा बन रहा है. एक कलाकार इस मकबरे पर काम कर रहा है.

दिल हजारों का तेरी भोली अदाएं लेंगी,

हसरतें चाहने वालों की बलाएं लेंगी

बताते हैं ये गजल उमराव जान ने नवाब बिरजिस कद्र की तख्तपोशी पर सुनाई थी. हालांकि इतिहासकारों में इस बात को लेकर विवाद है लेकिन उमराव जान अदा के किस्से आज भी लखनऊ की गलियों में मशहूर हैं.

उनके अस्तित्व पर सवाल भले उठते रहे हों लेकिन अब अपने चाहने वालो के लिए वाराणसी में उमराव जान की कब्र का जीर्णोधार हो रहा है. लगभग मिट चुकी उनकी कब्र को एक खूबसूरत मकबरे का रूप दिया जा रहा हैं. दो महीने के भीतर ही उमराव जान का मकबरा बन कर तैयार हो जाएगा.

उमराव जान एक तवायफ के रूप में मशहूर थीं. उस वक्त के नवाब, रजवाड़े और रईस उनकी महफिलों में आते थे. खुद भी वह एक उम्दा शायर थीं और उमराव जान अदा के नाम से लिखती थीं. कुछ इतिहासकार हालांकि उमराव जान को मात्र मिर्ज़ा हादी रुसवा के उपन्यास उमराव जान अदा (1900 में प्रकाशित) का एक किरदा

र मानते हैं लेकिन लखनऊ में आम लोग मानती हैं कि वह काल्पनिक किरदार नहीं थीं और चौक मोहल्ले में किसी गली में रहती थीं.

उमराव जान की कहानी पर कई फिल्में भी बनी हैं. पहली फिल्म 50 के दशक में मेहंदी नाम से आई थी. फिर पाकिस्तान में भी 60 के दशक में एक फिल्म उनपर बनी. मुजफ्फर अली ने 80 के दशक में मशहूर फिल्म 'उमराव जान' बनाई जिसमें रेखा मुख्य भूमिका में थीं. जेपी दत्ता ने भी उमराव जान की कहानी पर फिल्म का निर्माण किया.

वाराणसी के कलाकार अरुण सिंह जब भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का मकबरा बना रहे थे तो उन्हें पता चला कि पास में ही फातमान कब्रिस्तान में एक टूटी फूटी कब्र उमराव जान की है. वह बताते हैं, "मैंने वह कब्र जो साफ करवाई. बहुत खराब हालत में थी. सफाई और थोड़ी खुदाई पर लखौरी ईंट मिलीं और एक उर्दू का शिलालेख. जानकारों से पता किया तो पता चला कि यह कब्र उमराव जान की है जो अपने आखिर समय में बनारस में पत्थर वाली गली में रहती थीं."

अरुण जो लखनऊ से फाइन आर्ट्स में शिक्षित हैं इस बात पर उत्साहित हुए कि लखनऊ की कुछ विरासत उन्हें वाराणसी में भी मिल गई. उन्होंने उस कब्र का जीर्णोधार करने और एक खूबसूरत मकबरे की शक्ल देने की ठान ली. खर्चा लगभग डेढ़ लाख रुपये आना था. वाराणसी के मंडलायुक्त ने मदद की पेशकश भी की लेकिन अरुण ने अपने पास से सब कुछ करने का फैसला किया. इससे पहले भी अरुण बनारस के घाटों, रानी लक्ष्मीबाई का स्मारक और बहुत से चौराहे डिजायन कर चुके हैं. वह कहते हैं, "मेरे लिए ये काशी का एक नया सांस्कृतिक आयाम होगा. मेरा काम स्टोन आर्किटेक्चर पर हैं और मैं क्लासिकल टच के साथ काम करता हूं. यह प्रोजेक्ट मेरे दिल के काफी करीब है."

इसके लिए अरुण ने रिसर्च भी की. उन्होंने फैजाबाद में भी बात की क्योंकि बताते हैं कि उमराव जान वहीं पैदा हुई थीं और बाद में अपहरण करके उन्हें लखनऊ लाया गया जहां वह उमराव जान तवायफ बन कर मशहूर हुईं. लखनऊ और फैजाबाद में कोई उनकी कब्र की सूचना नहीं मिली. वाराणसी में आज भी उमराव जान की कब्र पर सालाना बरसी मनाई जाती है और 27-28 दिसम्बर को कुछ लोग वहां सफाई करवाते हैं.

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