यूएन की गुडविल एम्बैसडर बनी आईएस की सेक्स स्लेव | दुनिया | DW | 21.09.2016
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दुनिया

यूएन की गुडविल एम्बैसडर बनी आईएस की सेक्स स्लेव

इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों की हवस का शिकार बनी 23 साल की एक लड़की अब औरों को उम्मीद का रास्ता दिखाएगी. तीन महीने तक आईएस की सेक्स स्लेव रही नादिया मुराद बासी ताहा को यूएन ने अपना गुडविल एम्बैसडर बनाया है.

नादिया अब मानव तस्करी के प्रति लोगों को जागरूक बनाएंगी. लेकिन इराक के यजीदी समुदाय से संबंध रखने वाले नादिया के लिए सबसे बड़ी चिंता वो 3200 यजीदी महिलाएं हैं जो अब भी आईएस की कैद में है और उसके लड़ाकों की यौन दासियां हैं.

वह कहती हैं कि 2014 में यजीदी लोगों पर आईएस के हमले को एक जनसंहार माना चाहिए और इसके पीड़ितों को इंसाफ मिलना चाहिए. अगस्त 2014 में नादिया को सिंजार के नजदीक हमले के दौरान उनके गांव से उठा लिया गया था. वहां से नादिया को आईएस के नियंत्रण वाले मोसूल लाया गया जहां उनका कई बार सामूहिक बलात्कार हुआ और कई बार उन्हें बेचा गया.

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पिछले दिनों न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय में नादिया ने कहा, “मुझे उन लोगों ने जिस तरह चाहा, इस्तेमाल किया. मैं अकेली नहीं थी. पर शायद में भाग्यशाली थी. जैसे जैसे समय बीता मैं वहां से निकलने में कामयाब रही, लेकिन हजारों महिलाएं ऐसा नहीं कर पाईं हैं. वो अब भी उनकी है कैद में हैं. ”

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नादिया को उम्मीद है कि एक दिन आएगा जब पीड़ित यजीदी अपने ऊपर "जुल्म ढाने वाले लोगों को हेग की अंतरराष्ट्रीय अदालत में पेश होता देखेंगे और वो दुनिया को बताएंगे कि उन्होंने क्या किया, इससे हमारे समुदाय के जख्मों पर मरहम लगेगा." गुडविल एम्बैसडर के तौर पर नादिया मुराद इंसानी तस्करी के शिकार लोगों की और खास तौर से शरणार्थी महिलाओं और लड़कियों की पीड़ा के बारे में लोगों को जागरूक करेंगी.

तस्वीरों में: कौन हैं यजीदी

यजीदी लोग ना तो मुसलमान है और न ही अरब. सीरिया की सीमा के नजदीक उत्तरी इराक में रहने वाले ये लोग एक प्राचीन धर्म को मानते हैं और इनकी संख्या पांच लाख से ज्यादा है. कुर्द भाषा बोलने वाले लोग इस्लामिक स्टेट के निशाने पर रहे हैं. सीरिया के संयुक्त राष्ट्र के जांच आयुक्त ने कहा है कि उसके पास ऐसे सबूत हैं जिनसे पता चलता है कि इस्लामिक स्टेट यजीदी लोगों का संहार कर रहा है.

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दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक भाषण में नादिया मुराद ने बताया कि किस तरह एक आईएस लड़ाके से उनकी तथाकथित ‘शादी' हुई थी, जिसने उनका खूब उत्पीड़न किया. नादिया के मुताबिक, “मुझमें और बलात्कार और उत्पीड़न सहने की ताकत नहीं बची थी, इसलिए मैंने वहां से भागने का फैसला किया.” उन्होंने बताया कि जब वो मोसूल में भाग रही थीं तो उन्हें पता था कि कोई मदद करने वाला नहीं है, लेकिन फिर एक परिवार ने उन्हें अपने यहां आसरा दिया.

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वो बताती हैं कि इस परिवार ने उनके लिए एक ‘इस्लामिक पहचान पत्र' की व्यवस्था जिसके सहारे वो सीमा पार इराकी कुर्दिस्तान में चली गईं. वहां विस्थापित लोगों के एक कैंप में रहने के बाद वो अपनी बहन के पास जर्मनी आ गईं. अब नादिया मुराद उन 376 लोगों और संगठनों की सूची में शामिल हैं जिन्हें इस साल शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया है.

एके/वीके (एएफपी)

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