कैसे भुला दी गई अफ्रीकी लोगों की गुलामी की दास्तां | दुनिया | DW | 23.08.2019
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दुनिया

कैसे भुला दी गई अफ्रीकी लोगों की गुलामी की दास्तां

अफ्रीका के लोगों को गुलाम बनाकर दूसरे देशों में ले जाने के बारे में आम धारणा है कि पश्चिमी देशों के लोगों ने अफ्रीकी लोगों ने गुलाम बनाया लेकिन अरब देशों के मुस्लिमों ने पूर्वी अफ्रीका के लाखों लोगों को गुलाम बनाया था.

जंजीबार को आजकल पूर्वी अफ्रीका की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक माना जाता है. सफेद बालू के समुद्री किनारे, एक दम साफ पानी और छुट्टियों को यादगार बनाने के लिए बने शानदार होटल इस जगह की खासियत बन चुके हैं. लेकिन यह जगह इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है. तंजानिया का यह अर्द्धस्वायत्त इलाका 200 साल पहले पूर्वी अफ्रीका में 'इंसानी गुलामों' की सौदेबाजी का केंद्र हुआ करता था. यह जगह हाथीदांत और लौंग के व्यापार की प्रसद्धि के साथ-साथ हजारों लोगों को गुलाम बनाकर उनका व्यापार करने के लिए बदनाम भी थी.

पूर्वी यूरोप से उत्तरी अफ्रीका तक

अफ्रीकी लोगों को दास बनाकर उनका व्यापार करना पुराने जमाने से चला आ रहा है. 17वीं शताब्दी में यह चलन तेजी से फैला जब उत्तरी अफ्रीका में इस्लाम का विस्तार हुआ. हालांकि यह यूरोपीय लोगों के अफ्रीका पहुंचने के सात सदी बाद हुआ. और इससे एक हजार साल पहले से ही पश्चिमी अफ्रीकी लोगों को अटलांटिक से अमेरिका तक बेचा जा रहा था. उत्तरी और पूर्वी अफ्रीका से अरब लोग अफ्रीकियों को मिडिल ईस्ट के देशों के लिए बेच देते थे. ये दास बने अफ्रीकी वहां मजदूर, शिक्षक और सुरक्षाकर्मी का काम करते थे. इन मजदूरों को काम करने से पहले बांझ बना दिया जाता था. इस्लामिक विचारधारा के मुताबिक मुस्लिमों को दास नहीं बनाया जा सकता. इनमें अफ्रीकी मुस्लिम को भी दास ना बनाना शामिल था.

Sklaverei (picture-alliance/dpa/M. Moxter)

जंजीबार.

'सेनेगलीज' किताब के लेखक टिडियाने एन'दिआए कहते हैं, "अरब मुस्लिम पूर्वी और मध्य यूरोप से गोरे लोगों को दास बनाकर अरब देशों में बेच देते थे. लेकिन यूरोप की सेनाएं जैसे-जैसे मजबूत हुईं, वैसे-वैसे यूरोप में मुस्लिमों का आना जाना कम हो गया. ऐसे में वहां पर गुलामों की कमी हो गई. ऐसे में अरब लोगों ने अफ्रीका से गुलाम लेकर आना शुरू कर दिया."

गुलामी की जड़ भी अफ्रीका में

एन'दिआए के मुताबिक दासप्रथा सभी सभ्यताओं में किसी ना किसी तरह से चलती आई है. अफ्रीका में बाहरी लोगों के आने से पहले भी वहां दासप्रथा चल रही थी. मध्य पूर्व अफ्रीका में याओ, मकुआ और मरावा जैसे समुदाय आपस में लड़ते रहते थे. लड़ाई में जीतने वाला समुदाय हारने वाले समुदाय के लोगों को अपना गुलाम बना लेता था. इन गुलामों का व्यापार भी किया जाता था. नदिए कहते हैं, "अरब मुस्लिमों ने अफ्रीका में चली आ रही दास प्रथा को ही आगे बढ़ाया था. वो अपनी जरूरत के मुताबिक अफ्रीकी गुलामों की खरोद फरोख्त किया करते थे."

स्वीडन की उप्पासला यूनिवर्सिटी में स्वाहिली और अफ्रीकी भाषाओं के प्रोफेसर अब्दुलाजीजी लोधी का मानना है कि दासप्रथा तो अलग-अलग अफ्रीकी संस्कृतियों का हिस्सा रही है. उनके मुताबिक," अगर गुलामों के व्यापार या निर्यात की बात करें तो यह अफ्रीकी लोगों ने ही शुरू किया था. कई अफ्रीकी समाजों में जेल नहीं हुआ करती थीं. ऐसे में अगर को आदमी कुछ गलत करता पकड़ा जाता तो उसे कहीं बंद नहीं किया जा सकता था. इसलिए उसे बेच दिया जाता था."

जंजीबार: पूर्वी अफ्रीका में गुलामों का व्यापार

पूर्वी अफ्रीका से गुलामों का व्यापार 17वीं शताब्दी में तेजी से फैला. ओमान के बहुत सारे व्यापारी जंजीबार में रहने लगे. स्वाहिली तट पर होने वाले व्यापार के चलते जंजीबार द्वीप की अहमियत बढ़ने लगी. यही वजह रही कि सामान के आयात-निर्यात के बाद यह जगह गुलामों के आयात-निर्यात का भी केंद्र बन गया. कितने अफ्रीकी लोगों को पूर्व से बेचकर उत्तर ले जाया गया, इसके बारे में सिर्फ अनुमान लगाए गए हैं. इसके बारे में कोई पुख्ता रिकॉर्ड नहीं हैं. इसकी वजह है कि अधिकांश गुलाम मारे जाते थे. वैज्ञानिकों के मुताबिक चार में से तीन गुलाम तो बाजार में बेचे जाने से पहले ही मर जाया करते थे. इसकी वजह अकसर भूख, बीमारी और लंबी यात्रा करने की वजह से हुई थकावट हुआ करती थी. नदिए के मुताबिक करीब 1 करोड़ 70 लाख लोगों को गुलाम बनाकर पूर्व अफ्रीका से ले जाया गया.

नदिए कहते हैं,"आज की तारीख में हम समझते हैं कि दासप्रथा सिर्फ यूरोपीय लोगों ने शुरू की है. लेकिन अरब लोगों ने अफ्रीकियों से जो गुलामी करवाई उसकी कहानी कहीं ज्यादा बड़ी है. करीब 80 लाख लोगों को पूर्वी अफ्रीका से सहारा रेगिस्तान के रास्तों से मोरक्को और मिस्र लाया गया था. करीब 90 लाख लोगों तो लाल सागर और हिंद महासागर के इलाकों में ले जाया गया."

गुलामी का मसाला

प्रोफेसर लोधी एन'दिआए के 1 करोड़ 70 लाख के आंकड़ें से असहमति जताते हैं. वो कहते हैं, ''ऐसा संभव नहीं हो सकता क्योंकि उस समय पर पूरे अफ्रीका की जनसंख्या ही 4 करोड़ थी. ये आंकड़ें सही नहीं लगते हैं.'' पुराने आंकड़े भी पुख्ता नहीं लगते हैं. स्कॉटलैंड के रहने वाले मिशनरी और यात्री डेविड लिविंगस्टन का अनुमान है कि जंजीबार के बाजार में हर साल 50 हजार गुलामों का व्यापार होता था. लोधी इस पर भी असहमति जताते हुए कहते हैं, ''जंजीबार की जनसंख्या तो आज भी 50 हजार नहीं पहुंची है. इस आंकड़े को भी सही नहीं माना जा सकता है.''

सभी गुलामों को मिस्र या सऊदी अरब नहीं ले जाया गया. 1820 से ओमानी व्यापारियों ने विश्वभर से बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए जंजीबार में लौंग की खेती करना शुरू कर दिया. इस वजह से खेती का इलाका तेजी से बढ़ा और इसमें काम करने के लिए यहां गुलाम बाजार से सस्ते गुलाम खरीदे जा सकते थे. अमेरिकी इतिहासकार फ्रेडरिक कॉपर के मुताबिक 1839 से 1860 के बीच लौंग का निर्यात 565 किलोग्राम से बढ़कर 12,600 किलोग्राम पहुंच गया था. यही वजह थी कि दासप्रथा के लिए बदनाम जंजीबार धीरे-धीरे व्यापार का केंद्र बन गया. जंजीबार कभी टिप्पू टिप नाम के गुलामों का व्यापार करने वाले दलाल के नाम से बदनाम था.

गुलामी का अंत

अगस्त 1791 में हैती और डॉमिनिकन रिपब्लिक में गुलाम क्रांति की शुरुआत हुई. आगे बढ़ते हुए इन दोनों देशों ने सबसे पहले दासप्रथा और औपनिवेशवाद को खत्म करने के लिए आवाज उठाई. हालांकि जंजीबार में 1873 तक ऐसा नहीं हुआ. 1873 में ब्रिटेन के दबाव में जंजीबार के सुल्तान सैयद बार्गशाह ने जंजीबार में गुलामों के व्यापार पर रोक लगा दी. हालांकि इस रोक को सख्ती से लागू नहीं किया गया. 1909 तक पूर्वी अफ्रीका में दासप्रथा खुले तौर पर चलती रही.

एन'दिआए के मुताबिक दासप्रथा अलग-अलग रूप में आज भी मौजूद है. दुनियाभर में करीब 4 करोड़ लोग आज भी गुलामी का सामना कर रहे हैं. अफ्रीका में भी ऐसे लाखों लोग हैं. नदिए कहते हैं, ''मॉरिटेनिआ में कहा जाता है कि वहां अब दासप्रथा नहीं है. लेकिन उत्तरी अफ्रीका में अभी परिस्थितियां बहुत ज्यादा नहीं बदली हैं. अभी भी वहां पर हजारों ऐसे युवा हैं जो गुलामी की जिंदगी जी रहे हैं. वो अपनी इच्छा के विपरीत काम करने के मजबूर हैं जहां उनका यौन शोषण भी होता है.''

लीबिया में चलने वाले गुलामी बाजारों की खबरें अकसर आती रहती हैं. तंजानिया ने में हाल में ही एक दासप्रथा का मामला सामने आया था. यहां एक खदान में 50-60 लड़कों से जबरन काम करवाया जा रहा था. इन लोगों को कोई पैसा नहीं दिया जा रहा था और इन्हें एक कैंप में रखा जाता था जहां सशस्त्र पहरेदारों द्वारा इनकी निगरानी की जाती है. पूर्वी अफ्रीका के आर्थिक हालात पश्चिमी अफ्रीका की की तुलना में ठीक हैं. नदिए के मुताबिक,'' इन देशों की अर्थव्यवस्था आज भी पश्चिमी देशों के प्रभाव में है. इसके बारे में कई बुद्धिजीवी लोग आज भी चर्चा करते हैं.'' एन'दिआए को लगता है कि इस मुद्दे की खुले में बहस होनी चाहिए.

एन'दिआए कहते हैं, ''अधिकतर अफ्रीकी लेखकों ने अब तक अरब और मुस्लिमों के गुलामों के व्यापार पर किताबें नहीं छापी हैं. वे कहीं ना कहीं धार्मिक एकजुटता दिखाने की कोशिश करते हैं. अफ्रीका में फिलहाल करीब 50 करोड़ मुस्लिम हैं.  उनके लिए मुस्लिमों के गुनाहों को सामने लाने से बेहतर पश्चिमी देशों के लिए आरोप लगाना आसान है.''

सिल्या फ्रोहलिष/आरएस

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