परमाणु संयंत्रों को लेकर फ्रांस की उत्सुकता का राज | विज्ञान | DW | 29.10.2021

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विज्ञान

परमाणु संयंत्रों को लेकर फ्रांस की उत्सुकता का राज

जापान के फुकुशिमा हादसे के बाद कई देश परमाणु संयंत्रों को बंद करने पर काम कर रहे हैं. वहीं, फ्रांस छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टरों को स्थापित कर रहा है. फ्रांस की मंशा क्या है? ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करना या कुछ और?

करीब 10 साल पहले जापान के फुकुशिमा में परमाणु उर्जा संयंत्र में हुए हादसे के बाद कई देशों ने परमाणु उर्जा पर अपने रुख की समीक्षा की. जैसे, जर्मनी और बेल्जियम जैसे देश क्रमश: 2022 और 2025 तक परमाणु उर्जा के इस्तेमाल को बंद करने का इरादा कर चुके हैं. इटली की 95 प्रतिशत आबादी परमाणु उर्जा के इस्तेमाल के खिलाफ है.

हालांकि फिनलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और फ्रांस जैसे देशों ने अभी भी मौजूदा परमाणु संयंत्रों को चालू रखने का फैसला किया है. साथ ही, हाल के वर्षों में इसके विस्तार की भी योजना बनाई है.

फ्रांस के एक कानून में कहा गया है कि देश में फिलहाल कुल उर्जा में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी परमाणु उर्जा की है. इसे 2035 तक कम करके 50 प्रतिशत तक लाना है. राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों ने कुछ समय पहले इस लक्ष्य को ‘अवास्तविक' बताया था. अब जब देश छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (एसएमआर) की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो विशेषज्ञों का मानना है कि यह फ्रांस का छिपा हुआ एजेंडा हो सकता है.

दरअसल, आज से 10 साल पहले 2011 में जापान में आए विनाशकारी भूकंप और सुनामी ने फुकुशिमा स्थित परमाणु संयंत्र को ध्वस्त कर दिया था. यह हादसा आधुनिक इतिहास की एक बड़ी त्रादसी थी. इसकी वजह से वहां रेडियोधर्मिता इतनी ज्यादा है कि इंसानों का उसके करीब जाना खतरे से खाली नहीं है. वहां आज भी सफाई के लिए रोबोट का इस्तेमाल किया जा रहा है. इस घटना के बाद से ही कुछ देशों में परमाणु संयंत्रों को बंद करने की होड़ शुरू हो गई. हालांकि, कुछ देशों का मानना है कि फुकुशिमा के नुकसान को काफी बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया है.

एक बिलियन यूरो निवेश की योजना

हाल ही में फ्रांस के राष्ट्रपति ने तथाकथित छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (एसएमआर) में निवेश करने की योजना की घोषणा की. उन्होंने कहा कि इससे परमाणु उर्जा के क्षेत्र में नए परिवर्तन का आगाज होगा. यह घोषणा तब की गई जब माक्रों ने एलिसी पैलेस में 30 बिलियन यूरो की ‘फ्रांस 2030 निवेश रणनीति' का खुलासा किया. जाहिर है कि नए रिएक्टर से फ्रांस को CO2 का उत्सर्जन कम करने में मदद मिलेगी.

इस समारोह के दौरान राष्ट्रपति ने कहा, "हमारे पास प्रतियोगियों से आगे बढ़ने का बेहतर समय है. हमारे पास ऐतिहासिक मॉडल हैं और मौजूदा परमाणु उर्जा संयंत्र हैं." नए रणनीति के तहत हाइड्रोजन पावर के विकास के लिए 8 बिलियन यूरो और एसएमआर के लिए 1 बिलियन यूरो आवंटित किए गए हैं. इसके बावजूद, माक्रों ने छोटे प्लांट को ‘पहला लक्ष्य' के तौर पर विकसित करने की घोषणा की है.

फ्रांस के मौजूदा रिएक्टर की क्षमता 1450 मेगावाट तक की है. हालांकि, एसएमआर की क्षमता 50 से लेकर 500 मेगावाट तक होगी. साइटों की कुल क्षमता बढ़ाने के लिए क्लस्टरों में एसएमआर बनाए जाने हैं.

इस बड़े निवेश के बावजूद, परमाणु चैंपियन फ्रांस एसएमआर की दौड़ में सबसे आगे नहीं है. सबसे आगे है अमेरिका. पोर्टलैंड स्थित स्टार्टअप न्यू-स्केल पावर दुनिया की पहली कंपनी है जिसके एसएमआर डिज़ाइन को मंजूरी मिली है. यह कंपनी 2027 में अपना पहला 60 मेगावाट की क्षमता वाले प्लांट को पूरा करने की योजना पर काम कर रही है. वहीं, रूस की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी रूस्तम ने 2028 में अपना पहला एसएमआर प्लांट बनाने का लक्ष्य रखा है.

वीडियो देखें 07:09

फुकुशिमा का परमाणु कचरा रोबोटों के लिए भी चुनौती

एसएमआर क्षेत्र का नेतृत्व कर सकता है फ्रांस

फ्रांस का पहला संयंत्र 2030 में पूरा होने वाला है. इसके बावजूद, पेरिस स्थित फाउंडेशन फॉर स्ट्रैटेजिक रिसर्च के निकोलस माजुची को लगता है कि देश इस क्षेत्र का नेतृत्व कर सकता है. उन्होंने डॉयचे वेले को बताया, "हमारे पास इस क्षेत्र से जुड़ी पर्याप्त जानकारी है. अगर निजी क्षेत्र निवेश करने के लिए आगे बढ़ता है, तो हम निश्चित तौर पर 2030 में बड़े पैमाने पर उत्पादन कर सकते हैं."

माजुची का मानना है कि परमाणु ऊर्जा फ्रांस की ऊर्जा का हिस्सा बनी रहनी चाहिए. वह कहते हैं, "इस प्रकार से पैदा होने वाली उर्जा स्थिर और अनुमानित होती है. पवन उर्जा जैसी नवीकरणीय उर्जा इसकी तुलना में कहीं नहीं हैं. और मौजूदा परमाणु उर्जा संयंत्र से शायद ही CO2 का उत्सर्जन होता है."

वह यह भी कहते हैं कि फ्रांस में परमाणु हादसे की संभावना न के बराबर है, क्योंकि यहां बेहतर तरीके से इसकी निगरानी की जाती है. साथ ही, देश के पास परमाणु कचरे से निपटने की बेहतर टेक्नोलॉजी भी है.

खर्चीला और धीमा

हालांकि, माइकल श्नाइडर को लगता है कि परमाणु उर्जा की मदद से जलवायु आपातकाल के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती. वे इसे ‘खर्चीला और धीमा' बताते हैं. श्नाइडर वर्ल्ड न्यूक्लियर इंडस्ट्री स्टेट्स रिपोर्ट (WNISR) के संपादक हैं. इस रिपोर्ट में दुनिया भर के परमाणु उर्जा उद्योग के रूझानों का आकलन किया जाता है.

उन्होंने डॉयचे वेले को बताया, "एसएमआर को लेकर होने वाली चर्चा गर्म हवा की तरह होती है. पिछले साल 250 गीगावाट से अधिक नवीकरणीय उर्जा को ग्रिड में जोड़ा गया. इसमें महज 0.4 गीगावाट ही परमाणु उर्जा थी. इस तरह देखें, तो परमाणु उर्जा का हकीकत में काफी कम योगदान रहा."

श्नाइडर का कहना है कि परमाणु उर्जा संयंत्र केवल नवीकरणीय ऊर्जा की तुलना में अधिक विश्वसनीय प्रतीत होते हैं. फ्रांस के परमाणु रिएक्टरों को 2020 में औसतन एक तिहाई समय तक बंद रखना पड़ा. ऐसा रखरखाव की वजह से किया गया था, क्योंकि ये रिएक्टर करीब 35 वर्षों से अधिक समय से इस्तेमाल में हैं.

उन्होंने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा को विभिन्न ऊर्जाओं के गुलदस्ते के रूप में देखा जाना चाहिए. मांग के मुताबिक, एक प्रकार की ऊर्जा की जगह दूसरे प्रकार की ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा सकता है. पर्यावरणविद अक्सर यह भी कहते हैं कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण के दौरान काफी ज्यादा कार्बन फुटप्रिंट होते हैं.

श्नाइडर कहते हैं, "परमाणु ऊर्जा का संयंत्र बनाने में लंबा समय लगता है. 1986 में चेरनोबिल परमाणु हादसे के बाद फ्रांसीसी यूटिलिटी ईडीएफ और सीमेंस ने ईपीआर विकसित करना शुरू कर दिया. यह पानी के दबाव वाले रिएक्टर की तीसरी पीढ़ी का डिजाइन है. और इसके 35 साल बाद भी अभी तक फ्रांस में कोई ईपीआर नहीं है."

ईडीएफ उत्तरी फ्रांस में पिछले 9 साल से 1.6 गीगावाट वाले ईपीआर का निर्माण कर रहा है. शुरुआत में इसकी लागत 3.3 बिलियन यूरो थी, जो बढ़कर 11 बिलियन तक पहुंच जाएगी. अगले साल तक इस ईपीआर के पूरा होने की संभावना है. इन सब के बावजूद, राष्ट्रपति माक्रों जल्द ही फ्रांस में छह अतिरिक्त ईपीआर बनाने की योजना की घोषणा कर सकते हैं.

अधिक लागत

अमेरिका में येल विश्वविद्यालय में पर्यावरण और ऊर्जा अर्थशास्त्र के प्रोफेसर केनेथ गिलिंगम को इस तरह की देरी पर हैरानी होती है. वह कहते हैं कि क्या इस तरह की देरी के बावजूद, परमाणु क्षेत्र में निवेश करना आर्थिक रूप से सही है.

उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "नए परमाणु संयंत्रों के लिए सुरक्षा की इतनी सख्त जरूरत होती है कि उनका निर्माण करना काफी महंगा होता है. मुझे वाकई नहीं समझ आता कि एसएमआर पर पैसा क्यों खर्च किया जा रहा है, खासकर उस स्थिति में जब पक्के तौर पर नहीं पता कि यह काम करेगा या नहीं."

हालांकि, दक्षिणी इंग्लैंड में यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स स्कूल ऑफ बिजनेस के रिसर्च फेलो फिलिप जॉनस्टोन का मानना है कि एसएमआर का पैमाना अर्थशास्त्र के तर्क से अलग है. जॉनस्टोन ने डीडब्ल्यू को बताया, "हमें हमेशा बताया गया था कि बड़े परमाणु संयंत्रों के निर्माण से कई अन्य प्रभावों की वजह से होने वाले खर्चों में कमी होगी. और अब अचानक लगता है कि यह दूसरी तरह से काम करने वाला है?”

उनका मानना है कि फ्रांस के पास परमाणु ऊर्जा में निवेश जारी रखने के अन्य कारण भी हैं. उन्होंने माक्रों के दिसंबर 2020 के एक भाषण की ओर इशारा करते हुए कहा, "जो देश परमाणु उर्जा से जुड़े होते हैं वे अक्सर परमाणु हथियार संपन्न देश होते हैं. जैसे, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस वगैरह."

माक्रों ने परमाणु क्षेत्र की प्रशंसा करते हुए कहा था, "असैनिक परमाणु शक्ति के बिना कोई सैन्य परमाणु शक्ति नहीं और सैन्य परमाणु शक्ति के बिना कोई असैन्य परमाणु शक्ति नहीं." फ्रांस में करीब 2,20,000 लोग परमाणु से जुड़े क्षेत्र में काम करते हैं.

जॉनस्टोन कहते हैं, "एसएमआर में निवेश सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण एक रणनीतिक निर्णय लगता है, भले ही इसका मतलब बहुत समय और पैसा बर्बाद करना है."

रिपोर्टः लीजा लुईज

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