भारत सरकार ने ले ली 600 बच्चों की जान: समाजसेवी | दुनिया | DW | 26.09.2016
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दुनिया

भारत सरकार ने ले ली 600 बच्चों की जान: समाजसेवी

भारत सरकार की वजह से महाराष्ट्र के 600 बच्चों की जान ले ली है. इस साल भूख से राज्य में 600 बच्चों की जान गई है जिसका सीधा संबंध समाज कल्याण की योजनाओं में हुई फंड की कटौती से है.

पालघर जिले में 600 बच्चे कुपोषण के कारण मर गए. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस बारे में राज्य सरकार को नोटिस भेज पूछा है कि क्या और कैसे हुआ. उसके बाद राज्य की महिला और बाल विकास मंत्री पंकजा मुंडे पालघर पहुंचीं और भरोसा दिलाया कि योजनाएं फिर से शुरू की जाएंगी.

महाराष्ट्र में काम करने वाले समाजसेवी विवेक पंडित कहते हैं कि इन बच्चों की मौत की दोषी केंद्र सरकार है. उन्होंने कहा, "ये बच्चे इसलिए मरे क्योंकि केंद्र सरकार ने कल्याण योजनाएं बंद कर दीं और राज्य सरकार ने उसकी योजनाओं के लिए फंड नहीं दिया.” पंडित कहते हैं कि भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई से पालघर की दूरी सिर्फ 100 किलोमीटर है जहां बच्चे भूख से मर रहे हैं.

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भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से है लेकिन यहां कुपोषित बच्चों की तादाद शर्मनाक रूप से बढ़ रही है. दुनिया के कुल कुपोषित बच्चों में 40 फीसदी भारतीय हैं. यह संख्या अफ्रीका से भी ज्यादा है. यूनिसेफ की रिपोर्ट है कि देश के साढ़े पांच करोड़ बच्चे यानी पांच साल से कम उम्र के लगभग आधे भारतीय बच्चे कुपोषित हैं.

पालघर के ज्यादातर बाशिंदे गरीबी हैं और पंडित बताते हैं कि ये लोग समाज कल्याण की सरकारी योजनाओं पर ही निर्भर हैं. इनमें स्वास्थ्य और दूसरी कई तरह की सेवाएं हैं. जिले में मेडिकल सुविधाएं बहुत कम हैं और पहुंच से लगभग बाहर हैं.

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नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद से भारत की समाज कल्याण योजनाओं के फंड में काफी कटौती की गई है. लाखों बच्चों को खाना, साफ पानी और शिक्षा मुहैया कराने वाली इन योजनाओं के मद में कटौती करके सरकार सड़क, बंदरगाह और पुल बनाने पर खर्च बढ़ा रही है. लेकिन इन सड़कों का इस्तेमाल करने लायक होने से पहले ही बच्चे जान से जा रहे हैं. मानवाधिकार आयोग ने पालघर में बच्चों की मौत को मानवाधिकारों का उल्लंघन माना है.

पंडित कहते हैं, "हमें नौकरियां उपलब्ध करानी हैं, गरीबी को भी दूर करना है लेकिन यह भी तो सुनिश्चित करना है कि बच्चों को खाना मिले. हमारे पास संसाधन तो हैं लेकिन इन बच्चों के लिए सहानुभूति नहीं है इसलिए कोई कुछ नहीं करता.”

वीके/एमजे (रॉयटर्स)

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