हाजिरी वाले ऐप के खिलाफ शिक्षकों की लड़ाई | भारत | DW | 17.09.2021
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भारत

हाजिरी वाले ऐप के खिलाफ शिक्षकों की लड़ाई

दिल्ली के हजारों शिक्षकों को एक ऐसा ऐप डाउनलोड करने को कहा गया है जिससे उनकी हाजिरी लगाई जा सकती है. ऐप का इस्तेमाल शिक्षकों की हाजिरी जानने के लिए किया जा सकता है लेकिन शिक्षक इसका विरोध कर रहे हैं.

फाइल तस्वीर.

फाइल तस्वीर.

कोविड काल में स्कूल बंद कर दिए गए थे और शिक्षकों की ड्यूटी आपात सेवाओं में लगा दी गई, जिसमें राशन बांटना, टीकाकरण केंद्र में सेवा देना आदि. हालांकि इन सब कामों में उन्हें भी संक्रमण का खतरा रहता है.

लेकिन जब शिक्षको से उनके मोबाइल फोन पर एक हाजिरी ऐप डाउनलोड करने के लिए कहा, जो उनके स्थान को ट्रैक कर सकता है तो राजधानी दिल्ली के कई शिक्षक इस ऐप का विरोध करते हुए अड़ गए. आलोचकों का कहना है कि छात्रों और कर्मचारियों की गोपनीयता का उल्लंघन है.

प्रशासन ने चेतावनी दी है कि अगर शिक्षक पालन करने में विफल रहते हैं तो उनका वेतन रोक दिया जाएगा. लेकिन शिक्षक इसके खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं.

नगर निगम शिक्षक संघ की उपाध्यक्ष विभा सिंह कहती हैं, "इस ऐप पर हमसे सलाह नहीं ली गई थी, हमें इसकी विशेषताओं के बारे में नहीं बताया गया था. हमें सिर्फ एक लिंक भेजा गया था और इसे अपने मोबाइल फोन पर डाउनलोड करने का आदेश दिया गया था."

शिक्षकों द्वारा कई शिकायतों के बाद आखिरकार संघ ने इसको कोर्ट में चुनौती दी. उन्होंने हाई कोर्ट में दलील दी कि ऐप उनकी निजता का हनन करता है. अब मामले पर अगली सुनवाई 27 सितंबर को होगी. विभा के मुताबिक, "ये हमारे निजी फोन हैं और ऐप हर समय हमारे स्थान को ट्रैक करता है. हम नहीं जानते कि यह और कौन सी जानकारी हासिल कर सकता है, या किसके पास डेटा की पहुंच है. अगर यह हैक हो जाता है तो क्या होगा?" वे कहती हैं कि महिला शिक्षक विशेष रूप से जोखिम में हैं.

ऐप लॉन्च होने से पहले ही दिल्ली के कुछ पब्लिक स्कूलों में फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी वाले सीसीटीवी कैमरे लगाए थे. डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस तरह के उपाय निजता का हनन करते हैं.

प्रौद्योगिकी वेबसाइट कंपेरिटेक की रिपोर्ट के मुताबिक प्रति वर्ग मील में सबसे अधिक निगरानी कैमरे (सीसीटीवी कैमरे) लगाने के मामले में दिल्ली दुनिया का पहला शहर है. दिल्ली में प्रति वर्ग मील 1826 कैमरे लगे हुए हैं.

एसडीएमसी में शिक्षा विभाग के उप निदेशक मुक्तामय मंडल कहते हैं, "यह एक गलतफहमी है कि ऐप उनकी गोपनीयता से समझौता कर सकता है. हमने ऐप को समझाने और उनके डर को दूर करने के लिए शिक्षकों के साथ कई दौर की बातचीत की है."

उन्होंने कहा, "हम हर क्षेत्र में डिजिटलीकरण की ओर बढ़ रहे हैं - हम हर रोज इतने सारे ऐप डाउनलोड कर रहे हैं. अगर उनके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो डरने की क्या बात है?"

पिछले साल चंडीगढ़ में नगर निगम के कर्मचारियों ने जीपीएस-आधारित ट्रैकिंग स्मार्टवॉच के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था. स्मार्टवॉच को प्रदर्शन रेटिंग और वेतन से जुड़े डेटा को फीड करने के लिए पहनने की आवश्यकता थी.

दिल्ली में डिजिटल राइट्स ग्रुप इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन की एसोसिएट काउंसल अनुष्का जैन कहती हैं हाजिरी वाले ऐप के साथ ट्रैकिंग और डेटा तक पहुंच से निगरानी के स्तर को अटेंडेंस लॉग करने के साधन के रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता है.

जैन कहती हैं, "उन्हें पूरे दिन ट्रैक करने की कोई जरूरत नहीं है. वह निगरानी है. यह बहुत ही समस्याग्रस्त है कि इन ऐप्स और तकनीकों को बिना किसी डेटा सुरक्षा दिशा-निर्देशों के लोगों पर थोपा जा रहा है."

एए/सीके (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

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