क्या अब बिहार से निकलते रहेंगे धोनी-सूर्यवंशी जैसे क्रिकेटर
२९ मई २०२६
बिहार के वैभव सूर्यवंशी ने आईपीएल-2026 में वेस्टइंडीज के विस्फोटक बल्लेबाज क्रिस गेल का 14 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ कर इतिहास रच दिया. आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स की ओर से खेलने वाले इस 15 वर्षीय खिलाड़ी ने सनराइजर्स हैदराबाद के खिलाफ खेले गए एलिमिनेटर मैच में 29 गेंदों पर 97 रनों की तूफानी पारी खेली. इस पारी में उन्होंने 12 छक्के लगाए, हालांकि शतक बनाने से चूक गए. गेल ने 2012 के आईपीएल के एक सीजन में 59 छक्के लगाए थे, जबकि इस सीजन में वैभव ने 65 छक्के लगाए. आईपीएल के एक सीजन में वे सबसे अधिक सिक्स लगाने वाले बल्लेबाज बन गए हैं. मैच समाप्त होने के तुरंत बाद क्रिस गेल ने अपना यूनिवर्स बॉस वाला टैग वैभव को दे दिया. साथ ही उन्होंने वैभव को अद्भुत व असाधारण खिलाड़ी बताते हुए नई सिक्स मशीन की संज्ञा दी.
वैभव ने जनवरी, 2024 में मात्र 12 साल की उम्र में रणजी ट्रॉफी का मैच खेला. इसके साथ ही सचिन और युवराज को पीछे छोड़कर वे सबसे कम उम्र में प्रथम श्रेणी घरेलू क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ी बन गए. उनकी उपलब्धियों को देखते हुए बीसीसीआई ने उन्हें इंडिया-ए में जगह दी. जानकार इसे हाल के वर्षों में खेलों के संस्थागत और बुनियादी विकास से भी जोड़कर देखते हैं, जिसके तहत वैभव के गृहराज्य में खेल की संस्कृति विकसित हुई है. अलग से खेल विभाग का गठन और बिहार राज्य खेल प्राधिकरण को एक स्वायत्त निकाय बनाना सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति को जाहिर करता है. फिर खेलो इंडिया यूथ गेम्स के सफल आयोजन से भी राज्य में स्पोर्ट्स ईकोसिस्टम को बढ़ावा मिला है.
पहले खिलाड़ियों को करना पड़ा था दूसरे राज्यों का रुख
महेंद्र सिंह धोनी ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में अपनी शुरुआत तो अविभाजित बिहार से की, किंतु वर्ष 2000 में बिहार के विभाजन के बाद वे झारखंड के हिस्से में चले गए. राज्य के बंटने के साथ ही उस समय के क्रिकेट का बुनियादी ढांचा तथा भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की मान्यता भी झारखंड के खाते में दर्ज हो गई. धोनी और वैभव के अभ्युदय के बीच के कालखंड में बिहार के रहने वाले एक और क्रिकेटर ईशान किशन ने क्रिकेट में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया, किंतु यह उपलब्धि भी झारखंड के हिस्से में चली गई. बिहार में कोई मान्यता प्राप्त टीम या क्रिकेट बोर्ड नहीं होने के कारण पटना निवासी होने के बावजूद करियर बचाने के लिए उन्हें पलायन करना पड़ गया.
ईशान घरेलू क्रिकेट झारखंड से और आईपीएल में मुंबई इंडियन के लिए खेलते हैं और भारतीय टीम के धाकड़ बल्लेबाज के रूप में जाने जाते हैं. इसी तरह गोपालगंज जिले के रहने वाले मुकेश कुमार, समस्तीपुर के अंकुल राय और मुजफ्फरपुर के शाहबाज नदीम को बिहार की बजाय दूसरे राज्यों से खेलना पड़ा. दरअसल, क्रिकेट की बात करें तो करीब 18 साल तक बिहार में यह संस्थागत रूप से मृत था. इस दौरान बिहार की कोई टीम रणजी ट्रॉफी में नहीं खेल सकी. इस बीच बिहार क्रिकेट एसोसिएशन (बीसीए) की राजनीति और गुटबाजी ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं. मान्यता रद्द होने की वजह से बिहार का कोई लड़का बिहार से रणजी ट्रॉफी या कोई बड़ा घरेलू टूर्नामेंट खेल ही नहीं सकता था.
भारत में क्रिकेटरों की तरह फुटबॉलर क्यों नहीं पैदा होते
2018 में सुप्रीम कोर्ट और लोढ़ा कमेटी की रिपोर्ट के बाद बीसीए को बीसीसीआई की मान्यता मिली, तब जाकर बिहार ने रणजी ट्रॉफी में खेलना शुरू किया. संस्थागत तौर पर इसी बदलाव ने वैभव सूर्यवंशी को ईशान किशन बनने से रोक लिया और वे बिहार की जर्सी पहनकर आईपीएल और अंडर-19 इंडिया तक पहुंच सके.
खेल पत्रकार अक्षय पांडेय कहते हैं, "वैभव को महज 12 साल 284 दिन की उम्र में रणजी के लिए चुनकर बीसीए ने उन्हें टेक ऑफ करने के लिए रनवे तो दे ही दिया, जहां से उन्हें उड़ान भरने में मदद मिल सकी. इसमें कोई दो राय नहीं कि बीसीए के तत्कालीन अध्यक्ष राकेश तिवारी ने उनकी प्रतिभा को पहचान लिया और खेलने का मौका दे दिया. लेकिन, शुरुआती सीढ़ियां चढ़ने लायक वैभव को बनाया उनके पिता संजीव सूर्यवंशी ने ही. पुत्र की प्रतिभा को पहचान कर पिता ने पटना में मनीष ओझा की जेननेक्स क्रिकेट अकादमी में दाखिला दिलाया. बेटा बेहतर प्रशिक्षण ले सके, इसके लिए समस्तीपुर जिले के ताजपुर से करीब सौ किलोमीटर की दूरी तय कर हर दूसरे दिन उसे पटना लाते और ले जाते थे. यह पारिवारिक दृढ़ संकल्प की एक मिसाल तो है ही."
धोनी का दौर संस्थागत बिखराव का तो वैभव का समय विकास का
इन्फ्रास्ट्रक्चर की जमीनी स्तर पर कमी का खामियाजा वैभव के परिवार को भी उठाना पड़ा था. बेटे की आकांक्षा की पूर्ति के लिए परिवार ने पुश्तैनी जमीन भी बेच डाली. वित्तीय संकट का यह दौर तब तक चला, जब नवंबर, 2024 की नीलामी में वैभव को राजस्थान रॉयल्स द्वारा 1.10 करोड़ में चुन नहीं लिया गया. बिहार का नाम रौशन करने पर राज्य सरकार ने भी उनकी सुध ली. अप्रैल, 2025 में गुजरात टाइटंस के खिलाफ रिकॉर्डतोड़ शतक लगाने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बतौर सम्मान स्वरुप दस लाख रुपये के नकद पुरस्कार की घोषणा की. इसके बाद फरवरी, 2026 में जब वैभव ने अंडर-19 विश्व कप फाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ महज 80 गेंद पर 175 रन बनाकर भारत को जीत दिलाई तो वापसी पर राज्य सरकार ने 50 लाख रुपये का चेक देकर उनका सम्मान किया. इससे वैभव जैसे बच्चों में उम्मीद तो जरूर जगी है.
अक्षय कहते हैं, "महेंद्र सिंह धोनी का दौर जहां संस्थागत बिखराव और सुविधाओं के घोर अभावों का दौर था, वहीं वैभव का दौर सरकारी निवेश और संस्थागत आधुनिकीकरण का दौर है. धोनी के दौर को आपको डार्क एज की संज्ञा दे सकते हैं. बीसीए की मान्यता रद्द हो जाने के कारण धोनी बिहार से रणजी नहीं खेल सके, आगे बढ़ने के लिए उन्हें झारखंड और रेलवे का रुख करना पड़ा, जबकि वैभव को अपना हुनर साबित करने को दूसरे राज्य का सहारा नहीं लेना पड़ा. उन्हें बीसीए का साथ मिला."
धोनी के समय अविभाजित बिहार में एकमात्र विश्व स्तरीय जमशेदपुर स्थित कीनन स्टेडियम था और वे प्लास्टिक की बॉल और टूटे-फूटे नेट पर प्रैक्टिस करते थे. आज राजगीर में विश्व स्तरीय सुविधाएं खिलाड़ियों के लिए उपलब्ध हैं. कहा जा सकता है कि धोनी उस व्यवस्था की उपज हैं, जहां खिलाड़ियों को व्यवस्था से लड़कर अपनी जगह बनानी पड़ती थी, वहीं सूर्यवंशी के दौर में बीसीए का पुनर्गठन हो चुका है.
राज्य में ही खिलाड़ियों को बेहतर माहौल देने के लिए राजगीर इंटरनेशनल स्पोर्ट्स स्टेडियम और स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई है, जहां एक ही जगह पर फुटबॉल, हॉकी और क्रिकेट सहित 20 तरह के खेल के लिए विश्वस्तरीय ग्राउंड और एकेडमी हैं. साथ ही वैज्ञानिक तरीके से प्रशिक्षण के लिए स्पोर्ट्स साइंस और रिसर्च सेंटर भी बनाए गए हैं. राज्य की नई खेल नीति के अनुसार अब खिलाड़ियों को अच्छी डायट और स्पोर्ट्स किट के लिए वित्तीय सहायता दी जा रही है तथा उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए नेशनल व इंटरनेशनल कोच रखे जा रहे हैं. इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए 250 से अधिक प्रखंड स्तरीय स्टेडियम और पंचायत स्तर पर 8,000 से अधिक खेल मैदान विकसित कर अपने जिले में ही खिलाड़ियों को सुविधाएं दी जा रही हैं.