वैक्सीनेशन के बावजूद इस्राएल में क्यों बढ़ रहे हैं कोविड के मामले | दुनिया | DW | 20.08.2021

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दुनिया

वैक्सीनेशन के बावजूद इस्राएल में क्यों बढ़ रहे हैं कोविड के मामले

देश की 60 फीसदी आबादी को कोविड-रोधी टीके की दोनों डोज लग जाने के बाद इस्राएल में जीवन पटरी पर लौट आया था. लेकिन इधर संक्रमण फिर से बढ़ने लगा है. ऐसा कैसे हुआ? क्या वैक्सीन की तीसरी खुराक से मदद मिलेगी?

मार्च में इस्राएल को लगता था कि कोविड-19 से उसका पीछा छूटा. देश की 90 लाख से ज्यादा की आबादी का आधा से अधिक हिस्से को कोरोना के दोनों टीके लग चुके थे. ये आबादी का करीब 60 फीसदी हिस्सा है और संख्या बढ़ ही रही है.

इस लिहाज से जर्मनी बड़े पैमाने पर पीछे था. मध्य मार्च तक उसकी आठ करोड़ 30 लाख की आबादी के सिर्फ 3.7 प्रतिशत हिस्से को ही दोनों खुराक मिली थीं. पहली खुराक पाने वाले 50 प्रतिशत से अधिक और दूसरी भी ले चुके 50 प्रतिशत से कम लोग हैं.

इस्राएल आगे था. कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि फेस मास्क सार्वजनिक स्थानों से पूरी तरह गायब हो चुके थे और जीवन "सामान्य रूप से” बहाल हो चुका था.

लेकिन लौट आया कोविड

चार महीने भी नहीं गुजरे कि हालात पलटी खा चुके हैं. कुछ देश आगाह कर रहे हैं कि इस्राएल, यात्रियों के लिए हाई-रिस्क ठिकाना है. मध्य जुलाई से वहां कोविड के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. सरकार का कहना है कि वे मामले ज्यादातर उन बच्चों में हैं जिन्हें टीके नहीं लगे हैं, लेकिन कुछ मामले ब्रेकथ्रू इंफेक्शन के भी हैं यानी टीके की दोनों डोज लग जाने के बाद भी लोग संक्रमित हुए हैं.

इस्राएल के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कुछ अध्ययनों के हवाले से दावा किया है कि वैक्सीन से मिलने वाली हिफाजत कुछ समय बाद कम होने लगती है, खासकर कोरोना के डेल्टा वेरिएंट के खिलाफ.

इसीलिए इस्राएल अब लोगों मे एंटीबॉडीज को मजबूत बनाने और बीमारी के खिलाफ लड़ पाने की क्षमता बढ़ाने के लिए, वैक्सीन की तीसरी डोज पर जोर दे रहा है. ये अभियान युद्ध स्तर पर चलाया जा रहा है. अगस्त की शुरुआत से दसियों हजार लोगों को बूस्टर डोज लगाई जा चुकी है.

हर रोज कोविड-19 के पुख्ता मामले (सात दिन की औसत के हिसाब से) 16 जुलाई के आसपास बढ़ने शुरू हुए थे. उस वक्त रोजाना इंफेक्शन की दर सिर्फ 19.29 थी. 16 अगस्त तक औसतन हर रोज 5950.43 संक्रमण होने लगा था. मई, जून और जुलाई के बीच देश में हर रोज औसतन शून्य मौत की दर थी. इसका मतलब ये नहीं है कि मौतें बिल्कुल भी नहीं हुईं, लेकिन औसत में उनका आंकड़ा कहीं ठहरता नहीं था.

तस्वीरेंः कोविड के खिलाफ कुछ कामयाबियां

15 अगस्त तक, इस्राएल में कोविड से मौत के दो मामले रोजाना आने लगे थे. उसके बाद एक दिन में पांच मौतें भी हुईं. दूसरे देशों की संख्या से इस आंकड़े की तुलना भी आसानी से की जा सकी है और संक्रमण और मौत की ऊंची और निचली दरें भी हैं, लेकिन फिलहाल इस्राएल पर ध्यान केंद्रित करते हैं.

मामले क्यों बढ़ रहे हैं?

शायद इसकी एक वजह कोराना वायरस का डेल्टा वेरिएंट भी हो सकता है. इस्राएल में डेल्टा वायरस की प्रमुखता के बारे में डाटा सार्वजनिक करने में कुछ हिचक रही है. लेकिन 14 अगस्त की प्रेस ब्रीफिंग में इस्राएली प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने कहा था कि "पूरी दुनिया में और इस्राएल में डेल्टा स्ट्रेन का उभार दुनिया को अपनी चपेट में ले रहा है.”

इससे समझा जा सकता है कि इस्राएल में मामलों की बढ़ोत्तर में डेल्टा वेरिएंट का हाथ भी है. इसके अलावा स्वास्थ्य मंत्रालय ने सूचित किया है कि "छह जून से संक्रमण (64 प्रतिशत) और बीमारी के लक्षणों (64 प्रतिशत) की रोकथाम के लिए वैक्सीन के असर में गिरावट देखी गई है. ये गिरावट इस्राएल में डेल्टा वेरिएंट के फैलाव के साथ ही साथ आंकी गई है.”

तस्वीरेंः इलाज पर कितना खर्च

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस्राएल में शारीरिक दूरी बरतने की अनिवार्यता खत्म होने से भी नुकसान हुआ है. इस्राएल ने कोविड के खिलाफ दो वैक्सीनों को मंजूरी दी हैः फाइजर-बायोएनटेक और मॉडर्ना. दोनों नॉवल एमआरनएन वैक्सीनें हैं. दोनों को करीब 95 प्रतिशत असरदार बताया गया है.

क्या सारे मामले ब्रेकथ्रू वाले हैं?

कोई भी टीका मुकम्मल नहीं होता है. हर समय कोई भी टीका 100 प्रतिशत बचाव नहीं देता और हर व्यक्ति में एंटीबॉडीज की संख्या भी अलग अलग होती है. इसीलिए वैज्ञानिक कथित "ब्रेकथ्रू संक्रमण” के कुछ निश्चित संख्या वाले मामलों की संभावना जताते हैं.

इस बात का उल्लेख भी जरूरी है कि "फुली” या "मुकम्मल” डोज की परिभाषा को लेकर भी कुछ बहस चल रही है. कुछ लोग कहते हैं कि फाइजर-बायोएनटेक या एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की दोनों खुराक लेने के बाद आप "फुली वैक्सीनेटड” हो जाते हैं यानी आपके टीके पूरे हो जाते हैं. और ब्रिटेन जैसे देश भी हैं जिनका जोर इस बात पर है कि आपको "फुली वैक्सीनेटड” तभी कहा जा सकता है कि जबकि दोनों डोज एक ही वैक्सीन निर्माता की हों.

जर्मनी और यूरोप के अन्य देश इस बीच मिली-जुली वैक्सीन की तरफ जा रहे हैं. यानी आपका पहला डोज एस्ट्राजेनेका का है तो दूसरा फाइजर-बायोनटेक का हो सकता है. एक प्रमुख राय ये बन रही है कि मिलीजुली वैक्सीनें खासकर जिसमें फाइजर-बायोनटेक शामिल है, वे डेल्टा वेरिएंट के खिलाफ ज्यादा असरदार होती हैं. जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन भी है जिसकी सिर्फ एक ही खुराक से टीकाकरण पूरा हो जाता है.

वीडियो देखें 02:55

क्या है लॉन्ग कोविड

इस्राएल जैसे देश अपने नागरिकों को जल्दी से जल्दी तीसरी खुराक लेने की सलाह दे रहे हैं. कुछ जानकार, तीसरी खुराक वाले सिद्धांत को लेकर नैतिक और वैज्ञानिक मुद्दे भी उठाते हैं- जैसे कि वे देश भी हैं जो अपने यहां पहली खुराक के लिए ही पर्याप्त टीके नहीं जुटा पा रहे हैं.

और दूसरी बात ये उठी है कि वैज्ञानिक आधार पर भी ये साबित नहीं हो पाया है. यानी जो कुछ भी हम जानते हैं, वो सब देखते हुए ये नहीं कहा जा सकता कि तीसरी खुराक व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सुरक्षित कर देगी.

लेकिन समय के साथ ये दलीलें बदल सकती हैं. एक-दो साल में वैज्ञानिक कह सकते हैं कि लोगों को चौथी खुराक भी चाहिए. या शायद नये वेरिएंटों के उभार से लोग कभी पूरी तरह से वैक्सीनेटड नहीं हो पाएंगे और दुनिया के उन वायरसों के साथ रहना सीखना होगा.

कुछ भी हो, जैसा कि डाटा से पता चलता है, अगर टीके की पूरी खुराक ले चुके इस्राएली लोगों में ब्रेकथ्रू मामले आते हैं, तो उनका संक्रमण उन लोगों के मुकाबले बहुत हल्का ही रहता है जिन्हें एक भी टीका नहीं लगा है.

इस्राएल में पिछले ही दिनों 16 अगस्त का सैंपल देखिएः

गंभीर रूप से बीमार 154. 7 मरीजों को एक भी टीका नहीं लगा था.

गंभीर रूप से बीमार 48. 4 मरीजों को आंशिक टीका लग चुका था.

और गंभीर रूप से बीमार 19. 8 मरीजों को सभी डोज लग चुकी थीं.

तो आगे का रास्ता क्या है?

इस्राएल कोई जोखिम नहीं मोल ले रहा है. वो और खुराकें दे रहा है. स्वास्थ्य मंत्रालय कहता है कि दुनिया भर में टीका निर्माताओं और दूसरी एजेंसियों के कराए अध्ययन ये बताते हैं कि "तीसरी डोज खून में एंटीबॉडी का लेवल बढ़ा देती है, उनकी गुणवत्ता बढ़ जाती है (यानी वायरस को खत्म करने की क्षमता में सुधार) और वे लंबे समय तक शरीर में रह पाती हैं. इसका नतीजा होता है, वायरस से शरीर को बचाने के लिए बढ़ी हुई एंटीबॉडी क्षमता.”

और इसीलिए वो भविष्य में और भी डोज की बात से इंकार नहीं कर रहा है. उसने 12-15 साल के बच्चों को भी टीका लगाने की सिफारिश की है.

रिपोर्टः जुल्फिकार अब्बानी

स्रोतःजॉन्सहोपकिन्सयूनिवर्सिटीमेंourworldindata.orgकेजरिएसेंटरफॉरसिस्टम्ससाइंसऐंडइंजीनियरिंग (सीएसएसई) कीकोविड-19 डाटारिपोजिटरीऔरइस्राएलीस्वास्थ्यमंत्रालय.

तस्वीरेंः कुत्तों को भी हो सकता है कोरोना

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